1
 






मकरंद माने
लेखक-निर्देशक


























Movie Review
रिंगन:श्रद्धा और सबूरी का जीवन चक्र


रिंगन (रिंगण) का मतलब होता है चक्र. रिंगन एक वारकरी परंपरा का खेल भी है. पालखी के चारो ओर गोलाकार घुमना - इस तरीके से ये खेल खेला जाता है. मुझे लगता है इस खेल का अर्थ हमारे जीवन से है. हम जीवन भर सुख या भगवान की खोज में गोलाकार घूमते रहते है. मगर सुख या भगवान तो हमारे भीतर है. रिंगन के भीतर जो पालखी होती है वही हमारा मन है और मन में ही सुख है. 
 
मकरंद माने की पहली फिल्म है रिंगन जिसने राष्ट्रीय और राज्य पुरस्कार जीते हैं. ये आश्चर्य की बात है जिस फिल्म को २०१५ में पुरस्कार मिला वो फिल्म २०१७ में रिलीज हुई. ये मराठी फिल्मी जगत की त्रासदी है. रिंगन की कथा अर्जुन मगर (शशांक शेंडे) और उसका बेटा अभिमन्यु उपनाम आबडू (साहील जोशी) की है. अर्जुन ने अपनी जमीन साहूकार के पास गिरवी रखी है. अर्जुन की पत्नी का देहांत हो चुका है. उसके पास जीवन जीने के साधन नहीं हैं. उसके जीने की एकमात्र वजह है उसका बेटा आबडू. रिंगन की शुरुआत एक दुस्‍वप्‍न से होती है. जहां अर्जून बंजर भूमि में दौड रहा है और एक वृक्ष के पास आकर रुकता है. उस वृक्ष की शाखाओं पर कई लोग लटके है. ये दृश्य हमे महाराष्ट्र के किसानों की परिस्थिति का एहसास दिलाता है. पहले ही दृश्य में मकरंद माने निर्देशकीय कुशलता से समीक्षको का दिल जीत लेते हैं. इस दृश्य की नीरवता बहुत कुछ कह जाती है. आबडू एक प्यारा सा छोटा बच्चा है, जिसे लगता है कि उसकी मां भगवान के घर गई है. इसलिए वो अपने पिताजी से मां को वापस घर लाने की बात कहता रहता है. साहूकार से जमीन छुड़ाने के लिए अर्जुन अपने रिश्तेदारों से पैसे मांगता है. मगर जब उसकी सारी उम्मीदे हार जाती है, तब वो भगवान के घर यानी पंढरपुर चला जाता है. आबडू को लगता है कि पंढरपुर में ही उसकी मां रहती है. अब सफर शुरू होता है श्रद्धा और सबूरी का.
 
हम हिंदुस्थानी लोग व्यावसायिक और कलात्मक फिल्मो में बड़ा भेदभाव करते है. मुझे लगता है कि हर निर्माता पैसे कमाना चाहता है. इसलिए सारी फिल्मे व्यावसायिक होती है. रिंगन जैसी फिल्मों में झूठे दृश्य नहीं होते. बल्कि मानव जीवन का अन्तर्भाव होता है. फिल्म की कथा जितनी सरल है, उतनी ही सरल उसकी पटकथा है. शुरुआत से लेकर अंत तक फिल्म की पटकथा भटकती नही है. पटकथा फिल्म के विषय के साथ न्याय करती है. अर्जुन का सामान चोरी होना, भिखारी के साथ भीख मांगना, रास्ते पर पड़ी विठ्ठल की मूर्ती के साथ बाते करना, वेश्याओं की बस्ती की दिखावट, हर दृश्य बेहतरीन है. इस फिल्म में कुछ हास्य दृश्य है. हालांकि यह दृश्य देखकर हम हंस हंस कर पागल नहीं होते. मगर हमारे चेहरे पर प्रसन्नता की मुस्कुराहट जरुर खिलती है. अबड्या जिस तरह से अपनी मां को वेश्याओं की बस्ती में खोजता है, ये दृश्य बड़े ही दिलचस्प है. मकरंद माने अबड्या की मासूमियत कायम रखते है. 
 
अगर हम किरदारों की बात करें, तो शशांक शेंडे एक बेहतरीन कलाकार है. महाराष्ट्र के बेबस किसान पिता का किरदार उन्होने इस तरह से निभाया है कि हमे कही पर भी शशांक शेंडे नजर नही आते. वो पूरी फिल्म में अर्जुन मगर ही लगते है. ये उनके अभिनय की खूबी है. अबड्या का किरदार निभाने वाले साहील जोशी ने दर्शकों का दिल जीत लिया है. बाकी के किरदार जैसे वेश्या (कल्याणी), मूर्तिकार निलेश (अभय महाजन), अर्जुन का सहकर्मी (सुहास शिरसाट) फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है. उन किरदारों का फिल्म में होना महत्वपूर्ण है. कहानी आगे बढ़ाने के लिये ये किरदार फिल्म में नहीं है. बल्कि ये किरदान इस कहानी का हिस्सा है और वो कहानी को आगे बढ़ाते है. हर किरदार कुछ ना कुछ कह जाता है. वेश्या की मजबूरी, निलेश का अबड्या को मार्गदर्शन करना, अर्जुन का मजेदार स्वभाव किरदारो को जीवित करता है. फिल्म के लोकेशन्स हमे पंढरपुर के पावन क्षेत्र में ले जाते है. छायांकन भी सुंदर है, हर दृश्य जीवित लगता है. फिल्म का संगीत भी बेहतर है.
 
मनोरंजन के साथ फिल्म हमे संदेश भी देती है. लेकिन ये संदेश हमे कथा के रूप में मिलता है. फिल्म बिलकुल उपदेशात्मक नही है. श्रद्धा और सबूरी जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. हमे कौनसे पथ पर चलना है इसका निर्णय हमे लेना है. मगर उस पथ पर हमें श्रद्धा होनी जरूरी है. अगर मन में श्रद्धा ना हो तो जीवन कृश हो जाता है. ये श्रद्धा केवल भगवान के लिये नही. ये श्रद्धा जीवन के लिये है, ये श्रद्धा आशा के लिये है. श्रद्धा और सबूरी का जीवन चक्र है. संक्षेप में, रिंगन एक उत्कृष्ट फिल्म है. 


   जयेश शत्रुघ्न मेस्त्री

.

Click here to Top