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अश्विनी धीर
लेखक-निर्देशक


रॉबिन भट्ट
लेखक


























Movie Review
गेस्ट इन लंदन:हंसाती, रुलाती और सिखाती


बड़ों की जीवन में भारी महत्ता होती है, वो साथ होते हैं तो एक वट वृक्ष की तरह हमें निर्मल छांव देते हैं। लेकिन हम मानसिक विद्रूपताओं से जन्मी स्वातंत्र्य भावनाओं के चलते अपनी ज़िंदगी से इस वट वृक्ष को काटने लग जाते हैं। फिल्म में एक जगह नायक नायिका से कहता हैं हम अकेले हैं सो हमारा जो मन चाहेगा वो करेंगे, किचिन में प्यार करेंगे, बाथरूम में नाचेंगे इत्यादि.... खैर, ये कहानी तो लंदन की जमीं पे रोपी गई है पर भारत में भी घुसपैठ कर चुकी पश्चिम आयातित स्वतंत्र्य आंंकाक्षांंओं ने हमारी संस्कृति का सर्वनाश किया है।

इस शुक्रवार को रिलीज हुई निर्माता कुमार मंगत - अभिषेक पाठक, लेखक रॉबिन भट्ट और निर्देशक अश्विनी धीर की फिल्म गेस्ट इन लंदन दर्शकों में भावनाओं का ज्वर जगाती है। वैसे तो इस बार भी निर्देशक अश्विनी धीर ने कहानी के ढांचे को ज्यादा हिलाया नहींं है पर इस बार खास है कि चाचाजी लंदन अकेले नहीं आए। इस बार उनके साथ चाची भी हैं। सो फिल्म में परिवार का माहौल आ गया है।  

तो दोस्तों, फिल्म की कहानी कुछ इस प्रकार है कि लंदन में बसा युवा सॉफ़्टवेयर इंजीनियर आर्यन (कार्तिक आर्यन) अमेरिका की नागरिकता चाहता हैं, इसलिए वो एक कैब ड्रायवर लड़की अनाया पटेल (कृति खरबंदा) के साथ नागरिकता पाने के लिए झूठी शादी करना चहता है। दोनों ने अपने प्रयासों से कोर्ट में साबित कर दिया है कि वे फ़र्जी शादी नहींं करेंगें और आदर्श जोड़े की तरह ताज़िंदगी एक दूसरे का साथ देंगे। लेकिन नागरकिता के लिए शादी करने वाले अनेक जोड़े शक के दायरे में है। किसी को शक ना हो इसके लिए अनाया कार्तिक के घर रहने आ जाती है।

इतने में एंट्री होती है चाचाजी (परेश रावल) की जो लंदन घूमने के लिए अपनी धर्मपत्नी (तन्वी आजमी) के साथ आए हैं। अंजाने चाचाजी के साथ भारी भरकम चाची को देख आर्यन का भी वही हाल होता हैं जो पिछली फिल्म में पप्पू (अजय देवगन) का होता है। चाचा और चाची उनकी ज़िदंगी में दाखिल हो जाते हैं, पहले तो इसे लेकर आर्यन और अनाया सहज नहीं होते लेकिन अपनी पारिवारिक परिस्थितियों को लेकर पहले ही लंदन कोर्ट के सामने मुसीबत झेल रहा ये जोड़ा चाची और चाची को अपने घर में कुछ समय के लिए स्वीकार कर लेता हैं।

इसके चलते इस युवा जोड़े की कोर्ट में होने वाली फर्जी शादी अब कोर्ट में संपन्न होने की बजाय गुरद्वारे में होकर एक बड़े समारोह में तब्दील हो जाती है। चाचाजी ना केवल पड़ौसियों को अपने साथ जोड़ लेते हैं बल्कि वे आर्यन के सहकर्मियों के बीच भी छा जाते हैं।

