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कबीर ख़ान



मनु ऋषि



























Movie Review
टयूबलाईट:फड़फड़ाई बहुत लेकिन जली नहीं!


 
 
कथा: अमेरीकी फ़िल्म लिटिल बॉय पर आधारित 
पटकथा: कबीर ख़ान और परवेज़ शेख संवाद: मनुऋषि चड्ढा
 
इसे त्रासदी ही कहेंगे जब एक किशोर ईद की ख़ुशी मनाने की तैयारी में घर लौटते वक्त रेलगाड़ी में मौत के घाट उतार दिया जाता है, जबकि एक सितारा इसी दिन रिलीज़ हुई फ़िल्म में एक बच्चे को अपने भारतीय होने का प्रमाण देने के लिए भारत माता की जय बोलने को कहता है। बजरंगी भाईजान से सरहदों के आरपार एकता और रिश्तों के अपनेपन का संदेश देने वाले कबीर ख़ान ‘टयूबलाईट’ पर आते-आते अपनी कहानी के अंदर ही विरोधाभास का शिकार हो जाते हैं। क्या उनकी टयूबलाईट जल पाती है या नहीं आईए देखते हैं-
उत्तर-पूर्व भारत के कुमाऊं क्षेत्र के एक गांव में आज़ादी से पहले जन्मे लक्ष्मण सिंह बिष्ट (सलमान ख़ान) को उसके सहपाठी टयूबलाईट बुलाते हैं क्योंकि उसे हर बात देर से समझ आती है, जिस वजह से वह भीड़ में अकेला और मज़ाक का पात्र बन कर रह जाता है। उसके छोटे भाई भरत सिंह बिष्ट (सोहेल ख़ान) के आने के बाद उसकी दुनिया बदल जाती है। दोनों दो जिस्म एक जान हैं और एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। कहानी में मोड़ तब आता है जब भारत की चीन से जंग लगने की वजह से भरत को फ़ौज में भर्ती होकर लक्ष्मण से दूर जाना पड़ता है। बचपन में मां-बाप के देहांत के बाद दोनों को संभालने वाले अनाथ आश्रम के संचालक बन्ने चाचा (ओम पुरी) भी चाहते हैं भरत फ़ौज में जाए और लक्ष्मण अपने पैरों पर खड़ा हो। भरत को व्यस्त रखने और भाई की अनुपस्थिति में संबल बनाए रखने के लिए वह उन्हें गांधी जी की शिक्षाओं की एक सूची देते हैं। बड़े हो चुके लक्ष्मण का बाल मन इन शिक्षाओं को भोलेपन में इतनी गंभीरता से लेता है कि उसे लगता वह एक अदद यकीन से पहाड़ को भी हिला सकता है। लेकिन क्या वह भयावह जंग के मैदान में घिरे अपने जान से प्यारे भाई भरत को वापस ला पाएगा, टयूबलाईट की कहानी इसी एक सवाल के जवाब की तलाश करती है।
2005 में रिलीज़ हुई अमेरीकी फ़िल्म लिटिल बॉय के इस अधिकारिक एडेप्टेशन की पटकथा 1962 के दौर में भारत-चीन जंग की पृष्ठभूमि पर बुनी है ख़ुद निर्देशक कबीर ख़ान ने और उनका साथ दिया है परवेज़ शेख़ ने, जिसके शुरूआती हिस्से में लगता है कि कबीर ख़ान अपने बजरंगी भाईजाने वाले अंदाज़ को बरकरार रखते हुए सरहदों के आर-पार लोगों में मज़हब और कौम के नाम पर नफ़रत फैलाने वाली राजनीति पर व्यंग्यात्मक चोट कर रहे हैं। इसकी एक सटीक उदाहरण है बिल्कुल शुरू में आया संवाद (लेखक: मनुऋषि चड्ढा)- ‘पापा को शराब पी गई, मां को उनके ग़म ने मार दिया और गांधी जी की हमने मार दिया’। लगता है कि यह पटकथा आगे चल उन्मादी भीड़ के हिंसक रूप पर लक्ष्मण के मासूमियत भरे अंदाज़ में सवाल करेगी, लेकिन मध्यांतर आते-आते फ़िल्म विरोधाभास का तब शिकार हो जाती है जब लक्ष्मण फ़िल्म के एक मुख्य किरदार चीनी मूल के भारतीय बच्चे गूवे (मार्टिन रे तांगू) को अपनी भारतीयता साबित करने के लिए ना सिर्फ़ ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाने के लिए मजबूर करता है बल्कि दोनों में से कौन ज़्यादा ज़ोर से यह नारा लगा सकता है इस बात का मुकाबला भी करता है। इस तरह कबीर ख़ान उन्मादी भीड़ द्वारा राष्ट्रभक्ति परख़ने के फ़ामूर्ले को उचित ठहरा जाते हैं। उसके बाद उनका हिंदी-चीनी भाई-भाई का ज़ब्रदस्ती ठूंसा गया संवेदनाहीन कथानक वो प्रभाव नहीं छोड़ पाता जो बजरंगी भाईजान का पवन कुमार और मुन्नी की जोड़ी देने में सफ़ल रहते है। कबीर उन्मादी भीड़ के प्रतिनिधि नारायण तिवारी (जीशान आयूब) के ज़रिए हिंद-चीन युद्ध के दौरान कुमाऊं में सुरक्षित आसरे की तलाश में अपने बच्चे के साथ आई चीनी मूल की हिंदी भाषी महिला लिंग ली (ज़ू ज़ू) के साथ एक हिंसक टकराव तो पैदा करता है, लेकिन यह इतना सतही है कि आप कोई संवेदना महसूस नहीं कर पाते। 
