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Movie Review
इंदु सरकार:आपातकाल का सामाजिक सच


कहानी तथा पटकथा: मधुर भंडारकर, अनिल पांडे संवाद: संजय छैल  

भारतीय जनता पर 1975 में थोपी गई एमरजेंसी हिटलरवाद का प्रतीक मानी जाती है। इस दौरान में सरकार ने आम जनता को किस तरह दबाना चाहा - प्रशासन ने तत्कालीन सरकार के नुमाइंदों को खुश करने के लिए कैसे कैसे जुल्म जनता पर ढाए - भारतीय परिवारों और समाज पर एमरजेंसी के क्या प्रभाव पड़े - इन सब बातों का जायजा निर्देशक मधुर भँडारकर, लेखक संजय छैल और अनिल पांडे की फिल्म इंदु सरकार लेती है। हालांकि काफी समय से लोग इंदु सरकार शीर्षक से इंदिरा गाधी को टारगेट मानते रहे पर ये फिल्म एक बंगाली पति के सरकार सरनेम को ओढने वाली अनाथ लड़की की कहानी है।

कहानी के मुताबिक इंदु (कीर्ति कुल्हारी) अनाथालय में पली-बढी एक लड़की हैं जो दिखने में तो काफी आकर्षक है पर वो हकलाती है। और बोल नहींं पाती है। बचपन से ही ना बोल पाने से मिले एकांत को वो अपने अध्ययन के जरिए मिटाना चाहती है। वो कविताएं लिखने लगती हैं। लेकिन उसके हकलाने की वजह से उसके हॉस्टल की वार्डन भी उसे रोकती है कि वह कविता ना करे। इन सब पाबंदियों के साथ जवानी की दहलीज पर कदम रखने वाली इंदु के हौंसले समाज एक बार फिर पस्त करने की कोशिश करता हैं जब वह सामूहिक विवाह समारोह में शादी के लिए जाती हैं। वहां उसके लिए आए सारे रिश्ते उसके बोल ना पाने के कारण चले जाती हैं। वो उदास है लेकिन ऐसे समय में अपनी शादी के लिए आए नवीन सरकार (तोताराय चौधरी) से टकरा जाती है। सरकारी मुलाजिम नवीन सरकार अपने अकेलेपन और उसकी विवशता के तारों को जोड़ उसे अपनी धर्मपत्नी बना लेता है। दो जीवन सुखमय चल रहा है कि देश में एमरजेंसी की लहर तेज हो जाती है। अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रही जनता का सरकार दमन कर रही है। इधर इंदु का पति नवीन ना केवल सरकार में मुलाजिम है बल्कि सरकार के मंत्री के साथ उसकी दांत-काटी रोटी है। सो वह एमरजेंसी का तगड़ा पक्षधर है। इधर इंदु एमरजेंसी द्वारा जनित एक घटना से प्रभावित हो जाती है और इससे उसका डरा-सहमा व्यक्तित्व मुखर होता है।

इन्दु एक एक ऐसी लड़की है जिसके ज़हन में हर हाल में एक अच्छी पत्नी बनने का ही लक्ष्य है। लेकिन उसकी अंतरात्मा की आवाज उसे अपने पति के खिलाफ ही खड़ा कर देती है। 

फिल्म को देखते समय लगता है कि मधुर भंडारकर एक बार फिर अपने प्रारंभिक दिनोंं में लौटे हैं, जब उन्होंने अपनी फिल्म चांदनी-बार बनाई थी।

फिल्म में चरित्र-चित्रण गज़ब का है। इंदु के किरदार को कवियत्री बनाकर दूर कहीं अपने दर्शक के दिल में ये बात बैठा देते हैं कि कविता से ही क्रांति जन्म लेती है। फिल्म के संवाद संजय छैल ने बहुत अच्छे लिखे हैं। मसलन जब नायिका अपने पति से पूछती है कि आपकी आंखों में काले घेर क्यों आ गए हैं पति कहता है सपने देखने के साइड इफेक्ट है।

अधिकतर नारी मन को अपनी फिल्मों में रखने वाले मधुर को इस बार लीड रोल में कोई बड़ी स्टार तो नहींं पर निंश्चित रूप से बड़ी कलाकार कीर्ति कुल्हारी का साथ मिला है। कीर्ति ने अपने सटीक अभिनय से इंदु के किरदार को जीवंत कर दिया है। विशेषकर उन्होंने हकलाने की पीड़ा को भली भांति चेहरे पर सजाया है। इस मामले में वो शाहिद कपूर और रणवीर कपूर से कोसों आगे निकल गई हैं। तोता राय चौधरी के रूप में मधुर भँडारकर एक और अतुल कुलकर्णी हिंदी सिनेमा के लिए लेकर आए हैं। 

हां ये बात फिल्म में थोड़ा खलती है कि इंदिरा गांधी के रोल पर पूरी कैंची फिल्म में चला दी गई है। वे सिर्फ अंत में एक सीन में दिखती हैं। नील नितिन मुकेश ने संजय गांधी के व्यक्तित्व को साध लिया है लेकिन इसमें ताज्जुब नहींं क्योंकि मधुर भँडारकर के प्रति अपनी आस्था वे जेल में न्यूड सीन देकर पहले ही व्यक्त कर चुके हैं।

एक समीक्षक की सीट पर बैठे शायद मैं ये बात आसानी से लिख सकता हूं कि मधुर इंदु सरकार में पेज थ्री जैसा माहौल पैदा नहींं कर सके। लेकिन उन्होंने चांदनी बार जैसा माहौल फिर से बनाया है ये क्या कम है? वैसे तो ये फिल्म हर समझदार दर्शक के दिल को छूएगी। पर इसे नव युवा दंपत्ति और खासकर अभिनय से जुड़े लोग कीर्ति कुल्हारी के लिए जरूर देखें।



   धर्मेंद्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं.

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