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Movie Review
एक हसीना थी एक दीवाना था:बेहद बोरिंग अफसाना था!


कहानी एवं पटकथा: सुनील दर्शन अतिरिक्त पटकथा: आकाश दीप संवाद: कुशल वेद बख़्शी, उदीप्त दत्त ग़ौर

 

फिल्म वितरक दर्शन सब्बरवाल के बेटे सुनील दर्शन और धर्मेश दर्शन ने इंडस्ट्री को एक जमाने में राजा हिंदुस्तानी और जानवर जैसी हिट फिल्में दी हैं पर तीसरी पीढ़ी के शिव का बतौर एक्टर बॉलीवुड में टिक पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन नजर आता है। उनके पिता निर्माता-निर्देशक सुनील दर्शन की ये दूसरी कोशिश है जिसमें वो अपने बेटे को फिर से स्थापित करने की नाकाम सी कोशिश करते हैं।

श्री कृष्ण इंटरनेशनल के बैनर तले इस शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्म एक हसीना थी एक दीवाना था एक ऐसी फिल्म है जो ना तो अपने कथ्य और ना ही अपने प्रस्तुतिकरण से रोचक बन पाती है। फिल्म में वहीं घिसे-पिटे फार्मूलों को डालकर निर्देशक रोमांच बनाना चाहते हैं।

फिल्म की कहानी के मुताबिक सनी (उपेन पटेल) अपनी मंगेतर नताशा (नताशा फर्नांडीस) के साथ एक सुनसान स्थान पर बनी एक महलनुमा इमारत में पहुंचता है। दरअसल वो इमारत नताशा के पूर्वजों की प्रॉपर्टी है। नताशा की यहां महिने भर बाद सनी से शादी होने वाली है। यहां पर इन दोनों की मेजबानी नताशा के पिता के कर्मचारी करते हैं। कहानी में दिखाया जाता हैं कि ये इमारत पिछले कई सालों से बंद पड़ी थी क्योंकि इस इमारत में एक घुड़सवार को मौत के घाट उतार दिया गया था। हम एक पुराने चित्र में इस घुड़सवार देवधर (शिव दर्शन) को देखते हैं। लेकिन नायिका के इस इमारत के करीब पहुंचते ही युवा रूप में देवधर नताशा के सामने प्रकट होता है। नताशा भी सनी को छोड़ देवधर के प्रेम में रंग जाती है। दर्शक इसे पुनर्जन्म की कहानी की तरह लेने लगते हैं । लेकिन फिर दर्शकों के समक्ष इस नवीन देवधर को भूत बता दिया जाता है तो दर्शकों के दिमाग में फिल्म की कहानी हॉरर लगने लगती है।

पर निर्देशक तब तक सस्पेंस का तीर चला देते हैं। और कहानी अपने मूल बिंदुओं से भटककर निहायत ही कमजोर से सस्पेंस के साथ खत्म होती है। इस फिल्म को देखने के बाद अहसास होता है कि बॉलीवुड में बनने वाली हिंदी फिल्मों में अपने परिवारजनों को हीरो हीरोइन बनाने के नाम पर कितना पैसा फालतू में बर्बाद हो जाता है। फिल्म में मनोहारी लोकेशन हैं लेकिन लोकेशन को सृजनात्मकता का साथ ना मिले तो सब फिजूल है।

पूरी फिल्म में सुनील दर्शन अपने जीर्ण शीर्ण पड़ चुके फिल्मी विचारों के तुणीर से एक तीर ऐसा नहीं निकाल पाते जिससे दर्शकों का धैर्य टिका रहे। शिव दर्शन और नताशा दोनों ही संवाद अदायगी में बेहद लचर साबित होते हैं।

फिल्म में नदीम (श्रवण) का संगीत है जिसमें वो अपने जमाने की ही याद दिला पाते हैं। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी साबित होती है, इसके किरदारों को विस्तार नहीं देना। किरदारों के विस्तार के अभाव में सिर्फ दृश्य संरचना के दम पर निर्देशक सुनील दर्शकों को कहानी से जोड़े रखना चाहते हैं। फिल्म के नायक देवधर का अचानक से आगमन और नायिका का एक झटके में अपने मंगेतर को दरकिनार कर देवधर के पीछे दीवानी हो जाना बिलकुल नहीं सुहाता।

सुनील दर्शन के इस सस्पेंस ड्रामे की प्रचार सामग्री देखें तो ये फिल्म युवा प्रेमी जोड़ों के बीच प्रेम त्रिकोण का आभास कराती है लेकिन मैं आज उस समय बक्का बक्का रह गया जब मेरे साथ फिल्म देख रहे गिने चुने दर्शकों में से एक प्रेमी जोड़ा बुदबुदाते हुए फिल्म का साठ प्रतिशत हिस्सा देखकर उड़न छू हो गया। इसलिए मैं अपने प्रत्यक्ष अनुभव के बाद किसी से नहीं कहूंगा कि फिल्म देखने जाऐं और अपना, पैसा और समय बर्बाद करें।



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं.

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