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Movie Review
ए डैथ इन द गंज:जटिल समय में संवेदना की मौत का सच


निर्देशन एवं पटकथा: कोंकणा सेन शर्मा   कथा: मुकूल शर्मा (चित्र उपलब्ध नहीं)  सह-लेखन: दिशा रिन्दानी
 
 
समाज कैसे एक भोले, सीधे और परेशान व्यक्ति को गहरे अवसाद में धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ता कि वह भरे-पूरे परिवार में भी तन्हा हो जाता है और यहां तक कि मरने-मारने पर उतारू हो जाता है। ‘ए डैथ इन द गंज’ इस चिंता को बेचैन कर देने वाले अंदाज़ से अपने किरदारों के ज़रिए पर्दे पर उतारती है और अंततः आपको इस सवाल के साथ छोड़ जाती है कि ऐसे माहौल में आप क्या करें। लेकिन इस सवाल का जवाब नहीं देती, यह ज़रूर बताती है कि आप क्या ना करें।
 
जैसा कि शीर्षक से ही ज़ाहिर है ‘ए डैथ इन द गंज’ एक मौत की कहानी है। फ़िल्म शुरू होती है एक मुर्दाघर के मुख्यद्वार से जहां पर विक्रम (रणवीर शौरी) और ब्रायन (जिम सर्भ) एक एम्बेसडेर कार की डिक्की में झांक कर विचार कर रहें हैं कि लाश को किस तरह रखा जाए। यहां से कहानी एक सप्ताह पीछे फ़्लैशबैक में जाती है और संकेत दे देती है कि इस लाश के चेहरे और मौत के कारण तक पहुंचने के लिए सात दिन का इंतज़ार करना होगा। पटकथा भी एक-एक कर हर दिन को खोलती है। सन 1978 के आख़िरी सप्ताह में नंदू (गुलशन देवैया) अपनी पत्नी बोनी (तिलोत्मा शोम), नन्हीं बेटी तानी (आर्या शर्मा) के साथ सर्दी की छुट्टिया बिताने बिहार (अब झारखंड में) की सीमा पर स्थित गांव मैक्लूस्किगंज में तानी के नाना (ओम पुरी)-नानी (तनुजा) के पास आते हैं। उनके साथ बोनी की एंगलो-इंडियन सहेली मीमी (कल्की कोईचलिन) और मौसेरा भाई श्यामल चैटर्जी उर्फ़ शुत्तू (विक्रांत मैसी) भी हैं। उनका इंतज़ार कर रहे उनके पड़ोस में रहने वाले विक्रम और ब्रायन भी उनके आते ही पहुंच जाते हैं और फ़िर शुरू होती है छुट्टियों की धमाचौकड़ी, जिसमें बड़े-बूढ़े भी बच्चे हो जाते हैं और सात दिन बाद आने वाले नए साल का जश्न मनाने की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं, लेकिन इस सब में शुतू को कुछ अंदर ही अंदर खाए जा रहा है। ऐसा क्या है जो उसे परेशान कर रहा है और किस तरह से जश्न मातम में बदल जाता है, यह देखने के लिए आपको ‘ए डैथ इन द गंज’ देखनी पड़ेगी।
 
 
अपने पिता मुकूल शर्मा द्वारा लिखित सत्य घटना पर आधारित कहानी को कोंकणा ने (सह-लेखन: दिशा रिन्दानी) पटकथा में इस तरह से ढाला है कि पहले पंद्रह मिनट की धीमी शुरूआत के बावजूद आप धीरे-धीरे कहानी से ऐसे जुड़ जाएंगे कि अंत तक इस सवाल से छूट नहीं पाएंगे कि आखि़र मौत होने किसकी वाली है। फ़िल्म में एक मोड़ ऐसा आता है कि लगता है मौत हो गई बस और आपको पता चल गया कि किसकी हुई, लेकिन कोंकणा सेन शर्मा पटकथा के मामले में यहीं पर सधी हुई लेखिका साबित हुई हैं। फ़िल्म का केंद्र बिंदु ‘बुलिइंग’ के विषय पर आधारित है और मुकूल की कहानी और कोंकणा की पटकथा बेहद सहजता से बता जाती है कि कैसे परिवार वाले ही किसी अपने को जब उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है जाने-अनजाने में वह ना सिर्फ़ उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं बल्कि उसका मज़ाक उड़ा कर, उसे दबा कर, उसे उसकी कमज़ोरी और बचपना समझ कर नीचा दिखा देते हैं। तब आप अंदाज़ा भी नहीं लगा पाते कि इसके परिणाम पूरे परिवार के लिए कितने भयानक हो सकते हैं।
 
