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अनुराग बासु
लेखक-निर्देशक


























Movie Review
जग्गा जासूस:एक अधूरी सी काव्यात्मक कृति


गायन शैली में अपनी बात रखने का प्रचनल भारतीय समाज में पुराना है। आशु कवियों ने इस परंपरा को पाला पोसा है। भारतीय रंगमंच ने भी इस विधा को अंगीकार किया है। लेकिन पारसी थिएटर के प्रभाव से निकलते ही हिंदी सिनेमा ने लगभग इसे भुला दिया। चेतन आनंद की हकीकत के साथ एक-दो छुटपुट फिल्म और होंगी जिनमें संवादों की अदायगी को गीत की शैली में कलाकरों ने पेश किया हो।

वर्षों बाद सिनेमाघरों में एक बार फिर इसी परंपरा के दर्शन हुए जब इस शुक्रवार को पिक्चर शुरू प्रोडक्शन कृत लेखक निर्देशक अनुराग बासु की फिल्म जग्गा जासूस सिनेमाघरों में पहुंची। फिल्म एक पिता पुत्र के संबधों को देश और जासूसी के बीच समेटती है।

फिल्म की कहानी शुरू होती है पश्चिम बंगाल से जहां पर घटित एक घटना का जिक्र करते हुए अनुराग अपने नायक जग्गा तक पहुंचते हैं। आसाम के एक अस्पताल में जग्गा का जन्म होता है। अस्पताल से अपने घर लाकर उसे प्रोफेसर बागची (शाश्वत चटर्जी) प्यार से पालते हैं। वे नन्हें जग्गा के हकलाने की आदत को दूर करने के लिए उसे एक मंत्र देते हैं कि अगर वो गाते हुए अपनी बात रखेगा तो उसकी जुबान नहींं रुकेगी। लेकिन कुछ सालों बाद अपने दिल मे दबे कई राज के साथ जग्गा के पिता बागची उसे वहीं अकेला छोड़ एक मिशन पर निकल जाते हैं।

साल भर में अपने पिता के मिलने वाले एक बर्थडे वीडियो और कुछ फोन कॉल्स के साथ जग्गा जवानी की दहलीज पर पहुंच जाता है। वो आसाम के एक हॉस्टल में रहकर अपनी पढाई कर रहा हैं । अपने पिता के वचन को गुरू मंत्र मानते हुए जग्गा जवान होने तक तो अपनी हर बात को गाकर कहने लगा है । वो बोल कम पाता है इसलिए उसका दिमाग कुछ ज्यादा चलता है। वह गाते बजाते ही अपनी स्कूल की टीचर के मर्डर का पर्दाफाश करता है।

तभी उसकी जिंदगी मे तूफान की तरह एंट्री लेती है एक पत्रकार श्रुतिसेन गुप्ता (कैटरीना कैफ)। श्रुति हथियारों की सप्लाई को लेकर एक स्टोरी कर रही है । दोनों मिलते हैं। दोनों में प्यार तो नहीं होता लेकिन श्रुति की मदद करके जग्गा उसका दिल जीत लेता हैं। श्रुति कोलकाता लौटते समय उससे कह जाती है कि जब भी उसे उसकी मदद की जरूरत हो तो वह उसके साथ खड़ी होगी। कुछ समय बाद ही ऐसा हो जाता हैं जब अपने पिता की ओर से मिलने वाला सालाना विडियो जग्गा को इस बर्थडे पर नहींं मिल पाता है। 

उसे अपने पिता की मौत का समाचार मिलता है लेकिन वह इस समाचार से मुतमईन नहींं है क्योंकि उसे पता है कि उसके पिता जिंदा हैं, और वो अपने पिता को खोजने के लिए निकल पड़ता हैं।  इस सफर में उसकी हफसफर होती है श्रुति । यहां से विभिन्न पडावों से गुजरती हुई कहानी अंत को पकड़ती है।   

ये फिल्म पिछले कुछ सालों से ये अंडर प्रोडक्शन थी। इसकी शुरूआत बड़ी इंटे्रस्टिंग थीं। बर्फी के बाद अनुराग बासु और रणबीर कपूर की जोड़ी से आस बंधी थी। रणबीर -कैटरीना की जोड़ी को हॉट माना जा रहा था  लेकिन इस फिल्म के बनते बनते रणबीर और कैटरीन के संबधों में आई खटास ने सब गुड़गोबर कर दिया। इसके साथ ही बिना मुकम्मल स्क्रिप्ट के ऑन फ़्लोर जाने वाले निर्देशक अनुराग, संपादन टेबिल पर अपने कथ्य को दिशा देने में कमजोर पड़ गए। उन्हें बॉक्स ऑफिस पर  इस बार मात मिलेगी ये फिल्म देखकर निश्चिंत सा हो जाता है।

फिल्म में बातचीत को गाकर प्रस्तुत करने की शैली नायक के साथ रहती तब तक तो अच्छा रहता लेकिन सारे प्रमुख किरदार जब अपनी बातें गाते हुए करने लगते हैं, तो कई जगह कोफ़्त पैदा होती है।

इंटरवल तक तो सब कुछ ठीकठाक रहता है लेकिन इसके बाद क्लाइमेक्स आते आते फिल्म भारी हो जाती है। नायक ज्यादा बोल नहींं रहा है और भाग दौड़ कुछ ज्यादा ही क्रिएट हो चुकी है। रणबीर अपनी अदाओं से हंसाते हैं पर वो देश, हथियार सप्लाई और इन बड़ी मिस्ट्री के चलते नायक स्वरूप को गंवा देते हैं।

अनुराग बसु ने रणबीर के बाल स्वरूप को संवारा है लेकिन वे शायद ये भूल गए कि वे कोई बाल फिल्म नहींं बल्कि समस्त दर्शकों के लिए एक मनोरंजन से भरपूर फिल्म बनाने जा रहे थें। जहां बात देश-हथियार सप्लाई जैसी मिस्ट्री की हैं तो नायक का व्यक्तित्व दमदार होना चाहिए ।

बेशक, फिल्म का गीत-संगीत फिल्म के अनुरूप है। और फिल्म में गाने मोतियों से पिरोए लगते हैं। फिल्म में चमकीले रंग हैं, जो बड़ें पर्दे पर फिल्म देखते समय दर्शकों को आकर्षित करते हैं।

फिल्म कहानी के बाद बंगाली अभिनेता शाश्वत चटर्जी ने एक बार फिर अच्छा काम किया है। गीतकार अमिताभ भट्ट्चार्य ने फिल्म के लिरिकल संवाद लिखे हैं। लेकिन संवाद शैली में अच्छे शिल्प गढ़ने के चलते वे तुकबंदी को नजरअंदाज कर देते हैं। फिल्म अपने कंटेट से भटक जाती है, जहां अन्य किरदार, बेतुकी बातों को तुकबंदी मे लाने का असफल प्रयास करते हैं।  लेकिन इस फिल्म के सामने कोई बडी फिल्म ना होने के कारण इसे दर्शक मिलेंगे। बच्चों के ये फिल्म खूब एंटरटेन करेगी। अगर आप पारिवारिक दर्शक हैं तो बच्चों के साथ फिल्म देखने जरूर जाइए। फिल्म में जासूस के साथ जीव-जंतुओं को भी अच्छा प्लेसमेंट मिला है। युवा दर्शक जो रणबीर कपूर और कैटरीना के प्रशंसक हैं, उनके लिए तो ये फिल्म एक उपहार है। 



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं.

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