1
 






























Movie Review
मुन्ना माइकल:लक्ष्य से भटकती कहानी


सिनेमाई धारा में कहानी को फिल्म में ढालते हुए उसके विकास के साथ थोड़ा परिवर्तन अच्छी बात है, लेकिन जिस लक्ष्य को लेकर कहानी की शुरुआत  होती है, उसे ही जब निर्देशक भूल जाए तो सब गुड़ गोबर हो जाता है। 

इस शुक्रवार को रिलीज हुई लेखिका विमी दत्ता, निर्देशक शब्बीर खान की फिल्म मुन्ना माइकल जो अपने कैंची टाइटल से प्रभावित कर रही थी। फिल्म का स्नॉप्सेज भी ये बयां कर रहा था कि ये फिल्म युवाओं के बीच डांस के लिए एक नया जज़्बा पैदा करेगी। लेकिन फिल्म को देखकर सारे अरमान धरे के धरे रह गए।  

यूं फिल्म अपने शीर्षक से तो एक हीरो की कहानी लगती है, लेकिन फिल्म के शुरूआती दृश्यों को छोड़ दें तो ये फिल्म पूरी हीरोइन की कहानी हो जाती है। दर्शक फिर भी चुप है लेकिन यहां पर भी कहानी अपने लक्ष्य से भटक जाती है।

फिल्म की कहानी कुछ इस प्रकार है कि माइकल (रोनित राय) जो एक अच्छा डांसर होने के बावजूद परिस्थितिवश डांस की दुनियां में अपने सपने पूरे नहींं कर पाता है।  वो एक रात को अपने घर पर लौट रहा होता है कि उसे सड़क पर एक बच्चा मिलता है। वो उसे पाल लेता है । बच्चा अपनी धुन में एक गाने पर डांस करते हुए जवां मुन्ना माइकल (टाइगर श्रॉफ) के रूप में दर्शकों के समक्ष प्रकट होता हैं।

अपने पिता की परवरिश और सपनों के चलते मुन्ना में भी गजब डांस टैलेंट है और उसे इस पर पूरा विश्वास भी है। वो अपने दोस्तों के साथ मुंबई के डांस क्लब में जाकर वहां अमीरजादों से शर्त रखकर डांस पेश करता है, और शर्त जीतकर आए दिन नोट कमाता रहता हैं। लेकिन एक दिन किसी अमीरजादे को नीचा दिखाने के कारण उसकी गैंग की इंट्री सभी डांस क्लब में बंद हो जाती है। इस पर मुन्ना मुंबई से दिल्ली आ जाता है ।

दिल्ली में भी वो वही काम करता है लेकिन यहां जब वो अपनी डांस की शर्त जीतने के बाद पैसा लेकर जा रहा होता है तब होटल में वल्ली (पंकज त्रिपाठी) और उसके साथी मुन्ना पर हमला बोल देते हैं। मुन्ना इन सबसे तो बच जाता हैं लेकिन उसे एक इसंपेक्टर गिरफतार करके महेंद्र भाई (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) के पास लेकर आता है । दरअसल मुन्ना ने महेंद्र के क्लब में ही तोड़फोड़ कर उसके आदमियों को मारा है।

लेकिन यहां पर महेंद्र मुन्ना के डांस टैलेंट से प्रभावित हो जाता है और मुन्ना से उसे भी डांस सिखाने की शर्त रखता है। मुन्ना वक्त की नजाकत को देखकर मान लेता है। लेकिन मुन्ना इस बात को लेकर असहज है कि गैंगस्टर महेंद्र आखिर डांस क्यों सीखना चाहता है। इस पर महेंंद्र उसे क्लब में ले जाकर डॉली (निधि अग्रवारल) को डांस करते हुए दिखाता है। महेंद्र चाहता है कि वो उस लड़की को अपने डांस से इंप्रेस करे। खैर महेंद्र तो डांस नहींं सीख पाता लेकिन दोस्ती की खातिर वो मुन्ना महेंद्र का गिफट और मैसेज लेकर डॉली के पास जाता है।

फिल्म की कहानी यहीं से भटकने लगती है, क्योंकि वो दर्शक जो मुन्ना को डांस में कुछ कर गुजरने वाले युवा के रूप में देखने आए थे वे उसे फिल्म में संदेशवाहक के रूप में देखते हैं।  बहरहाल महेंद्र की डॉली को पाने की सनक, डॉली के डांसिग स्टार बनने की सनक के पीछे फिल्म की शुरुआत में मुन्ना का अपने नाम के पीछे मायकल जोड़ने के सपने को शब्बीर खान बिल्कुल भुला बैठते हैं।

निधि और नवाज को संवारने के चक्कर में शब्बीर माइकल को कमजोर कर बैठे। यकीन नहींं होता है कि एक लड़की के लिए अपने पिता पर बंदूक तानने वाला महेंद्र माइकल के सामने सहर्ष झुक जाता है। अगर माइकल और महेंद्र में संघर्ष होता तो शायद फिल्म का अंत अच्छा हो सकता था। 

इस बात में कोई दोराय नहींं कि सीधे सादे टायगर श्राफ ने कुछ फिल्मों से ही अपनी एक फैन फ़ॉलोइंग बना ली है। बच्चे और नवयुवक उनकी फिल्में देखने आते हैं, लेकिन अगर उन्होंने आगामी फिल्मों में अपनी उपस्थिति को लेकर हस्तक्षेप ना किया तो दर्शक उनसे दूर हो सकते हैं। सिर्फ अच्छे डांस और बंदर गुलाटी खाते हुए वे बॉलीवुड की वैतरणी को पार नहींं कर सकते हैं। उनकी पिछली फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर कमजोर रही। शब्बीर खान के साथ उनकी दो सफल फिल्में रही हैं और मुन्ना माइकल को सफलता की तिकड़ी के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन मुझे नहींं लगता कि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बड़ा कलैक्शन खड़ा कर सकेगी।

निर्देशक शब्बीर खान नवाज को भी सही ढँग से प्रस्तुत नहींं कर पाए। फिल्म में डांस सीक्वेंस अच्छे हैं और एक दो गीत भी जो इन दिनों रेडियो चैनल्स पर खूब बज रहे हैं। लेकिन अपने संपूर्ण प्रभाव में फिल्म निराश करती है। अगर आप नवाज और टाइगर के फैन हैं तो बेशक आप ये फिल्म देखने जा सकते हैं लेकिन इससे इतर आप सितारों से सजी एक अच्छी फिल्म देखने की अभिलाषा लेकर ये फिल्म देखने सिनेमाघर गए तो झुंझलाहट आपके हाथ लगेगी।



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं.

Click here to Top