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सिद्धार्थ-गरिमा
लेखक जोड़ी


























Movie Review
राब्ता:दर्शकों से नहीं बना पाई राब्ता


पुर्नजन्म की दुनिया को फिल्मी किस्सों में समेटने का काम काफी समय से हो रहा है। ये कहानियां वर्तमान के साथ अतीत के वातावरण में जाती हैं। भारत में पुर्नजन्म को लेकर आस्था है और यकीकन इसे कई फिल्मों में से बड़े प्रभाव से प्रस्तुत किया गया है। दर्शकों ने इसे हाथों-हाथ भी लिया है लेकिन इस शुक्रवार रिलीज हुई लेखक सिद्दार्थ-गरिमा और निर्देशक दिनेश विजान की फिल्म राब्ता तो मानो दर्शकों से राब्ता रखना ही नहीं चाहती है। हालांकि फिल्म के निर्देशक दिनेश विजान एक सफल युवा फिल्म निमार्ता हैं और वो सिनेमा माध्यम पर अच्छा बोल भी लेते हैं। लेकिन अपनी पहली फिल्म ही बनाते वक्त बेहद चूक गए। वे वर्तमान की कहानी को तो निबाह जाते हैं लेकिन अतीत के माहौल में जाते ही वे राह भटक जाते हैं।

फिल्म की कहानी है शिव कक्कड़ की जो बुडापेस्ट में एक बैंकर हैं। उसकी मुलाकात वहां सायरा (कृति सैनन) से होती हैं। दोनों मिलते-जुलते हैं और प्यार हो जाता है। लेकिन सिया को अचानक कुछ भूला हुआ याद आने लगता है जिसे लेकर वो असहज है और इसे भुला देना चाहती है। इसी बीच दोनों की जिंदगी में तीसरी एंट्री ज़ाकिर मर्चेंट (जिम सार्भ) की होती है। अचानक से शिव और सायरा के बीच बनती बातें बिगड़ने लगती हैं। सायरा से परिस्थितवश शिव दूर हो जाता है। वो अपने मन पर ज़ाकिर का प्यार महसूस करने लगती है। इस तरह कहानी आगे बढ़ते हुए अंत की राह की पकड़ती है, लेकिन दर्शक को बांधे रखने में असफल रहती है।

दिनेश विजन ने बतौर निर्माता कई सफल और चर्चित फिल्म बनाई हैं। उनके पास फिल्मों को लेकर बड़ा पैशन है और वे अपने निर्देशकों के समक्ष स्वंय को सहायकों की तरह समर्पित रखते हैं। इसलिए लोगों को उनकी पहली निर्देशकीय फिल्म से बड़ी आस थी। राब्ता में दिनेश विजन ने शिव और सायरा को तो निभा लिया है पर वे फ़्लैशबैक को संभाल नहीं पाए।

किरदारों पर ढंग का काम नहीं किया गया। सिर्फ उनकी हेयर-स्टाइल और लुक से युवा पीढ़ी में एक काल्पनिक से अतीत को मंढ़ा जा रहा था सो दर्शकों ने फिल्म को शुक्रवार को कमजोर स्टार्ट देकर नकारा है। हां, कृति सैनन और सुशांत सिंह अपनी कैमिस्ट्री से युवाओं को ज़रूर आकर्षित करते हैं। कृति सैनन हर दृश्य में दर्शकों का ध्यानाकर्षण करती हैं। परंतु दिनेश विजन को इन अंदाजों के साथ फिल्में बनानी है तो वे निर्माता ही सही हैं।

ये बात तय है कि  नई पीढी के लिए फिल्मी किस्सों में पुनर्जन्म का एसिड अब कमजोर लगता हैं। लेखक और निर्देशक इस फिल्म में अपनी काल्पनिक दुनिया को अलग ही स्तर पर ले जाते हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात है स्क्रिप्ट में बहुत से झोल हैं जो दर्शक को पचते नहीं। फिल्म का गीत संगीत अच्छा है। नए लुक के साथ नई पीढीं ने इस पसंद भी किया है। लेकिन फिल्म की संगीत सफलता तो संगीत कंपनी के खाते में दर्ज हो जाती है। 

पुर्नजन्म को लेकर भारतीय संस्कति में आस्था रही है इसलिए ऐसा भी नहीं मानें कि अच्छा सब्जेक्ट नहीं था पर इसे ढँग से रचा नहीं जा सका। फिर भी बड़ी रिलीज के चलते राब्ता हो सकता हैं कि आगे अपने कुछ और दर्शक बना जाए पर फिल्म की ग्रोथ वीक में बढ़ जाए ऐसे आसार कम नजर आ रहे हैं। बहरहाल, आप युवा जोड़े हैं और प्यार में हैं तो फिल्म का थोड़ा लुत्फ ले सकते हैं। पारिवारिक दर्शक तो इससे ना जुड़े पाएंगे।



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं.

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