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इशिता मोईत्रा



बम्पी



























Movie Review
बैंक चोर:सस्ती कॉमेडी का शोर


कहानी: बलजीत सिंह मारवाह, बम्पी पटकथा: बलजीत सिंह मारवाह, बम्पी, ओमकार साने, इशिता मोईत्रा उधवानी संवाद: इशिता मोईत्रा उधवानी                        

 

मानव समाज में बढ़ते दबाब के चलते कुछ सालों से हिंदी सिनेमा में ऐसा दर्शक वर्ग बना है, जो सच्चाई और तर्क को तीन घंटे परे रख, सिनेमाघर में पहुंचकर आनंदित होना चाहता है। शायद इसलिए इस शुक्रवार को रिलीज हुई बैंक चोर जैसी फिल्में सिनेमाघरों में पहुंच रही हैं। यशराज फिल्मस के एक हिस्से बाई फिल्मस की ओर से निर्मित निर्देशक बंपी और लेखक बलजीत सिंह मारवाह, इशिता मोइत्रा उधवानी की फिल्म बैंक चोर दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करने का प्रयास करती है, लेकिन सस्ती कॉमेडी के भंवरजाल में फंसने से खुद को रोक नहीं पाती है।

ये कहानी हैं चंपक (रितेश देशमुख) की जो अपने पिती की बीमारी से परेशान है। वह उनके इलाज के खर्च के लिए वह बैंक लूटने का प्लान बनाता है। इस प्लान में वो अपने दो दोस्तों गैंदा (विक्रम थापा) और गुलाब (भुवन अरोड़ा) को भी जोड़ लेता हैं। पर अपनी लूजरनेस के चलते बैंक डकैती की योजना उनके बैंक पर धावा बोलते ही आउट हो जाती है। इसके चलते उनके बैंक से बाहर निकलने से पहले ही बैंक को पुलिस और मीडिया की गाड़िया घेर लेती हैं। यहां एंट्री होती है पुलिस ऑफिसर अमजद खान (विवेक ओबराय) की। अमजद खान ये अफवाह फैला देता हैं कि बैंक में बंधुआ बने स्टॉफ में से एक व्यक्ति अंडरकवर एजेंट हैं। इसे सुन बैंक चोरों के पेट में भी पानी हो जाता है। फिर राजनीति, पुलिस और बैंक चोरों के हास्य के साथ कई परतें खुलती हुई कहानी अंत का रुख लेती है।

फिल्म की कहानी बीच में रफ़्तार पकड़ती है लेकिन फिल्म में थ्रिल घुसेड़ने के चक्कर में दर्शक हास्य से भी जाते हैं। फिल्म की कहानी तो वही घिसी पिटी सी है लेकिन निर्देशक बंपी दृश्य संरचना से दर्शकों को जोड़े रखते हैं। इसके साथ ही चुटीले सवांदों में वर्तमान परिदृश्य, हिंदी फिल्मी हस्तियों से जुड़ा हास्य दर्शकों को बोर होने से बचाता रहता हैं। लेकिन दिल्ली बनाम मुंबई को हास्य का जरिया बनाना कुछ जमता नहींं। फिल्म के स्क्रिप्ट फॉर्मेट से ये ब्लफ मास्टर की याद दिलाती है।

लेकिन फिल्म की स्क्रिप्ट में वैसी कसावट नहीं है। हालांकि ये तर्कहीन फिल्म हैं और दिमाग से देखने पर आप इसे नहींं झेल सकते हैं। इतने बड़े बैंक में तीन चोर का यूं माजाक करना जबकि पुलिस ने उन्हें चारो तरफ से घेर रखा है ये कुछ जंचता नहींं है। फिल्म के जोक्स वहीं हैं जिन्हें हम व्हाट्स्प के जरिए अपने मोबाइल पर पढते हैं। लेकिन अभिनेताओं की एनर्जी इस फिल्म को बचाए रखती है।

काफी समय बाद इंडिया के पहले रैपर बाबा सहगल को बड़े पर्दे पर अभिनय करते देखना सुखद लगता है। लेकिन निर्देशक बंपी ने उनको उनके ही किरदार में डालके लोगों से उनकी खूब बेइज्ज्ती कराई है। आश्चर्य होता है कि आज के युग में जब छोटे से छोटा कलाकार अपनी इमेज को लेकर इतने चिंतित है तब अपना इतना भद्दा भजाक बाबा सहगल ने क्यूं उड़वाया ?

कुल मिलाकर फिल्म घाटे का सौदा साबित तो नहींं होगी लेकिन ऐसी फिल्में सिर्फ मनोरंजन के रिक्त स्थान कीपूर्ति करने का उद्देश्य ही रखती हैं। सिनेमाघर में शनिवार को दर्शकों की उपस्थिति को लेकर कहूं तो ऐसा लगता है कि फिल्म को अभी दर्शक मिलते रहेंगे क्योंकि हिंदी सिनेमा और सिंगल स्क्रीन के बहुत सारे दर्शक जो जाने पहचाने सितारों के फोटो देख कर फिल्म देखने जाते हैं, वो इस सप्ताह रिलीज हुई हिंदी फिल्मों में सबसे पहले बैंक चोर को देखना चाहेंगे। लेकिन जो पारिवारिक दर्शक हैं उन्हें इस फिल्म में कुछ खास नहीं मिलने वाला।

यार दोस्तों के साथ मौजम्मस्ती करने वाले युवाओं को ये थोड़ी पसंद आएगी। लेकिन इसमें कोई शक नहींं कि वाई फिल्मस की ओर से बनाई गई इस फिल्म ने सबसे ज्यादा चर्चा पाई है। लेकिन अंतत: ये फिल्म में मनोरंजन के लिए बनाई गई अनगिनत फिल्मों में ही शरीक हो जाएगी जिन्हें सिनेमाघर से उतरते ही कुछ हफ़्ते बाद दर्शक भुला बैठतें हैं।



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं. .

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