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रुचि नारायण
लेखक-निर्देशक


अजय झींगरान
लेखक


























Movie Review
हनुमान दा दमदार:बाल हनुमान की व्यथा और कथा


कहानी, पटकथा, निर्देशन: रुचि नारायण संवाद: अजय झींगरान                        

बहुत से स्कूल जहां पर हिंदी बोलने पर बच्चों पर फाइन लगता है, वहां बच्चों की तालीम में भारतीय संस्कृति और हमारे पौराणिक किरदार गायब होते जा रहे हैं। पिछले कुछ सालो में मैंनें शहरी परिवेश में पले-बढ़े बच्चों से लगातार संवाद करते हुए महसूस किया है कि उन्हें भारतीय मायथोलॉजी के किरदारों के बारे में खास जानकारी नहीं है। अब मां बच्चों को पौराणिक कहानियां सुनाने के बजाय अंग्रेजी पोयम सुनाना पसंद करती हैं। इसलिए इस मामले में मौखिक संप्रेषण का अभाव भी बच्चों को झेलना पड़ रहा है। ऐसे में लेखक-निर्देशक रूचि नारायण की फिल्म हनुमान दा दमदार बच्चों के बीच एक आस जगाती है, जिसमें वे हल्के-फुल्के हास्य के साथ हंसते हसंते हिंदू देव हनुमान जी के बचपन से जुड़ी घटनाओं से रूबरू होते हैं। मैं कई राममार्गी संतों के मुख से सुन चुका हूं कि इंद्र द्वारा वज्र की चोट ने बालक हनुमान को ना केवल शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी कमजोर कर दिया था। रुचि नारायण अपनी कहानी को यहीं से उठाती हैं, कि किस तरह फिर से बाल हनुमान ने अपनी शक्तियों को फिर से आत्मसात किया। 

ये किस्सा सलमान खान की आवाज में शुरू होता है जो हनुमान के जरिए दर्शकों को सुनाई देती हैं। कहानी के मुताबिक इंद्र से वज्र की चोट खाने के बाद हनुमान के लिए उनकी मां अंजनि बेहद चिंतित है । अब हनुमान एक डरपोक बालक बन चुका है, जिसे घर में कैद कर दिया है। उसके पिता केसरी और अंजनि उसके भविष्य को लेकर बेहद परेशान है तो दिल के किसी कोने में बालक हनुमान को भी अपनी दब्बू लहजे से उपजी आत्मगलानि है।

इधर ऋषि विश्रव अमर होने के लिए अमृत पाना चाहते हैं लेकिन ब्रह्मदेव उनकी ये फरमाइश ठुकरा देते हैं।  वे कहते हैं कि अमृत पर उसी का हक है जो  सबसे ताकतवर होने के साथ बेहद निष्कलुष हो । विश्रव अपने तप से जान जाते हैं कि ऐसा बालक तो पवनपुत्र हनुमान है और वो पवनपुत्र हनुमाना को अपने वश में करने का जाल बुनना शुरू कर देते हैं।  

इधर बालक हनुमान परमात्मा के समक्ष अपनी व्यथा रखता है कि वो उसे ताकत दें और उसके डर को दूर करें। मानो परमात्मा के रूप में उसके पिता पवन देव उसके मन की बात को सुन लेते हैं। अचानक तेज हवाएं चलने लगती हैं। और हनुमान अपने महल से गिरते पड़ते दूर जंगल में भटक जाते हैं। जंगल में बाल हनुमान अकेला पड़ जाता है। यहां पर उसकी साथी हैं नन्ही सी मक्खीनुमा कीट करैक्टर स्वीटी। जंगल में बाल हनुमान की मुलाकात गरूण से होती है। गुरूण उससे दोस्ती करता हैं और और उसे हौंसला देने के साथ हनुमान की आंतरिक शक्ति को जागृत करने का काम करता है। इस तरह परिस्थितियों के साथ लड़कर एक दब्बू डरपोक बालक हनुमान दा दामददार कैसे बनता है, इसे बात को प्रकट करते हुए कहानी अपने क्लाइमैक्स की ओर बढती है।

फिल्म में सलमान खान, सौरभ शुक्ला, मकरंद देशपांडे, रवीना टंडन, विनय पाठक , हुसैन दलाल, कुणाल खेमू के साथ बाल हनुमान के लिए आवाज अर्णव ने दी है। फिल्म की संगीतकार स्नेहा खानविलकर, फिल्म के संगीत के साथ क्यूट करैक्टर स्वीटी की प्यारी आवाज़ के रूप में अहम योगदान देती हैं।

ये फिल्म हनुमान जी के हमेशा के लिए विष्णु अवतारों के सेवा के प्रसंग पर प्रकाश डालने के साथ रावण के पैदा होने की कहानी को भी संक्षेप में बताती है। लेकिन फिल्म के संपूर्ण प्रभाव में ये बात झलकती है कि इस फिल्म की  स्क्रिप्ट को थोड़ा और विकास की जरूरत थी । अवधि 1 घंटा 44 मिनिट है। इस अवधि में फिल्म जल्द समेटी हुई प्रतीत होती है। इसके साथ ही वे दर्शक जो सलमान के फैन हैं वे थोड़े निराश हो सकते हैं क्योंकि सलमान की आवाज में फिल्म की शुरूआत भर हैं।

लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं हैं कि इसे देखते हुए ना केवल बच्चे बल्कि उनके अभिभावक भी  स्वंय का मनोरंजन कर सकेंगे।

लेखक-निर्देशक रूचि नारायण ने मायथोलॉजी के साथ कई संवाद ऐसे रचे हैं जो बच्चों के लिए शिक्षाप्रद है। मसलन अमृत प्राप्त होने के बाद बाल हनुमान का  जीव की मौत से दुखी होकर कहना कि हम जिंदगी को तभी समझते हैं जब ये हमसे दूर हो जाती है। फिल्म में केसरी की आवाज में सौरभ शुक्ला का हरियाणवी अंदाज फिल्म को मायथो से दूर मनोरंजन की तरफ ले जाता है वहीं ऋषि विश्रव की आवाज में मकरंद देशपांडें विषय को पौराणिकता प्रदान करते हैं। बेशक, बच्चों की छुट्टियों के बीच रिलीज हुई इस फिल्म को बच्चों के साथ उनके अभिभावक भी देंखें तो कतई बोर नहीं होंगे।       



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं।.

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