दूसरी बड़ी समस्या कहानी की मूल भावना को पर्दे पर उतारने की है। राजकुमार हिरानी की तर्ज़ पर कबीर ख़ान बन्ने ख़ान और लक्ष्मण के अंर्तसंवाद के ज़रिए गांधी के विचारों को चर्चा में तो लाते हैं, लेकिन पर्दे पर एक्शन के रूप में यह विचार लक्ष्मण के एक ख़ास अंदाज़ में पर्बत को हिलाने की कोशिश से आगे नहीं बढ़ पाते। ज़्यादा से ज़्यादा यह बच्चे के साथ आईसक्रीम के आदान-प्रदान तक सिमट जाते हैं। यही नहीं एक मोड़ पर आकर तो वह मुन्ना भाई के विपरीत लक्ष्मण को हिंसक होने से भी नहीं रोक पाते। लक्ष्मण द्वारा नारायण को पीटना फ़िल्म के मूल फ़लसफ़े का दूसरा प्रमुख अंर्तविरोध उजागर करता है। गांधी के फ़लसफे के नाम पर ‘ख़ुद पर यकीन’ रखने के विचार को इतना ज़्यादा दोहराया गया है कि मध्यातर के बाद कुछ ही देर में यकीन होने लगता है कि यह फड़फड़ाती टयूबलाईट जल नहीं पाएगी। हां, कबीर ख़ान, नसलवाद पर आधारित हिंसा, उत्तर-पूर्वी नागरिकों से भेदभाव और भारतीयों के अंधविश्वास जैसे मसलों को उजागर करने में ज़रूर सफ़ल रहते हैं।
फ़िल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी ख़ुद सलमान ख़ान हैं। मज़बूत कहानी के अभाव में कबीर ख़ान ने पूरी पटकथा का भार सलमान के भावनात्मक किरदार के कंधों पर डाल रखा है। शुरू-शुरू में तो लक्ष्मण के सीधेपन से सहानुभूति पनपती है, लेकिन शुरू से अंत तक किरदार के ग्राफ़ में कोई ऐसी उठान आती हुई नहीं दिखती कि सहानुभूति गर्व में बदल सके। ले देकर कबीर सलमान को बार-बार ज़ब्रदस्ती रुलाने और पिटवाने पर ज़ोर देते हैं। यह ठीक है कि इस फ़िल्म में सलमान ख़ान ने अपनी पारंपरिक दबंग छवि से अगल हट कर अभिनय की भरपूर मांग वाला किरदार निभाया है, लेकिन वह काफ़ी ज़ोर लगा कर (जैसे कब्ज़ हो) रोने और पीड़ित होने के भाव चेहरे पर लाने की कोशिश करते हुए नज़र आते हैं। इस लिए बजरंगी भाईजान की सबसे दमदार कड़ी टयूबलाईट में सचमुच टयूबलाईट साबित होती है, जो फड़फड़ाती तो ख़ूब है लेकिन अंत तक जल नहीं पाती। लक्ष्मण और बालक गूवे के दृश्यों में कुछ उम्मीद जगती है और वह कुछ पल के लिए आंखों में चमक लाते भी हैं, लेकिन वह भी कुछ पल ही टिकती है। बहुत सारी जगहों पर पटकथा बोरिंग होने लगती है। कबीर ख़ान जंग के दृश्यों में भी ना तो विहंगमता ला पाए हैं और ना ही जंग की त्रासदी को पर्दे पर उतार पाएं हैं। 
सोहेल ख़ान के साथ सलमान की कैमिस्ट्री जमती है, बल्कि कई जगह पर सोहेल भारी पड़ते नज़र आते हैं लेकिन सीमित किरदार में वह भी ज़्यादा चमक नहीं पाते। ज़ू-ज़ू का किरदार चीनी मूल की हिंदीभाषी भारतीय महिला का है, लेकिन वह बामुश्किल हिंदी बोल पाती हैं, उनकी यह असहजता उनके हावभाव में भी बाधा बनती हुई नज़र आती है, जबकि बाल कलाकार मार्टिन की मासूमीयत दिल छू जाती है। ओम पुरी का लुक उनके अब तक के सब किरदारों से बिल्कुल अलग और ताज़गी भरा है। अदाकारी के मामले में तो उनका कोई सानी है ही नहीं।  जीशान आयूब अपने किरदार में जान डाल देते हैं। अन्य सहयोगी कलाकार भी अपनी-अपनी भूमिका में जंचे है। बस एक ही ख़ामी है कि ज़्यादातर किरदार ज़रूरत से ज़्यादा अच्छे हैं। यशपाल शर्मा द्वारा फ़ौजी अफ़सर राजबीर टोकस का निभाया गया किरदार ग्राफ़ के मामले में सबसे बेहतर बन पड़ा है। एक खांटी फ़ौजी अफ़सर से एक भावुक गार्डियन बनने तक के हावभाव को उन्होंने बेहतरीन तरीके से पर्दे पर उतारा है।
 
