1
 






शाहीन इक़बाल
लेखक


अनमोल कपूर
लेखक


























Movie Review
फुल्लू:फूल से दिल वाला मर्द


गांव देहात में मर्दवाद इतना है कि फिल्ममेकर अगर गांव की बात करना चाहते हैं तो गांव के पुरुषों की कहानियों में महिलाओं की विचार प्रक्रिया का दम घुट जाता है। ग्रामीण महिलाएं गृहस्थी में दबी बेचारी अपनी सुख सुविधाओं का ध्यान ही नहीं रख पाती हैं । लेकिन-निर्देशक अभिषेक सक्सेना और लेखक-निर्माता अनमोल कपूर ने फुल्लू में गांंव की औरतों की समस्या को केंद्र में रखा है। रियल लाइफ में कहानी के असली किरदार से हम वाकिफ हैं। अक्षय कुमार और आर बाल्की भी इस सब्जेक्ट पर फिल्म बना रहे हैं। उनके भविष्य के सिनेमा से पहले वर्तमान में इस विषय पर फिल्म बनाकर फुल्लू के निर्देशक ने केंद्रीय पात्र के जरिए मर्द के हृदय के उस पहलू को छुआ है, जो नारी जैसा कोमल होता है। निर्देशक ने मर्द में छुपे नारी भाव को कहानी के केंद्रीय पात्र के जरिए प्रकट किया है।

फिल्म की कहानी के मुताबिक फुल्लू (शारिब हाशमी) गांव का एक ऐसा नौजवान है जो कोई काम तो नहींं करता पर उसके दिल में औरतों को लेकर बड़ी जिज्ञासा है। वो अपने घर में अपनी मां बहिन के साथ रहता है। बेरोजगार फुल्लू का काम भी बस इतना सा ही है कि वो शहर जाता है, तो गांव की महिलाओं के लिए उनकी मंगाई वस्तुऐं बाजार से खरीद लाता है। एक दिन उसकी मां उसकी शादी बिगनी (ज्योति सेठ) से करा देती है। ऐसे ही उसे महिलाओं की जिंदगी में एक अलग नजर से झांकने की जरूरत आन पड़ती है। एक दिन जब उसे पता चलता हैं कि माहवारी के दौरान महिलाओं को कितनी पीड़ा उठानी पड़ती है। तो वह इसका इलाज ढूँढने निकलता है। वो शहर जाकर सैनिटरी पैड बनाने की फैक्ट्री में काम करता हैं। शुरूआत में अपना सैनिटरी पैड प्रोडक्ट बनाता है, और इसमें असफल भी होता है। लेकिन उसे जुनून है कि वो अपने गांव की महिलाओं को पीड़ा से मुक्ति दिलाकर छोड़ेगा। इसी जुनून के साथ  फिल्म की कहानी आगे बढती है।

जाहिर है कि फिल्म की कहानी प्रेरक है पर ये संपूर्ण फिल्म प्रेरक नहींं बन पाती है। संवाद अदायगी और प्रस्तुतिकरण में ये कहीं ना कहीं उस डेंजर जोन में घुस जाती है, जिससे सुजीत सरकार अपनी फिल्म विकी डोनर को बचा ले गए थें। बहुत से सिनेप्रेमी इस पर आपत्ति जताते देखे जा रहे हैं कि इस फिल्म को ए सर्टिफिकेट क्यों मिला पर फिल्म के संवादों में कई बातें नाबालिगी के परहेज वाली हो जाती हैं।

फिल्म में शारिब हाशमी फुल्लू के किरदार में छा गए हैं। स्वयं को अनसुलझे  लड़के के रूप में वे बहुत अच्छे तरीके से पेश करते हैं। खासकर महावारी को उनका जनानीरोग कहना। फुल्लू की मां और भिखारी बने इमानुलहक ने भी दमदार अभिनय किया। है। 

इस तरह के सिनेमा के लिए खास क्रेज होता है क्योंकि ये समाज को कहीं ना कहीं प्रभावित करता है। हालांकि अक्षय कुमार भी कुछ महिनों बाद इस तरह के किरदार में ही दर्शकों के सामने अवतरित होंगे लेकिन उनकी फिल्म स्टार वैल्यू के प्रभाव के चलते काफी कुछ अलग हो सकती है। लेकिन फुल्लू से दर्शक इस तरह जुड़ते हैं जैसे अपने ही किसी गांंव के लड़के की कहानी चल रही हो। फिल्म फुल्लू का संगीत विषय के मिजाज के अनुरूप है।

मैं ये तो नहींं कहता कि फुल्लू सिनेमा में कोई क्रांति लाएगी लेकिन ये फिल्म ग्रामीण नारी और उनकी परेशानियों को समाज के सामने जरूर लाती है। अगर आप इसे समाज के नजरिए से देेखे तो शायद ये आपको बोर ना करे लेकिन इसे अगर आप एक मनोरंजन से भरपूर फिल्म देखने के उददेश्य से देखें तो शायद ये आपके मन को ना भाए।

मीडिया में फिल्म के लेकर मिलीजुली प्रतिक्रिया आ रही है लेकिन सनद रहे कि ऐसी फिल्मों को सबसे ज्यादा ज़रूरूत है मीडिया के ध्यानाकर्षण की। ऐसी कहानियों को दिखाने के लिए मीडिया को ही दर्शकों को सिनेमाघर तक लाना पड़ेगा । छोटी फिल्मों को ढँग से थिएटर ना मिलने के इस दौर में अभिषेक सक्सेना का ये प्रयास अच्छा है। तिस पर उन्होंने बड़े स्टार की फिल्म आने से पहले ही इस कहानी को दर्शकों के सामने पहुंचाकर बतौर निर्देशक सिनेप्रेमियों के बीच एक पहचान बना ली है। अगर आप महिला दर्शक हैं या सिनेमा को समाज पर प्रभाव छोड़ने का माध्यम के रूप में जानते हैं तो ये फिल्म अवश्य देखें।   



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं.

Click here to Top