पिछली फिल्म में जहां पप्पू और उसकी पत्नी चाचा के आने से प्रताड़ित होते हैं यहां एसा नहींं होता क्योंकि बहु अनाया माता-पिता के प्यार से महरूम रही है और चाचा-चाची के होने के कारण उसे परिवार का प्यार मिल जाता है। यहां तक कि अपने चाचा-चाची के चलते आर्यन अपने बॉस से भी लड़ाई मोल ले लेता है। पर शादी के बाद इस जोड़े को लगता है कि शायद उनकी निजी जिंदगी पर चाचा-चाची कब्जा कर बैंठे हैं। यहीं से परिस्थितियां बदलती हैं और फिल्म दर्शकों को एक मैसेज देते हुए भावनात्मक अंत के साथ समाप्त होती है।

बेशक फिल्म आपको हंसाती, रुलाती और गुदगुदाती तो है ही पर सिखाती भी खूब है। वे लोग जो अपनी जड़ों से कटे हैं वे इसे देख खुद को कहानी से जुड़ा हुआ महसूस करेंगे।

निर्देशक अश्विनी धीर ने अतिथि तुम कब जाओगे की तर्ज पर ही अपने किरदारों का गठन किया है। संजय मिश्रा एक पाकिस्तानी पड़ौसी के रूप में दमदार किरदार में नजर आएं हैं जो अपने संवाद अदायगी से दर्शकों को खूब हंसाते हैं। सोशल वैबसाइट्स पर पाकिस्तान का बैंड बजाने वाले दर्शकों के लिए निर्देशक ने खूब पंचेज रखे हैं। 

फिल्म में कई सीन अच्छे बन पड़े हैं जो बेहतरीन संवाद अदायगी और भारतीय संस्कारों के साथ सुधि दर्शकों को भी बांधते हैं। खासकर कृति खरबंदा  और तन्वी आज़मी का एक दृश्य जहां वो रिश्तों के रसायन को अपनी बहू को विरासत के रूप में देती है, या कृति खरबंदा और कार्तिंक आर्यन के बीच फिल्माया वो दृश्य जहां वे झूठे रिश्तों के दरियां से निकल प्रेम के महत्व को जिंदगी में जगह देते हैं। परेश रावल और संजय मिश्रा और तन्वी आज़मी तो सधे हुए कलाकार हैं ही, पर इनके साथ कार्तिक आर्यन और कृति खरबंदा भी पूरी मेहनत के साथ अपनी ज़िम्मेदारी को निभाते हैं।

फिल्म इंटरवल तक दर्शकों को बांधे रखती हैं लेकिन इंटरवल के बाद छुटपुट कमजोरियां भी उजागर होती हैं। मसलन जो लड़का नागरिकता लेने के लिए एक लड़की से शादी करना चाहता है, उसका अजनबी चाचा के अपमान की खातिर अपने बॉस से लड़ाई मोल लेना थोड़ा खटकता है। भावना के प्रवाह में दर्शक इसे बेहिचक स्वीकारते भी हैं, पर कुछ सीन के बाद ही आर्यन और अनाया का चाचा-चाची से यूं अजनबी होना फिल्म के फर्स्ट हाफ में दिखाए दृश्यों का मजाक उड़ाता सा प्रतीत होता है।

हां, फिल्म में अजय देवगन का अतिथि प्राकट्य फिर् से अंत को भावनात्मक संबल दे देता हैं। लेकिन 26-11 के हादसे से फिल्म के अंत को जोड़ना वर्तमान से फिल्म को काट देता है। चूंकि अब 26-11 पुरानी घटना हो चुकी है। उससे प्रभावित किरदारों की कहानी अब भूतकाल हो चुकी है।

बहरहाल फिल्म पैसा वसूल हैं जो बड़े, बूढे, जवान, बच्चों और प्रेमी जोडों को भी खूब पसंद आएगी। बेझिझक आप फिल्म देखने जाएं क्योंकि भले ही फिल्म का नाम है गेस्ट इन लंदन पर भारतीय भावना से भीग जाएगा आपका तन-मन।   



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं.

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