एक तरफ़ जहां देश की राजनीति में मोर के अश्रुओं से मोरनियों के गर्भवती होने का अवैज्ञानिक सिलेबस पढ़ाये जाने की ख़बरें सुर्खियों में छाईं हों, तो हाल ही में पंजाब और बिहार बोर्ड के परीक्षा परिणामों के बाद कम नंबर आने की वजह से छात्रों द्वारा की गई आत्महत्याओं की ख़बरें दब जाना स्वभाविक है। ऐसे ही दौर में कोंकणा की बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म ‘ए डैथ इन द गंज’ का सीमित दायरे में रिलीज़ होना, समाज में अर्थपूर्णता की घटती और अर्थहीनता की बढ़ती प्रासंगिकता का प्रत्यक्ष उदाहरण है। वो भी तब जब यह फ़िल्म की बुनियाद परीक्षा के नम्बरों पर खड़ी है, जो कहानी के केंद्र में भले ना हो, उसका ट्रिगर-प्वाईंट अवश्य है। कोंकणा उसके बाद होने वाले अवसाद से पैदा होने वाली स्थितियों को बेचैन कर देने वाले कथानक के ज़रिए पेश करतीं हैं। कहानी वहां से शुरू होती है जब शुत्तू अवसाद में आ चुका है और उसका एक कारण उस जैसे मेधावी छात्र का अचानक फ़ेल हो जाना भी है। फ़िर इस अवसाद को भयावह स्थिति तक ले जाने में परिवार और दोस्तों के व्यवहार की भूमिका भी जुड़ती जाती है। 
 
एक बार लगता है कि शुत्तू के अवसाद का कारण उसके पिता की मौत है, लेकिन नंदू और बोनी की एक चर्चा में निर्देशक बहुत बारीकी से नंदू के ज़रिए बताती हैं कि उसके पिता की मौत हुए आठ साल हो चुके हैं, जबकि बोनी जवाब में कहती हैं कि शुत्तू आज भी भावुकता में उनका स्वैटर पहनता है। निर्देशक की यह बताने की तकनीक वाजिब है कि कोई भी उसके अवसाद का सही कारण पता लगाने के प्रति गंभीर नहीं है। लेकिन इस चक्कर में वह इस बात को और उलझा देती हैं क्योंकि उसकी मां की चिट्ठी से पता चलता है कि मेधावी शुत्तू के किसी परेशानी की वजह से पहली बार नम्बर अचानक कम आए हैं। उसकी परेशानी की शुरूआत कैसे होती है - बस यही एक सवाल है जो अनसुलझा छूट जाता है वरना ‘ए डैथ इन द गंज’ एक परफैक्ट फ़िल्म है।
 
