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विनीत व्यास
पटकथा


संचित गुप्ता



























Movie Review
बहन होगी तेरी:दर्शकों को पटाने में असफल!


 
कथा, पटकथा और सवंादः विनीत व्यास और अजय के पन्नालाल (अतिरिक्त संवाद: संचित गुप्ता) 
मध्यवर्गीय विरोधाभास अच्छी कहानियों का बेहतरीन मसाला बनते हैं दीबाकर बैनर्जी की खोसला का घौंसला और ओए लक्की, लक्की ओए इसकी बेहतरीन मिसालें हैं। मध्यवर्गीय रोमांस की सफ़ल कॉमेडी के रूप में ताज़ा उदाहरण फुकरे की दी जा सकती है। अजय के पन्नालाल इसी श्रृंखला को ‘बहन होगी तेरी’ के ज़रिए आगे बढ़ाने की कोशिश करते हुए नज़र आते हैं, इस कोशिश में वह कितने सफ़ल होते है, आईए देखते हैं-
गट्टू (राजकुमार राओ) और बिन्नी (श्रुति हसन) लख़नऊ के मध्यवर्गीय मुहल्ले की एक तंग गली में आमने-सामने रहते हैं। पढ़ाई, नौकरी और मां-बाप की सेवा जैसे प्रमुख मामलों में गट्टू पूरी तरह से असफ़ल है और अपने कुनबे में बेकार माना जाता है। वहीं ऑस्केस्ट्रा कंपनी चलाने वाले भाई जैदेव (निनाद कामत) की लाडली छोटी बहन मुहल्ले में फायरब्रांड बहन के नाम से मशहूर है जो सड़कछाप आशिकों को लड़कियों से राखी बंधवाने में माहिर है। मुहल्ले के बड़े-बुज़ुर्गों का एक ही सुत्र है ‘मुहल्ले की लड़कियां बहन होती हैं’ लेकिन गट्टू का गैंग जिसमें उसका जिगरी भूरा (हैरी टांगरी) इस राखी वाले ‘उत्तपीड़न’ के खि़लाफ़ है। अब मसला यह है कि वह बिन्नी से निक्कर और सर्कट वाले स्कूल के दिनों से प्यार करता है, लेकिन पूरे मुहल्ले सहित दोनों के परिवार वाले उन्हें भाई बहन मानते हैं। ऊपर से गट्टू एक नम्बर का फट्टू है जो अपने दिल की बात बोल ही नहीं पाता, जबकि बिन्नी का एक ही फंडा है हिम्मत है तो दिखाओ।  क्या गट्टू मुहल्ले की परंपरा को तोड़ कर बिन्नी को अपने दिल की बात बोलने और राखी बंधवाने की बजाए वरमाला पहनाने में कामयाब होगा? उसके लिए आपको ‘बहन होगी तेरी’ देखनी पड़ेगी।
विनीत व्यास और अजय के पन्नालाल की कथा, पटकथा और सवंाद (अतिरिक्त संवाद: संचित गुप्ता) का विश्लेषण करें तो एक संभावनाशील कथा की बिखरी हुई पटकथा सामने आती है। फर्स्ट हाफ़ हल्की-फुल्की कॉमेडी (जिसमें कोई नयापन नहीं है) के साथ कहानी को औसत गति से आगा बढ़ाता है। रोमेंटिक कॉमेडी में सबसे ज़रूरी होता है कि कॉमेडी सहज हो लेकिन कई जगह पर कॉमेडी बहुत कोशिश करके पैदा करने की कोशिश साफ़ नज़र आती है। ख़ास कर बिन्नी के भाई को क्रिकेट टीक का कप्तान बनाने और फ़िर हटाने के दृश्य। दूसरी बात यह जो राखी बांधने और उससे बचने का पूरा संकल्प है यह स्कूल जाने की उम्र किशोरों का पर सटीक बैठता है। यूपीएससी की परीक्षा दे चुके यूवक के स्तर पर यह अटपटा लगता है। इसके साथ ही फ़िल्म का टाइटल भी कहीं ना कहीं दर्शक को सिनेमा से दूर रखने के लिए ज़िम्मेदार माना जा सकता है। ख़ास कर कसबाई और ग्रामीण परिवेश में यह बात किसी के हज़म होने वाली नहीं है, शहरी मध्यवर्ग जिसे ध्यान में रख कर यह फ़िल्म बनाई गई है, मुझे नहीं लगता उस परिवेश की लड़कियां अब ऐसा सोचती हैं, ख़ास कर लख़नऊ जैसे शहर की लड़कियां तो बिल्कुल नहीं, हां हो सकता है वह खुले तौर पर यह बात ना कहती हों। इंटरवल एक दमदार दृश्य के साथ आता है, जिसमें शिवजी के गेटअप में होते हुए भी गट्टू सबसे कमज़ोर पात्र साबित होता है। यही प्रतीक के तौर पर पात्र के बाहर और अंदर के विडंम्बना को ज़ोरदार तरीके से पेश करता है। यह मध्यवर्ग का कटु सत्य है कि वह जो बाहर से दिखने की कोशिश करता है अक्सर वह अंदर से वैसा होता नहीं या यूं कह लें कि वह अंदर से जो होता है बाहर से उससे कहीं ज़्यादा दिखने की कोशिश करता है। 
