1
 


































Movie Review
सरकार 3 :पुरानी हुई सरकार की सोच


कथा-पटकथा: पी जया कुमार  कहानी: नीलेश गिरकर  संवाद: रामकुमार सिंह 

सरकार कोई व्यक्ति नहीं एक सोच है। पर सरकार की सोच अब पुरानी हो चुकी हैं। रामगोपाल वर्मा हैं कि इस सोच में कुछ नयापन नहीं ला पा रहे हैं। कंपनी के सफल ब्रांड सरकार 3 को देखते समय ये ख़याल ज़हन में कौंधता रहता हैं। रामगोपाल वर्मा के सिनेमा की एक पूरी पीढ़ी कद्रदान रही है। उनके शॉट एंगल, कैमरा प्लेसमेंट आज भी उतने ही असरदार हैं पर उनके प्रस्तुतिकरण में एक बासीपन का अहसास होने लगा है। इन दिनों जो अधिकतर सीक्वेल आ रहे हैं। उनमें सिर्फ फिल्मों के नाम रहते हैं। बाकी सब कुछ बदल दिया जाता है लेकिन रामगोपाल वर्मा ने सुभाष नागरे को बिलकुल नहीं बदला। हां, समय के साथ उनकी आवाज में बुढापा झलकाने के लिए इस बार अमिताभ से अगिनपथ के स्टाइल में संवाद अदायगी करवाई है।

बहरहाल कंपनी प्रोडक्शन की सरकार3 में नीलेश गिरिकर की कहानी को पटकथा संवाद से पी जयकुमार और रामकुमार सिंह  ने सजाया है। निर्देशक रामगोपाल वर्मा ने भी पटकथा लेखन में अपना योगदान दिया है।

फिल्म की कहानी के मुताबिक सुभाष नागरे (अमिताभ बच्चन) अपने प्रिय बेटे शंकर (अभिषेक बच्चन) को खो देने के बाद अकेले पड़ गए हैं। लेकिन उनके तेवर कमजोर नहीं पड़े हैं। इस वक्त गोकुल (रोनित रॉय) उनके साम्राज्य का सिपहसालार है जो सरकार का विश्वासपात्र माना जाता है। सुभाष नागरे की पत्नी पुष्पा बहुत बीमार रहती है। सुभाष से बीमार पत्नी एक दिन उन्हें बताती है कि उनका पोता शिवाजी (अमित साध) उनके साथ रहना चाहता है। वे उसे अपने साथ रखें। अपनी पत्नी की बात मान वे अपने पोते को अपने साथ लगा लेते हैं। इसी दौरान उन्हें गांधी नाम का एक बिल्डिंग कॉट्रेक्टर धारावी का एक एरिया  को खाली कराने के लिए कॉटेक्ट करता है। गांधी विदेश में बैंठे माइकल (जैकी श्रौफ़) का आदमी है। जब सुभाष उसका साथ देने से मना कर देते हैं तो गांधी सुभाष नागरे के विरोधी नेता देशपांडे (मनोज वाजपेयी) को सुभाष नागरे के खिलाफ उकसाते हैं। 

इधर शिवाजी के आने के बाद उनके सिपहसालार गोकुल और शिवाजी में  वर्चस्व की लड़ाई जन्म लेती हैं। इसमें सुभाष नागरे पिसते हैं। दोनों को लेकर सुभाष नागरे सशंकित हैं। शिवाजी का तर्क है कि गोकुल सुभाष के बाद उनकी गद्दी हथियाना चाहता है, तो गोकुल का तर्क हैं कि शिवाजी सिर्फ अपने पिता की हत्या का बदला सरकार से उनका सम्राज्य हथियाकर लेना चाहता है। वरना वो उनके दुश्मन के बेटी अनु (यामी गौतम) से प्यार में क्यों है?

सरकार सोच नहीं पाते हैं कि चीकू का विश्वास करें या गोकुल का। इतने में सुभाष नागरे पर गणेश पूजा के दौरान जानलेवा हमला होता है। सुभाष नागरे तो बच जाते हैं पर कुछ दिन बाद देशपांडे पर भी जानलेवा हमला होता है। और देशपांडे इस हमले में मारा जाता है। सबका शक सुभाष नागरे पर जाता है। सुभाष इसी कशमकश में अपने पोते शिवाजी को खुद से अलग कर देते हैं। शिवाजी जाकर सुभाष के विरोधियों के साथ मिल जाता है। इस तरह कहानी क्लाइमैक्स की ओर बढ़ती है।

पूरी फिल्म के नापतौल के बाद, बतौर समीक्षक अगर दिल से कहूं तो निर्देशक रामगोपाल वर्मा में खूब दमखम है लेकिन उन्हें आत्मअवलोकन की आवश्यकता है। उन्होंने अपनी कंपनी के ब्रांड सरकार के मुताबिक उन बिंदुओं को रखा है, जो उनके इस ब्रांड के एजेंडे में हैं। लेकिन वे दर्शकों को चौंकाने के चक्कर में चारों खाने चित्त होते हैं।

फिल्म की कमजोरी के तौर पर देखा जाए तो शिवाजी और गोकुल के किरदारों के रुख को लेकर रामगोपाल वर्मा का सस्पेंस दर्शकों के गले नहीं उतर पाया। बदलते वक्त में हिंदी सिनेमा की दर्शकों की सोच बदली हैं लेकिन रामगोपाल वर्मा अपने दर्शकों के सामने विस्मय की की स्याही फैलाने से अभी तक बाज नहीं आ रहे हैं। फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर में गोविंदा-गोविंदा गाना पहले की तरह ही है। फिल्म का छायाकंन अच्छा है।

अगर उन्हें सरकार3 में परिवारवाद को ही मजबूत करना था तो अमित साध के किरदार को थोड़ा और विस्तार दिया जाना चाहिए था। दर्शकों की नजर में अपने नकारात्मक रुख के चलते  शिवाजी अंत तक दर्शकों की सहानुभूति खो चुका होता है। गोकुल को गोली लगते ही फिल्म दर्शकों के दिमाग में पतंग के मांझे की तरह अटकने लगती है। बाकी अमिताभ के साथ मनोज वायपेयी ने छोटे से किरदार में ही अपनी छाप छोड़ी है। उन्हें ज्यादा फुटेज नहीं मिली है पर वो दो-चार सीन में ही अपनी अलहदा संवाद अदायगी के चलते असर छोड़ते हैं। हां जैकी श्रौफ़ के किरदार के बिना फिल्म बनाई जा सकती थी। इस किरदार के लिए मंहगे लोकेशन पर शूट करना फालतू खर्च सा लगता है। बहरहाल, अगर आप को सरकार ब्रांड से लगाव है तो बेहिचक आप ये फिल्म देख सकते हैं।            



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं.

Click here to Top