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सुप्रोतिम सेनगुप्
कथा-पटकथा-संवाद


सौमिक सेन
संवाद


























Movie Review
मेरी प्यारी बिंदु:प्रेम उपासना का भटकता भंवर


पुराने फिल्मी गीतों के स्थाई की लाइन से फिल्म का शीर्षक जुटा लेना अब आम बात है। फिल्म मेरी प्यारी बिंदु में फिल्म संगीत को किरदार की तरह पेश करना पुराने दौर के फिल्म संगीत को आदरांजलि जैसा लगता है। इस लिहाज से निर्देशक अक्षय रॉय और लेखक सुप्रतिम सेनगुप्ता-सौमिक सेन की तारीफ़ की जा सकती है। पर ये फिल्म कथ्य को कहने के मामले में कुछ खास नया नहीं कर पाती है। बेशक लेखक ने किरदार अच्छे लिखे हैं जिनमें ज़मीनी हकीकत की खुश्बू है पर फिल्म में निर्देशक अक्षय रॉय कथा प्रस्तुतिकरण में उनका ढँग से निर्वाह नहीं कर पाते है।

फिल्म की कहानी के मुताबिक मुंबई में रहने वाला लेखक अभिमन्यु रॉय (आयुष्मान खुराना) लुगदी साहित्य का रचयिता है। अभिमन्यु की कहानियां हॉरर के साथ पाठक में काम-भावना का संचार करती हैं। उसकी किताबें खूब बिकती हैं। ऐसे में एक दिन उसकी मां का फोन आता है जिसमें वो अभिमन्यु को बताती है कि वो और उसके पिता तलाक ले रहे हैं। चिंतित अभिमन्यु अपने गृहनगर कोलकाता लौटता है लेकिन यहां पर उसे पता चलता हैं कि ये सभी उसे वापिस घर बुलाने के लिए था। क्योंकि वो काफी समय से अपने घर नहीं आया था। उसकी मां चाहती हैं कि वो अपना घर बसा ले, लेकिन अभिमन्युपर पर उसके  प्रकाशक का दबाब है कि वो उनके लिए नई किताब लिखे।

कोलकाता लौट आने पर इस लेखक की यादों में उसकी बीती जिंदगी के पन्नें खुलते हैं जहां उससे बिछुड़ी हुई दोस्त बिंदु (परिणिति चोपड़ा) उसे एक बार फिर याद आती है। वह अपने अतीत और बिंदु को लेकर ही टाइपरायटर पर नई कहानी गढ़ना शुरू करता है।

अभिमन्यु यहां से दर्शकों के समक्ष बिंदु और उसकी अनसुलझी कहानी के साथ रूबरू होता हैं। बिंदु, अभिमन्यु का पुराना प्यार है जो परिस्थितियों के बीच उससे अलग हो गई है। इस स्टोरी नैरेशन में दर्शक कहानी के प्रमुख पात्र बिंदु के चरित्रांकन में ही नायक-नायिका के अनसुलझे से रिश्ते से रूबरू होते हैं। इस तरह फिल्म क्लाइमैक्स की और बढ़ती हैं।

इंटरवल तक तो सब कुछ ठीक-ठाक सा लगता हैं पर इसके बाद फिल्म भटकती हुई सी प्रतीत होती है। फिल्म के लेखक-निर्देशक का अपने किरदारों से बेइंतहा प्रेम दर्शक को अंत तक जोड़े तो रखता हैं पर किरदारों की सोच पर निर्देशक का गैर जरूरी अधिपत्य फिल्म को कमजोर कर देता है।

जो लेखक हैं वो इस बात को महसूस कर सकते हैं कि कई बार पन्नों पर उतरते- उतरते किरदार खुद ही अपना रुख तय करने लग जाते हैं। ऐसे ही फिल्म मेकिंग की अलौकिक विधा में भी स्क्रिप्ट से सेल्युलॉइड पर उतरते हुए कई बार किरदार अपना नवीन भविष्य तैयार कर लेते हैं। लेकिन अधिकतर निर्देशक किरदारों को स्क्रिप्ट का हवाला देते हुए उनका दम घोंट देते हैं। इंटरवल के बाद जैसे जैसे फिल्म अंत की ओर बढ़ती है ये बात कहीं ना कहीं मन को कचोटती हैं कि अभिमन्यु और बिंदु की दिशा कुछ और होनी चाहिए थी।

वैसे फिल्म के किरदारों के बीच के घटनाक्रम अपने गली मोहल्ले के से लगते हैं। मसलन बालिका बिंदु के लिए नन्हें अभिमन्यु का समोसा लेकर जाना या दो घंटी वाली लड़की के खतरे से, मां का अपने बेटे अभिमन्यु को आगाह कराना।

काफी समय से देख रहा हूं कि नई पीढी के निर्देशकों की समस्या है कि उनके किरदार साथ खाते हैं, पीते हैं और कई बार साथ सो भी जाते हैं लेकिन बात कमिटमेंट की आती है तो भाग खड़े होते हैं। फिल्म की शुरुआता से ही फिल्म में देशकाल वातावरण को साल दर साल दिखा रहे निर्देशक अक्षय रॉय को शायद लगा हो कि वे कहानी मेंं ट्विस्ट ला रहे हैं पर फिल्म की अवधि बढती है। अगर अंतिम ट्विस्ट लाए बिना मुंबई में कहानी पटाक्षेप हो जाता तो शायद फिल्म लास्ट मिनिट्स में बोझिल ना लगती । 

फिल्म का गीत संगीत कहानी और किरदारों के मुताबिक है । हारेया मैं दिल हारेया और ये जवानी पुराने रेट्रो सॉगस की याद दिलाते हैं। लेकिन एक बात खटकती है कि फिल्म का खास गीत माना कि हम यार नहीं जिसे परिणिति चोपड़ा ने अपनी आवाज दी है, वह परिणिति पर नहीं फिल्माया गया। फिल्म के अंत में इस गीत का बेदम पदार्पण होता है।

अगर फिल्म को बॉक्स आफिस के लिहाज से देखूं तो निश्चित ही इस शुक्रवार की सभी फिल्मों का कलैक्शन सिनेमाघरों में जमी बाहुबली-2 से प्रभावित होगा। अगर आप बाहुबली देख चुके हैं और इस वीकेंड में फिल्म देखने का प्लान हैं तो आप मेरी प्याारी बिंदु देख सकते हैं। 



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

छले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं.

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