दूसरे हिस्से में कई सारे सब-प्लाट आते हैं, इसके साथ ही कहानी में एक भ्रम के ज़रिए कशमशक की स्थिति भी पैदा हो जाती है और पटकथा बिखरने लगती है। पहले हिस्से में जहां कहानी लख़नवी और पंजाबी परिवेश में घूमती है लेकिन भूरे के ताऊ (रणजीत) और पिता (गुलशन ग्रोवर) के रूप में फ़िर इस पर हरियाणवी परिवरेश हावी हो जाता है। दोनों ही हिस्सों में लख़नऊ कहीं भी उभर कर सामने नहीं आता और एक मुहल्ले की संकरी गली तक सीमित रहता है। फ़िल्म का एक संवाद है, ‘यह घर भी बिग बॉस का घर लग रहा है, कौन क्या कर रहा है कुछ पता नहीं चलता’। कहीं ना कहीं फ़िल्म की हालत भी ऐसी ही होती है। इस बीच लेखक और निर्देशक ने ख़ाप पंचायत, ऑनर किलिंग जैसे मुद्दे भी छुए हैं, लेकिन महिला किरदारों के मामले में वह रूढ़ीवादी विचारों से ही शापित महसूस होती है। जबकि शुरू से लेकर अंत तक बिन्नी ख़ुद को तुर्रमख़ान बताते है लेकिन लड़कों को ज़ब्रदस्ती राखी बंधवाने के सिवा वह ऐसा कुछ नहीं करती कि उसे एक दबंग किरदार के रूप में देखा जा सके, जिसके सामने गट्टू की आवाज़ ना निकले।
अगर ‘बहन होगी तेरी’ में कुछ दमदार है तो वह है राजकुमार राव जो अकेले पूरी फ़िल्म को अपने कंधों पर उठाएं है। उनकी ग्लैमर रहित छवि उन्हें एक गली के साधारण लड़के के किरदार निभाने में मदद करती है, लेकिन सिर्फ़ इतना ही नहीं, वह ख़ुद भी पूरी तरह से किरदार के अंदर उतरे हैं और बतौर गट्टू मध्यवर्ग के लड़कों का प्रतिनिधित्व करते हैं। दूसरे हिस्से में नशे की हालत में शाहरूख की पैरोडी करते हुए वह अपने अदाकारी के कौशल की दोहरी सशक्ता को प्रमाणित करते हैं। साथ ही लेखक का चॉकलेटी राहुल वर्सेस साधारण गट्टू के प्रेम कहानी के विरोधाभास को पर्दे पर बखूबी उतारने में सफ़ल रहते हैं। ऐसे कुछ दृश्यों में हैरी टांगरी भी प्रभावित करते हैं। दोनों की कैमिस्ट्री ज़ब्रदस्त है और कट्टा देने वाले दृश्य में हैरी टांगरी की सहजता देखने लायक है। श्रुति हसन पूरी तरह से मिस फिट हैं, ना तो वह कहीं से पंजाबी लगती है ना ही उनका अंदाज़ और अदायगी पंजाबी लड़की के आस-पास लगती है। गौतम गुलाटी के पास स्टाईल दिखाने के सिवाए कुछ नहीं है। हिंदीभाषी क्षेत्र के पंजाबी भाई के रूप में निनाद कामत सफ़ल रहे हैं। रणजीत और गुलशन ग्रोवर दोनों ही थके हुए लग रहे हैं, उनके पास करने के लिए कुछ ख़ास है भी नहीं। मुहल्ला सभा के प्रेसीडेंट बनने के इच्छुक महत्वकांक्षी मुहल्लेदार के रूप में दर्शन जरीवाला छाप छोड़ते हैं। अमेरीकी राष्ट्रपतियों जूनियर और सीनियर जार्ज बुश के साथ ही ट्रम्व के हवाने से उनका संवाद ‘जब लोग बोर हो जाएं तो उन्हें वॉर (जंग) दे दो, फ़िर एक नया प्रेसीडेंट मिलता है।’ पिछले कुछ दशकों की वैश्विक राजनीति पर गहरा व्यंग्य करने के साथ ही यह संवाद एक पल के लिए हंसाता भी है। लेकिन ऐसी संवाद बस उंगलियों पर ही गिनने लायक हैं।
 
गीत संगीत के मामले में सूपरहिट गीत ‘काला चश्मा जचदा ऐ’ की तर्ज़ और ओरिजिनल म्यूज़िक पर बनाई गई भांगड़ा भेंट सबसे दमदार है। ख़ास कर पटकथा में इसकी प्लेसमेंट और प्रस्तुतिकरण दोनों ही आर्कषक हैं। बाकी गीत बस ठीक-ठाक हैं। बैक ग्राउंड स्कोर गुदगुदाने की कोशिश करता है लेकिन उसे वाजिब संवाद और सिचुएशन नहीं मिलते। अगर आप ख़ान, कपूर या कुमार की वन मैन शो वाली फ़िल्में देखने के आदी हैं तो राजकुमार राओ के लिए यह फ़िल्म देख सकते हैं, जो अपने स्टारडम से नहीं बल्कि अपनी अदाकारी के दम पर फ़िल्म को अकेले अंत तक ले आते हैं।


    दीप जगदीप सिंह

दीप जगदीप सिंह स्वतंत्र पत्रकार, पटकथा लेखक व गीतकार हैं। www.facebook.com/deepjagdeepsingh.

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