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जेम्स अर्सकिन
लेखक-निर्देशक


शिवकुमार अनंत
लेखक


























Movie Review
सचिन ए बिलियन ड्रीम्स:उसकी ज़िंदगानी, उसकी जुबानी


सचिन तेंदुलकर के प्रति लोगों की ये दीवानगी है कि उन्हें उनके नाम पर जो भी प्रस्तुत किया जाए वे उसे प्यार से देखेंगे और सराहेंगे। ये अहसास मुझे कल रात को हो रहा था जब मैं तालियों और सीटी की तेज आवाजों के साथ बतौर समीक्षक पहली बार एक फिल्म को शुरू होते देख रहा था। ना जाने क्यों मीडिया इस फिल्म को डॉक्यूड्रामा लिख रहा है, मुझे तो इस फिल्म में बचपन के कुछ दृश्यों के बाद कोई ड्रामा नजर नही आया। क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को क्रिकेटर के साथ बतौर इंसान बयां करने वाली इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म में आप उनकी ज़िंदगी की कहानी उन्हीं की जुबानी सुनते और देखते हैं। 

ब्रिटिश लेखक-निर्देशक जेम्स अर्सकिन और लेखक शिवकुमार अनंत की ये फिल्म हिंदी, अंग्रेज़ी के साथ तमिल और मराठी भाषा में भी रिलीज की गई है। ये फिल्म सचिन के समग्र कैरियर पर सिर्फ उनके नज़रिए से ही नजर डालती है। लेखक-निर्देशक ने सचिन और उनसे जुड़े लोगों से बातचीत करके एक निम्न मध्यमवर्गीय लड़के के भारत रत्न बनने तक के सफर को पेश किया है।

फिल्म की शुरूआत होती है मुंबई के बांद्रा में जन्मे सचिन के बचपन की शरारतों के साथ। कैसे वो अपने दोस्तों और पड़ोसियों को तंग करते थे। उनके भाई अजीत तेंदुलकर का उनको लेकर सपना और नन्हें सचिन का अपने कोच रमाकांत आचरेकर से मिलना। शिवाजी पार्क में खेलना फिर अपने कोच के स्कूटर के पीछे बैठकर जाना। भारतीय क्रिकेट टीम में सलेक्ट होना। शुरूआती चुनौतियों के साथ टिक कर खेलना और टीम में अपनी जगह बना लेना। इसी दौरान पत्नी अंजलि से मुलाकात होना, क्रिकेट कैरियर के पथ पर बढ़ने के साथ निजी जिंदगी में सचिन का आगे बढना। अचानक से कप्तानी मिलना और फिर क्रिकेट कंटोल बोर्ड द्वारा बिना बताए कप्तानी वापस ले लेना। सचिन की जुबानी ऐसे घटनाक्रमों को सामने रखने के साथ कुछ पुरानी और नई फुटेज दर्शकों को देखने के लिए मिलती है। 

जब हम किसी ऐसे व्यक्तित्व पर बनी फिल्म को देखने के लिए जाते हैं जो हमारे साथ अभी मौजूद है तो उनके बारे में बहुत सी चर्चित बातें दर्शकों को पहले से पता होती हैं। वे कहीं ना कहीं उन बातों और घटनाओं को भी देखना चाहते हैं। लेकिन ये फिल्म सिर्फ सचिन और उनके परिवार को ही फोकस रखती है। ताज्जुब होता है कि उनके गुरू रमाकांत आचरेकर को एक कलाकार के जरिए फिल्म की शुरूआत में दिखाया जाता है लेकिन उनके सफल क्रिकेटर बनने के बाद रमाकांत आचरेकर का कोई जिक्र ही नहीं होता। उनके दोस्त विनोद कांबली और उनके रिश्तों की पड़ताल भी इस फिल्म में अधूरी रहती है। ये सच है कि सचिन अपनी निजी जिंदगी को लोगों से बचाना चाहते हैं। एक चैनल द्वारा उनकी शादी के लाइव कवरेज के प्रस्ताव को उन्होंने ठुकरा दिया था। तो अब ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी कि सचिन ने फिल्म के जरिए कुछ तयशुदा बातें देश-दुनियां के सामने जाहिर करने का निश्चय किया?

फिल्म में सचिन के पिता रमेश तेंदुलकर और उनके भाई अजीत तेंदुलकर के साथ उनके भावनात्मक लगाव को देख आप मध्यवर्गीय परिवार की उस ताकत को महसूस कर सकते हैं, जिसके ज़रिए माता-पिता और भाई प्रदत्त संस्कारों के जरिए एक साधारण लड़का असाधारण व्यक्तित्व की काया में प्रवेश कर जाता है। लेकिन इस फिल्म का सबसे कमजोर पहलू है कि इसमें वही है जो सचिन और उनकी पत्नी अंजलि दर्शकों को दिखाना चाहते हैं। इस नजरिए के कारण ये फिल्म क्रिकेटर सचिन तेदुलकर के स्थान पर उनके प्रशंसकों द्वारा दी गई उपाधि सचिन (क्रिकेट का भगवान) को समर्पित है।

हालांकि सिनेमाघर में दर्शक बड़ी तादाद में फिल्म देखने जा रहे हैं। इसलिए फिल्म अपना घोषित बजट (करीब 38 करोड़ रुपए) सप्ताह अंत तक आसानी से निकाल लेगी। लेकिन बहुत सारे दर्शक जो सचिन को पसंद तो करते हैं पर सिनेमाघरों में एक कहानी देखने के लिए जाते हैं, वे फिल्म को देख खुद को ठगा हुआ महसूस कर सकते हैं। फिल्म में पार्श्व संगीत के अलावा कोई एसा गीत नहीं आता जो क्रिकेट फुटेज के साथ दशकों को रोमांचित करे। कल भी सिनेमाघरों में इस मुगालते में कई दर्शक आए कि सचिन के बारे में थोड़ी जानकारी के साथ उनकी जिंदगी की घटनाओं का फिल्मांकन भी मिलेगा। वे फिल्म देखकर भारी निराश हुए।    



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं.

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