अदाकारी के मामले में कोंकणा के पास एक से बढ़ कर एक अदाकार मौजूद हैं। बालिका वधू के किरदार श्याम मदन सिंह से पहचान बनाने वाले विक्रांत मैसी फ़िल्म की जान हैं, उन्होंने एक मेधावी अवसादग्रस्त युवक की बेहतरीन भूमिका इतनी सहजता से निभाई है कि वह आपके आसपास के ही किसी पहचान के युवक जैसे लगते हैं। वह एक ऐसा युवक है जो गंभीर तनाव में भी ज़िंदगी को जीना चाहता है, कुछ देर के लिए तनाव के केंद्र से दूररह कर ख़ुद को फ़िर से तलाशना चाहता है, लेकिन जिनसे उम्मीद लेकर वह वहां आता है, वह उसको नाउम्मीद ही नहीं करते बल्कि उसे बाहर (विक्रांत का खेल में उसे नीचा दिखाने के लिए सचमुच में चोट पहुंचाना) और अंदर (मीमी का उसे झूठा प्रेम दिखा कर अपनी हवस के लिए प्रयोग करना) दोनों जगह से तोड़ देते हैं। चोटिल शरीर और मन दोनों ही मनोभाव विक्रांत ने बख़ूबी पर्दे पर व्यक्त किए है। इस साल जनवरी में ओमपुरी की मृत्यु के बाद रिलीज़ हुई यह फ़िल्म उन्हीं को समर्पित की गई है। उनके छोटे लेकिन चिरपरिचित अंदाज़ में निभाए गए किरदार से फ़िल्म के भावनात्मक माहौल में एक ठसक भरे ठहाके का सुखद अहसास तब आता है, जब वह नंदू से कहते हैं, ‘तू मेरा बाप नहीं है, मैं तेरा बाप हूं।’ कुछ ऐसा ही ममतामई अहसास तनुजा लाती हैं जब वह मौसी के रूप में शुतू को भावनात्मक संबल देने की कोशिश करती है, लेकिन फिर कहानी के एक अहम मोड़ पर निर्देशक उनके ज़रिए यह भी जतला देतीं है कि मौसी आखि़र मौसी होती है, मां नहीं। तिलोत्मा शोम ने बोनी के रूप में एक ज़िम्मेदार पत्नी और बेटी की भूमिका को सहजता से जिया है और तब उसका नारीत्व भी देखने को मिलता है जब बच्ची को संभालने में हुई लापरवाही की सामूहिक गलती के लिए उसे ज़िम्मेदार ठहराने की कोशिश की जाती है तो वह अपना प्रतिरोध दर्ज करती हैं। तानी के रूप में नन्हीं आर्या शर्मा फ़िल्म की मासूम जान हैं, जो अपनी हंसी और जिज्ञासा से फ़िल्म की पतझड़ वाली पृष्ठभूमि में बहार सा अहसास करवाती रहती हैं। नंदू का किरदार निभा रहे गुलशन देवैया भी पति, पिता, जमाई, दोस्त, भाई के रूप में अपनी छाप छोड़ते हैं। एक निर्जन इलाके के एक छुटभैया हीरो के नकारात्मक किरदार को बेहतरीन तरीके से निभा कर रणवीर शौरी ने एक बार फ़िर साबित कर दिया कि उन्हें मौका मिले तो वह हैरान करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। उनके इस किरदार से रह-रह कर नो स्मोकिंग में निभाया उनका अब्बास का किरदार याद आता है। लेकिन धूर्तता के मामले में कल्की उनसे भी बाज़ी मार जाती हैं, फ़िल्म के अंतिम से पहले दृश्य में जहां आप की घोर सहानुभूति शुत्तू से होगी तो वहीं आप मीमी से घोर नफ़रत करने से ख़ुद को रोक नहीं पाएंगे, यही कल्की की अदाकारी को सफ़ल बनाता है। देव डी की इक्कसवीं सदी की चंदा के विपरीत ‘ए डैथ इन द गंज’ की बीसवीं सदी की मीमी ज़्यादा उत्तर-आधुनिक लगती है। मैं निजी तौर पर उन्हें ऐसे और किरदारों में देखना चाहूंगा।
 
ऐसी फ़िल्मों मे संगीत की गुंजाईश बेहद कम होती है लेकिन संगीतकार सागर देसाई ने पटकथा की मांग के अनुरूप जिस तरह बंगाली, बिहारी लोग गीतों और अंग्रेज़ी धुनों को संजोया है और निर्देशक ने जैसे उन्हें पटकथा में बुना है, उससे यह फ़िल्म शोरगुल वाले संगीत के दौर में लोकसंगीत के फ़िल्मों में बेहतरीन प्रयोग की मिसाल पेश करती है। सिरिस रेय सीमावर्ती गांव की पतझड़, पत्तों और रंगों को किरदारों के मनोभावों के रंगों के अनूरूप कैमरे के ज़रिए पर्दे पर उतारते हैं। रोहित चतुर्वेदी की अस्सी के दशक की बैलबॉटम पतलूनें और हेयर स्टाईलिस्ट द्वारा क्लीन शेव के साथ लम्बीं कल्मों के ज़रिए किरदारों को बिल्कुल यथार्थपरक लुक दी है। सिद्वार्थ सिरोही का प्रॉडक्शन डिज़ाईन आपको गंज के अद्भुत माहौल में ले जाता है, जहां से आप लौटना नहीं चाहते। बैकग्राउंड स्कोर थ्रिल को और भी बढ़ाता है। 
 
यूं तो यह अस्सी के दशक में संभ्रांत परिवार की सत्य घटना पर आधारित कहानी है, लेकिन आज भी यह कहानी किसी ना किसी रूप में एलीट से लेकर लोअर मिडल क्लास तक में घटित हो रही है। इस संवदेनशील मसले पर इस तरह की गंभीर फ़िल्म संवेदनाओं की मौत के दौर में जीवन की जटिलताओं को समझने में अहम भूमिका निभा सकती है। कोंकणा सेन शर्मा की अगली फ़िल्म का इंतज़ार रहेगा!
 


   दीप जगदीप सिंह

www.facebook.com/deepjagdeepsingh.

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