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Movie Review
बाहुबली 2:स्त्री वर्चस्व की लड़ाई में बंटता पुरूष


चाहे मज़ाक में ही सही, पर काफी समय से देश के लिए मनोरंजन जगत का ये सबसे बड़ा सवाल था कि आखिर कटप्पा ने बाहुबली को क्यूं मारा? वैसे मैं इस प्रश्न का उत्तर यहां देकर आपके कौतूहल को कतई कम नहीं करना चाहूंगा। लेकिन हां ये बात जरूर कहना चाहूंगा कि बाहुबली के बाद बाहुबली 2 में भी लेखक विजेद्र प्रसाद अपने बेटे निर्देशक एस एस राजमौली के साथ सिनेमाघरों में जादू जगाने में फिर से कामयाब हुए हैं।

फिल्म की किहानी में एक बार फिर से माहिष्मति साम्राज्य हैं जहां पर राजमाता शिवगामी देवी (रमैया कृष्णन), अमरेंद्र बाहुबली (प्रभाष) को राजा बनाने का निर्णय ले चुकी हैं। राजपाट सौंपने से पहले वे अपने प्रिय बाहुबलि को अपने मामा कटप्पा के साथ देशाटन जाने के लिए कहती हैं। पहले तो बाहुबली आनाकानी करता है पर शिवगामी के ये कहने पर कि "राजा देशाटन ना करे तो वह प्रजा का हाल कैसे जानेगा?", से प्रभावित होकर वो देशाटन के लिए निकल जाता है।

वो अपने मामा कटप्पा के साथ घूमते हुए एक छोटे से अन्य राज्य में पहुंचता हैं। ये राज्य लुटेरे पिंडारियों से भयग्रस्त हैं। यहां पर बाहुबली को वीरता और सौंदर्य से परिपूर्ण राजकुमारी देवसेना (अनुष्का शेट्टी) से प्यार हो जाता हैं। वो अपने मामा के साथ अपनी सारी वीरता को छुपा, देवसेना से एक मंदबुद्धि युवक के रूप में मिलता है। छोटे-मोटे घटनाक्रमों के बाद उनमें प्रेम संबध स्थापित हो जाता है। इधर भल्लाल देव (राणा दग्गुबाती) और उसका पिता (नासर) शिवगामी द्वारा अपनी बेखयाली के चलते नाराज़ हैं।

ऐसे में भल्लाल का गुप्तचर संदेश देता हैं कि बाहुबली को देवसेना से प्रेम हो गया है। इसके साथ ही देवसेना का एक चित्र भी भल्लाल को मिलता है। भल्लाल देवसेना को चित्र में देख उस पर मोहित हो जाता है। वो देवसेना को पाने के लिए एक षडयंत्र रचता हैं जिसमें शिवगामी देवी फंस जाती हैं। शिवगामी देवी को जब पता चलता है कि भल्लाल चाहता है कि वो देवसेना से ब्याह करे तो वो देवसेना के महल में बड़ी धन संपदा और गहनों के साथ शादी का प्रस्ताव भिजवा देती है। स्वाभिमानी देवसेना इस प्रस्ताव में खुद को वस्तु जैसा समझती है और शिवगामी के इस विवाह प्रस्ताव को ठुकरा देती है। 

इधर कटप्पा को शिवगामी के संदेश में लगता है कि वो देवसेना का ब्याह शायद बाहुवली के साथ कराना चाहती है। जब गुस्साई शिवगामी देवी देवसेना को बंदी बनाकर लाने का संदेश भेजती हैं तो बाहुबली देवसेना के माता पिता से उसकी सुरक्षा का वादा लेकर उसे अपने साथ आदरपूर्वक महिष्मति लेकर चल देता है। लेकिन राजसभा में शिवगामी द्वारा बाहुवली के बजाय उसके जीवन की डोर भल्लाल  के साथ बंधने की बात होती है तो वो इसका विरोध करती है । ऐसे में  अपने वचन के मुताबिक अमरेंद्र बाहुवली प्रेयसी के लिए राजपाठ का मोह त्यागकर, परिस्थितिवश, अपनी मां के निर्णय के विरुद्ध हो जाता है। यहीं से सास-बहू में पैदा हुआ अंर्तविरोध महिष्मति साम्राज्य के लिए अभिशाप बनकर प्रकट होता है। इसी के चलते आगे के घटनाक्रमों में इस बात का खुलासा होता है कि आखिर कटप्पा ने बाहुबली को क्यूँ मारा। 

जहां पहली बाहुबली में कटप्पा को दर्शकों ने धीर वीर गंभीर सैनिक के रूप में देखा वहीं इस बार दर्शक कट्प्पा को फिल्म की शुरूआत में कॉमेडी करते हुए देखेंगे। शिवगामी के रोल में रमैया कृष्णन दोनो ही फिल्मों में दमदार रही हैं। हालाँकि इस बार तमन्ना भाटिया की जगह अनुष्का शेट्टी फिल्म में छा गई हैं। लेखक -निर्देशक ने उन्हें खास जगह भी दी है । ये फिल्म पहली फिल्म से 10-12 मिनिट थोड़ी लंबी ज़रूर है पर ये लम्बाई कथा के पूर्ण पटाक्षेप के लिए ज़रूरी भी थी। इसलिए अखरती नहींं है।

फिल्म का अंत बहुत प्रभावी है। जहां अमरेंद्र बाहुवली की शक्तियां उसे फंतासी किरदार घोषित करती हैं वहीं महेंद्र बाहुबली का संघर्ष उसे वास्तविक किरदार के रूप में पेश करता है। लेखक मनोज मुंतशिर ने फिल्म के संवाद विशुद्ध हिंदी में लिखे हैं जो देशकाल वातावरण के अनुकूल लगते हैं। फिल्म में गीत संगीत के लिए बहुत ज्याद स्कोप तो नहींं हैं लेकिन फिर भी एक कृष्ण भजन अच्छा रचा गया है जो दर्शकों के समक्ष, सिचुएशन के अनुसार नायिका के मन के भाव प्रेषित करने में सहायक सिद्ध होता है।

फिल्म पूरी तरह से पारंपरिक लुक में हैं फिर भी नारी सत्ता को अप्रत्यक्ष रूप से दर्शकों के समक्ष लाती है। अपनी पत्नी के स्वाभिमान और मां के आत्माभिमान के बीच में फंसे अमरेंद्र बाहुबली के जरिए लेखक कहीं ना कहीं स्त्री वर्चस्व की लड़ाई में भावनात्मक रूप से पिसते आदमी को पेश करते हैं।इस शुक्रवार बाहुबली-2 के आगे कोई दूसरी फिल्म रिलीज नहीं हुई है। वीकेंड में आप ये फिल्म देखने जाएं ताकि इस यक्ष प्रश्न का उत्तर आपको मिल सके कि - 'कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा?' साथ में भरपूर मनोरंजन तो ही।... और हां, आप परिवार के साथ जा रहें हैं तो टिकिट सिनेमाघर जाने से पहले ही आरक्षित करा लें तो बेहतर रहेगा!



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं.

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