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Movie Review
हाफ़ गर्लफ्रेंड:प्रेम समीकरण की सार्थक स्याही


 

उपन्यास (पर आधारित): चेतन भगत  पटकथा: तुषार हीरानंदानी  संवाद: इशिता मोईत्रा  

मीडिया का एक बुद्धिजीवी वर्ग भले ही चेतन भगत के कथानकों को हल्के से लेता हो पर उनके कथानक ना केवल किताबी स्वरूप में पाठक पर अपना असर छोड़ रहे हैं बल्कि सिनेमाघरों में भी अपने वर्चस्व को कायम रखे हुए हैं। कल देर रात के शो में दर्शकों की गहमा-गहमी और एसी की तेज़ ठंडक के बाद भी गर्मी का अहसास, इस बात का गवाह था कि दर्शकों को हाफ़ गर्लफ्रेंड किस हद तक पसंद आ रही है।

बालाजी मोशन पिक्चर्स द्वारा निर्देशक मोहित सूरी और लेखक चेतन भगत की साझेदारी में बनी ये फिल्म, बाहुबली 2 और आईपीएल की वजह से अच्छे स्टार्ट को लेकर संदेह के घेरे में थी। लेकिन ना केवल शुक्रवार बल्कि शनिवार को भी दर्शकों का हुजूम सिनेमाघरों में उमड़ पड़ा। चेतन भगत के उपन्यास हाफ़ गर्लफ्रेंड की पटकथा को तुषार हीरानंदानी ने लिखा हैं और संवादों से सजाया है इशिता मोइत्रा उधवानी ने।

फिल्म की कहानी है बिहार के सिमराव कस्बे के लड़के माधव झा की जो स्टीवन कॉलेज दिल्ली में दाखिला लेता है। अपनी ग्रामीण पृष्ठभूमि की बेजह से वो अंग्रेज़ी में बात नहीं कर पाता है, जबकि कॉलेज का माहौल अंग्रेज़ीदां है। वह अपने आपको वहां असहज महसूस कर रहा है। एक दिन उसकी नजर कॉलेज में पढ़ने वाली रिया सोमानी (श्रद्धा कपूर) पर पड़ती है, तो वह एक नज़र में ही उसका दीवाना हो जाता है, और उसे कॉलेज में रूकने की वजह मिल जाती है।

वह रिया से नज़दीकियां बढ़ाने के लिए उसे बास्केटबॉल सिखाने लगता है। रिया उसे लेकर पहले बहुत सीरियस नहीं है लेकिन धीरे-धीरे वह माधव के भोले स्वभाव और उसके टूटकर चाहने वाले अंदाज़ के चलते उसे तरजीह देने लग जाती है। शायद इसलिए भी कि रिया के माता-पिता के रिश्तों में कड़वाहट है और घर में होने वाले क्लेश के कारण भी वह अपने घर में असहज महसूस करती है। इस झगड़े से वह दूर निकलने के लिए वह अपने गिटार को अपना दोस्त बना लेती है। लेकिन जब एक विश्वसनीय दोस्त के रूप में माधव उसे मिल जाता है तो उसकी तमन्नाओं को पंख लगने लगते हैं।

कुछ समय बाद जब माधव अपने दोस्तों के कहने पर रिया और उसके रिश्ते को नाम देना चाहता है तो रिया माधव को कह देती है कि वह उसकी हाफ़ गर्लफ्रेंड है। इसके बाद माधव के सभी दोस्त माधव की वाहवाही करते हैं क्योंकि कॉलेज की सबसे खूबसूरत लड़की के साथ उसकी दोस्ती है। लेकिन माधव का रूममेट शैलेश (विक्रांत मैसी) उसे लगातार चेताता है कि ये रिया सोमानी जैसी अमीर लड़कियां छोटे तबके के लड़कों से सिर्फ दिल बहलाव करती है; हमेशा के लिए उनकी नहीं होती हैं। वह माधव को चुनौती देता है कि अगर रिया हॉस्टल के कमरे में तुमहारे साथ आ जाए तो हम समझेंगे कि वो वास्तव में तुमसे प्यार करती है। माधव इस चुनौती को स्वीकार करता है। रिया उसके कमरे में भी आ जाती है। लेकिन कमेर में उन दोनों के बीच परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि रिया को माधव में भी अपने पिता की क्रूर छवि का दर्शन हो जाता है। वह हॉस्टल के कमरे से बाहर निकलती है तो वहां लड़कों की भीड़ उसे गलत निगाहों से ताड़ रही है। इससे रिया टूट जाती हैं और माधव से दूर हो जाती है। बाद में माधव को अपनी गलती का अहसास होता है तो वह कई बार रिया को फ़ोन करता है। अब माधव का प्यार उसके लिए जुनून बन चुका है और वह रिया के प्यार को हासिल करने के लिए अपने भविष्य को दावं पर लगाकर उसे पाने की जद्दोजहद में लग जाता है। कहानी इस तरह अपने क्लाइमैक्स की ओर बढ़ती है।

चूंकि ये फिल्म एक उपन्यास  पर आधारित है इसलिए अंत तक इसमें  घटनाक्रम, नए किरदारों का आगमन, परिस्थितियों का झालमझोल, कई छोटी-छोटी वजहे हैं जो फिल्म में लॉजिक ढूँढने वाले बुद्धिजीवी वर्ग को कहीं ना कहीं ना कही कचोटती हैं। निर्देशक ने फिल्म प्रस्तुति में उपन्यास की पृष्ठभूमि को ही रखा है। फिल्म माध्यम की समय सीमा को समझते हुए भी उन्होंने उपन्यास धरातल को फिल्म में प्रस्तुत करने का रिस्क भी उठाया है।

फिल्म का गीत संगीत विषय के अनुसार है। ‘मैं फिर भी तुमको चाहूंगा’ गीत की धुन को राजू सिंह ने अपने बैकग्राउंड स्कोर में विभिन्न साजों के जरिए शानदार तरीके से पेश किया है, जो दर्शकों को फिल्म के मूड से जोड़े रखता है। अर्जुन कपूर ने प्रारंभिक दृश्यों में भले ही औसत अभिनय किया हो पर इंटरवैल के बाद टूटे हुए प्रेमी के भाव और दर्द को पर्दे पर प्रस्तुत करने में वे सफल रहे हैं। श्रद्धा कपूर ने भी मासूम अंदाज को बरकरार रखा है। इस फिल्म में विक्रांत मैसी एक बेहतरीन एक्टर के रूप में उभरे हैं। एक अच्छे अभिनेता की यही खूबी होती हैं कि वह परिवेश के अनुसार अपने को ढाल ले । इस कड़ी में विक्रांत जहां हॉस्टल के दृश्यों में अपनी बिहारी संवाद अदायगी से दर्शकों का ध्यान आकर्षित करते हैं वहीं क्लाइमैक्स के दृश्यों में वे एक यूरोपियन पत्नी के अप्रवासी पति के रूप में बिल्कुल बदले नजर आते हैं। सीमा विश्वास भी काफी समय बाद एक अच्छी भूमिका में दिखी है।

अगर आप प्यार में हैं या आपने कभी प्यार किया है तो ये फिल्म आपके मन को अवश्य छूएगी। ये कहानी आपको प्यार में जीना सिखाएंगी और प्रेमप्रदत्त पीड़ा में प्रेम के अलौकिक मायने सिखाएगी। ये फिल्म मोहित सूरी के उस कथा संसार में और रंग भरती है, जिसमें किरदार शिद्दत से प्रेम में पड़ते हैं और दुनिया लुटाकर प्यार की टूटन झेलते हैं।

 



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं.

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