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योद्धा



राज सिप्पी
पटकथा लेखक


मोहित मट्टू
पटकथा लेखक


























Movie Review
योद्धा (Bhojpuri):


कथा – कोई नाम नहीं.

पटकथा लेखक - राज सिप्पी, मोहित मट्टू और एस ए.

संवाद- एस के चौहान.

गीत प्यारे लाल यादव और एस के चौहान,

योद्धा! नाम से आपको लग रहा होगा यह हिंदी फिल्म होगी, मगर नहीं, यह भोजपुरी फिल्म है. हाँ, पोस्टर देखकर आप जरूर जान जायेंगे कि यह भोजपुरी फिल्म है, क्योंकि पोस्टर पर दिखेंगे आपको भोजपुरी फिल्म स्टार रविकिशन और पवन सिंह. भोजपुरी में योद्धा को “जोद्धा” बोला जाता है, मगर भोजपुरी में इनदिनों हिंदी नाम रखने का चलन है. ठीक वैसे ही जैसे हिन्दी फिल्मों के नाम अंग्रेजी में रखने का चलन चल रहा है.

फिल्म में कहानी जैसी कोई वस्तु नहीं है, शायद इसीलिए फिल्म की क्रेडिट में किसी का नाम नहीं है. कहानी बस इतनी सी है कि काली (रविकिशन) जो एक अमीर जमींदार-ठेकेदार है, उसे एक लड़की (मधु शर्मा) पसंद आ जाती है. उस लड़की को वह अपनी पत्नी बनाना चाहता है जोर-जबरदस्ती, मगर लड़की उससे शादी के लिए तैयार नहीं होती है, क्योंकि उसने काली को एक खून करते देख चुकी है. लड़की बिहार से भाग कर मुम्बई आ जाती है, जहाँ उसकी मुलाकात वीर (पवन सिंह) से होती है. वीर से उसे प्यार हो जाता है, लेकिन इसी बीच काली उसकी तलाश में बिहार से मुंबई आ जाता है. मुम्बई में उसका भाई मंत्री है. मगर वीर के सामने उसकी दादागिरी धरी रह जाती है, वह काली को मार देता है और उस लड़की के साथ न्याय करता है.

पटकथा लेखक के तौर पर तीन लोगों के नाम है- राज सिप्पी, मोहित मट्टू और एस ए. पटकथा लेखकों की इस तिकड़ी ने पटकथा के नाम पर कथासूत्र का रोचक और विश्वसनीय विस्तार देने के बजाय अभिनेता रविकिशन को प्रजेंट करने और उन्मादी हिंसा के लिए दृश्यों की लड़ी बना दी है. परिणामस्वरूप पटकथा दर्शकों के मर्म और दिल को छूने में पूरी तरह असफल रही है. इस वजह से एस के चौहान के संवाद भी अपना असर नहीं छोड पाते. हाँ, लेखकों को इतना श्रेय देना होगा कि अपनी लेखनी को आजकल की भोजपुरी फिल्मों के महत्वपूर्ण तत्व अश्लीलता की स्याही से लगभग दूर रखा है. सेक्स उत्तेजना बोध के लिए मंत्री के साथ रखैल के तौर पर एक औरत को साथ रखा है, मगर वह भी बस शोपीस के तौर है. उसका कोई रोल नहीं है, हाँ उसे एक्स्प्लाइट करने के लिए एक गीत में जबरन उसका इस्तेमाल किया गया है. गीतों के बोल ठीक हैं, जिन्हें प्यारेलाल यादव और एस के चौहान ने लिखे हैं, लेकिन हिन्दी सिनेमा के बीते दिनों के ख्यातिनाम संगीतकार बप्पी लाहिरी का संगीत उन बोलों में भोजपुरी की मिठास भरने में नाकामयाब रहे हैं.

भोजपुरी फिल्में अपनी शुरूआत से ही भावुक और संगीतमय कथानक के तौर पर जानी और सराही जाती रही हैं. यह उनकी विशेषता भी माने जाने लगी थीं. मगर, नई सदी और नए दौर की भोजपुरी फिल्मों में इनके स्थान वल्गर गानों और चालू कहानी ने ले लिए. ससुरा बड़ा पैसावाला इसकी जनक मानी जाती है. हालाँकि ससुरा बड़ा पैसावाला तकनीकी तौर पर बेहद कमजोर तो थी ही लेखन के स्तर पर भी बेहद फूहड़ थी. “सैंया जी दिलबा मांगेलन गमछा बिछाई के” सुपरहिट गीत साबित हुआ और अश्लील गानों के साथ फूहड़ दृश्यावली भोजपुरी फिल्म की विशेषता बन गई.

कई बड़ी हिन्दी फिल्मों के निर्देशक रहे राज सिप्पी ने अपनी पहली भोजपुरी फिल्म को फूहड़ दृश्यों वाली पटकथा और अश्लील गीतों से तो बचा लिया है मगर भोजपुरी संवेदना और संगीत की धमक पैदा करने में पूरी तरह असफल रहे हैं. यही वजह है कि जो भोजपुरी फिल्में पहले औरतों की विशेष पसंद हुआ करती थीं और भोजपुरी फिल्में देखने के लिए भोजपुरी औरतों का जो हुजूम उमड़ा करता था, इस फिल्म के प्रदर्शन के दौरान भी नदारद है. मुम्बई के अन्धेरी स्थित ‘नवरंग’ सिनेमाघर के लगभग हाउसफुल दर्शकों में बमुश्किल दो-तीन औरतें दिखीं. निर्माता ने राजसिप्पी को बजट देने में कोई कोताही नहीं की. अभिनेताओं में रविकिशन और पवन सिंह ने भी अपना ‘द बेस्ट’ परफॉर्मेंस दिया है. मगर तकनीकी तौर पर कुशल निर्देशक राज सिप्पी एक बढ़िया भोजपुरी बनाने में असफल रहे. फिल्म में एक्शन का ओवरडोज है. हालाँकि एक्शन मास्टर नन्दू ने तमिल-तेलुगु फिल्मों और उसी को फॉलो कर हिन्दी फिल्मों में चल रहे एक्शन के ट्रेंड को बनाए रखा है, और दर्शकों को बाँधे रखने में सफलता भी पाई है.

स्टार कास्ट: रवि किशन, पवन सिंह और मधु शर्मा

निर्देशक- राज सिप्पी. संगीत- बप्पी लाहिरी. एक्शन- नन्दू . सिनेमैटोग्राफर- वसु. एडिटर-संजय जायसवाल.

निर्माता- मैड्ज मूवीज एवं समीर आफताब
 



   धनंजय कुमार

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