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कबीर ख़ान



मनु ऋषि



























Movie Review
ट्यूबलाइट (एक और समीक्षा) :आत्मबल में अनंत आस्था


कल से सुन रहा था कि फिल्म ट्यूबलाइट में यकीन शब्द का इतना इस्तेमाल किया है कि अंत तक यकीन ही याद रह जाता है। लोगों को ये कहते भी पाया कि एल ई डी के जमाने कहां ट्यूबलाइट की बातें। इसके साथ ही फर्स्ट डे क्लैक्शन का आंकड़ा भी रईस के पहले दिन की कमाई को पार नहीं कर पाया। इसलिए आज फिल्म देखने गया तो फिल्म पर मेरे यकीन की बुनियाद थोड़ी डगमगाई हुई थी पर फिल्म देखके लगा कि देश में गांधीवादी सिद्धातों और उर्दू की आवोहवा दिनोंं दिन कमजोर होती जा रही है। अब मैं कहना चाहूंगा कि हिंदी के होशियार लोग उर्दू के यकीन शब्द को हिंदी के आत्मबल में क्यंू नहीं देख पाए। वैष्णव परंपराओं में भी तो आत्मा सो परमात्मा का पाठ पढने को मिलता है। अगर कोई सच्ची आत्मा हो तो उसकी सोच में ईश्वरीय अलौकिकता का समावेश हो जाता है। चंूकि बच्चे निश्छल होते हैं, इसलिए मंदुबद्धि लक्ष्मण सिंह बिष्ट के यकीन में भी आत्मबल का प्रवाह है। अगर कबीर खान के किरदार लक्ष्मण सिंह बिष्ट के अंदाज में सोचूं तो शायद स्कूल में आए गांधी जी ने भी नन्हें लक्ष्मण को आत्मबल ही कहा होगा पर कबीर खान ने उसको यकीन में प्रत्यारोपित कर दिया। इसलिए यकीन का बहुतायात में रट्टा लगवाकर, कबीर सिनेरसिकों के समक्ष अपना मजाक उड़वा बैठे।

सलमान खान फिल्मस द्वारा निर्मित लेखक परवेज शेख, मनुरिषि चढ्ढा और निर्देशक कबीर खान की फिल्म की कहानी गांधीवादी सिंदंतों की पुर्नस्थापना करती हुई हमें आत्मबल में आस्था रखने का संदेश देती है। ये कहानी है पहाड़ों में बसे कस्बे जगतपुर के दो भाइयों लक्ष्ण सिंह बिष्ट (सलमान खान) और भरत सिंह बिष्ट की। बड़ा भाई लक्ष्मण यूं तो उम्र के मामले में भरत से बड़ा है पर उसमें जवां होने के बाद भी बाल भाव नहींं गया है और यहीं उसके व्यक्तित्व की कमजोरी है। माता पिता के निधन के बाद दौनों भाइयों को कस्बे में ही एक एन जी ओ चलाने वाले बन्ने चचा (ओमपुरी) ने पाला है। सभी लक्ष्मण को मंदबुद्धि होने के कारण ट्यूबलाइट कहकर चिढाते हैं। लेकिन उसका भाई भरत सबसे अपने भाई के लिए लड़ता है। दौनों भाइयो की जिंदगी एक दूजे के साथ के साथ खूब कट रही है कि अचानक भारत और चीन के बिगढ़ रहे संबधों की आहट जगतपुर में होती है।