गीत-संगीत (प्रीतम) के मामले में शुरू के क्रेडिट्स पर आया किंतु-परंतु लक्ष्मण और भरत की आत्मीयता के मोंटाज़ के रूप में अच्छा बन पड़ा है। रेडियो गीत धीमी कहानी में एक जोश भरता है और दर्शकों को राहत भी देता है। बाकी गीत तो ठीक बन पड़े हैं लेकिन वह पटकथा में ना भी होते तो काम चल सकता था। वीएफएक्स के मामले में सलमान ख़ान द्वारा नदी में राख़ डालने वाला दृश्य काबिले तारीफ़ है। असीम मिश्रा ने कुमायूं क्षेत्र के पहाड़ों की विहंगम ख़ूबसूरती को इतनी प्रमाणिकता से पर्दे पर उतारा है कि मन करता है फ़िल्म से निकल कर सीधे पहाड़ों में चले जाएं। क्लाइमैक्स से पहले पहाड़ के सामने बेंच पर फ़िल्माया गया दृश्य यादगार है। 
 
अगर आप सलमान ख़ान के फ़ैन हैं और उनकी कोई भी फ़िल्म मिस करना नहीं चाहते तो आप को जाने से भला कौन रोक सकता है, लेकिन अगर आप दबंग सलमान के फ़ैन हैं तो एक सलाह लेते जाईए, इस बार आपकी मुलाकात दबंग नहीं बेबी सलमान से होगी, बस इतना ध्यान में रखिएगा। जय हो!


   दीप जगदीप सिंह

दीप जगदीप सिंह स्वतंत्र पत्रकार, पटकथा लेखक व गीतकार हैं। www.facebook.com/deepjagdeepsingh.

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