देश भर से नौजवान सेना में भर्ती हो रहे हैं ताकि चीन का डटकर मुकाबला कर सकें। ऐसे में भरत सेना में जाने का निर्णय लेता है। पहले तो बन्ने चाचा उसे मना करते हैं लेकिन सबको ये आस है कि युद्ध की तैयारी जरूर हो रही है, पर युद्ध नहींं होगा। भरत जगतपुर में लक्ष्मण को अकेला छोड़कर कुमांऊ रेजीमेंट में भर्ती हो जाता हैं। इधर लक्ष्मण अकेला पड़ जाता है और अचानक युद्ध छिड़ जाता है। ऐसे में अकेले पड़े गए लक्ष्मण के अभिभावक के रूप में बन्ने चचा गांधीवादी सिंद्धातों को लक्ष्मण की जीवनचर्या में लाते हैं। अब तो लक्ष्मण गंाधी जी के सिद्धातों को अपने जीवन में प्रायौगिक रूप से उतारने की पुरजोर कोशिश करने ललग जाता है। इससे उपजी पीढा,आसुँओं के साथ ये कथा भावनाओं के गलियारे से गुजरती हुई अंत तक पहुंचती हैं।

फिल्म का फर्स्ट हाफ आपको पूरी तरह से बांधता है, लेकिन फिल्म सैंकड हाफ में आकर थोड़ी भटकती है, जहां लक्ष्मण के यकीन को कबीर खान पर्वत से भिड़ा देते हैं। दरअसल बोतल हिलने के समय तो जादूगर गोगा पाशा का जादू साथ होता है पर पहाड़ कैसे हिलता? लेकिन पहाड़ हिलता है। यहां थोड़ा भावनाओं का अतिरेक होता हैं।

फिल्म का गीत संगीत अच्छा है, गानों की सिचुएशन अच्छी है। फिल्म में भारतीय दर्शकों के लिए सब कुछ अच्छा है। ट्यूबलाइट का सबसे बड़ी कमजोरी है कबीर खान और सलमान का कमोजर यकीन। शायद यही समीक्षकों और सुधि दर्शकों को भी नहींं भाया इस फिल्म का देखकर एसा लगता है कि वो बजरंगी भाईजान की अप्रत्याशित सफलता के बाद अपनी अगली फिल्म में उसी फार्मूले के साथ लौटे हैं, जैसे उन्हें भरोसा ना हो कि वो बजरंगी भाईजान से इतर सलमान को लोग देखने में दिलचस्पी नहींं लेंगे। उन्होंने इस फिल्म में बजरंगी के रंगों को गहरा कर दिया है मसलन बजरंगी स्वाभाव से भोला भाला ही था तो उन्होंने लक्ष्मण सिंह को मंदबुद्धि ही बना दिया। इसी तरह बाल कलाकार मार्टिन को लाना, शाहरुख से कैमियों करवाना जैसी कई बातें हैं जो सुधि दर्शकों को कबीर खान के खुद पर विश्वास ना होने का आभास कराती हैं।

फिल्म की दृष्य संरचना अच्छी है, सवांद भी ठीक ठाक हैं, लेकिन निर्देशक कबीर खान निर्देशकीय दृष्टि से पीरियड को ढंग से कहानी में स्थापित नहंीं कर पाते हैं। किरदारों के कॉस्ट्यूम, परिवेश, सीन बैकड्रॉप में इस बात पर ध्यान नहींं दिया गया है। गांधी जी की बांतें होती हैं लेकिन कहीं भी किसी हॉल में गंांधी जी की तस्वीर से दर्शकों का सामना नहींं होता है।

फिल्म 1962 में ढंग से सेट नहींं हो पाती है। अब इसे ही देखिए कि पहाड़ी गांंव के लोगों से कबीर खान, लक्ष्मण के पेंट की जिप बंद करवाने की ताकीद करवा रहे हैं पर अपने छोटे अनुभवों के साथ कह सकता हूं कि उन दिनों पेंटों में जिप के बजाय मोटे बटन हुआ करते थे। बतौर दर्शक फिल्म पैसा वसूल है। इस फिल्म में आम भारतीय दर्शकों के लिए बहुत कुछ है, बस आप दिमाग में ये पूर्वागृह ना लेकर जाएं कि ये फिल्म अंगे्रजी फिल्म लिटिल बॉय पर आधारित है। फिल्म पारिवारिक है और भावुक दृष्यों में आंखें गीली कर देती हैं।



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं.

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