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माइकल पेलीको
पटकथा


मिश्का शेखावत
संवाद


























Movie Review
मातृ:बदले की अंतहीन भावना से भरी


रिश्तों से इंसान का भावनात्मक वजूद बना रहता है। अगर ज़िंदगी में रिश्तों का रसायन खत्म हो जाएं तो फिर इससे उपजी टूटन इंसान के दिमाग में अलग फितूर भर देती है। इस शुक्रवार को रिलीज़ हुई लेखक माइकल पेलीको और निर्देशक अश्तर सैय्यद की फिल्म मातृ इस खयाल को दर्शाती है। हालाँकि अफसोस है कि लेखक और निर्देशक अपनी बात को पुरजोर तरीके से कह नहीं पाए। मुझे हैरत है कि जब फिल्म में नायिका को एंग्री लेडी के रूप में पेश करना था तो फिर इतना मृदुल शीर्षक रखने की क्या ज़रूरत थी।

बहरहाल, फिल्म की कहानी के मुताबिक, विद्या चौहान दिल्ली के एक स्कूल में टीचर हैं । उसके स्कूल में वार्षिकोत्सव का कार्यक्रम है। वो इसे खत्म कर अपनी किशोरी बेटी टिया के साथ कार में घर लौट रही होती हैं और रात में रास्ता भटक जाती हैं। दोनों एक सड़क हादसे का शिकार हो जाती हैं। उनके पीछे ही आ रहे राज्य के मुख्यमंत्री का लड़का अपूर्व (मधुर मित्तल) और उसके नशेड़ी साथी दोनों का अपहरण कर लेते हैं और अपने ठिकाने पर ले जाकर दोनों के साथ बलात्कार करते हैं। बाद में दोनों को मृत समझकर सुनसान सड़के के किनारे फेंक जाते हैं। इस हादसे में बेटी टिया की मौत हो जाती है। लेकिन विद्या चौहान अपनी जीने की जिजीविषा के चलते होश में आ जाती है। उसे अस्पताल पहुंचाया जाता है। विद्या का पति रवि चौहान (रुशाद राना) पहले से ही अपनी पत्नी के ज़िंदगी  जीने के बुलंद रवैए से थोड़ा असहज लगता है।

इस हादसे के बाद तो जैसे वह अपनी पत्नी के लिए अजनबी ही हो जाता है। विद्या अस्पताल में हुई पुलिस पुछताछ में पुलिस अफसर जयंत श्राफ़ (अनुराग अरोरा) के सामने  मुख्यमंत्री के बेटे का नाम लेती है लेकिन इस केस को दबा दिया जाता है। विद्या के अस्पताल से छुट्टी लेते ही उसका पति भी उसे छोड़ देता हैं। ऐसे में उसकी चित्रकार दोस्त रितु (विद्या जगदाले) उसका साथ देती है। दोनों थाने पहुंचती हैं तो पता चलता है कि केस सॉल्व हो चुका है और बलात्कार करने वाले दो तीन छुटभैयों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है। वहां से विद्या हताश, निराश लौटती है। अब वो बदले की भावना से भरी हुई है। वो अपनी बेटी के कातिलों को सबक सिखाने का निर्णय लेती है। इस तरह फिल्म अपने क्लाइमैक्स की ओर अग्रसर होती है।

फिल्म की सबसे बड़ी कमी है कि लेखक ने ऐसे हादसों के प्रायौगिक घटनाक्रम को पकड़ने की बजाय हिंदी उपन्यासों के फंतासी लहजे को पकड़ा हैं। कहानी शुरुआत में बांधती है लेकिन विद्या के थाने में पहुंचने पर वहां दो जरायम पेशा लोगों के बलात्कारी होने की पुलिस की पुष्टि के साथ फिल्म कमजोर पड़ने लगती हैं। यहां दर्शकों को लगता है कि मां कोर्ट-कचहरी में संघर्ष करेगी और अपनी अस्मिता और बेटी के हत्यारों के खिलाफ जाएगी पर मां दूसरे ट्रैक पर चली जाती है।

जब पुलिस के सामने घायल विद्या ने प्रमुख आरोपी को पहचान लिया तो कम से कम मीडिया के सामने तो इसे कहा ही जा सकता था। जो महिला बदले की भावना से भर सकती है तो क्या वो मीडिया के सामने प्रमुख आरोपी का नाम नहींं खोल सकती है? प्रैक्टिकल लहजे में सोचें तो अगर मुख्यमंत्री के बेटे को कोई आरोपी बना दे तो विपक्ष एक झटके में पीड़िता के साथ होगा। ऐसे में मीडिया भी झक मारके उसके पक्ष में आ जाएगा और दो दिन में सरकार बदलते देर ना लगेगी, लेकिन इसके बजाय एक संभ्रात शिक्षिका के मन में बदले की भावना भरना दर्शकों को हजम नहींं होता।  

फिल्म में रवीना टंडन ने पूरी ईमानदारी के साथ अभिनय किया है। हालाँकि निर्देशक ने उन्हें एक बेटी की मां के रूप में पेश करने के बजाय एक बदले की भावना से भरी हुई लड़कीनुमा औरत के रूप में प्रस्तुत किया है। थ्रिलर फिल्मों में बैकग्राउंडस्कोर का प्रभाव दृश्य प्रस्तुति को असरदार बनाता है लेकिन इस मामले में भी फिल्म कमजोर रहती है।

इसके साथ ही विद्या के पति का उसकी चोट ठीक हो पाने से पहले ही उसको छिटक देना भी आसानी से गले नहींं उतरता। फिल्म की पटकथा, थ्रिल और इमोशन के बीच कहीं अटकती है। फिल्म के ट्रेलर में लगता है कि शायद एक मां कानून के जरिए अपनी बेटी को कातिलों को सजा दिलवाएगी। ऐसे में ये कम से कम पारिवारिक दर्शकों की फिल्म तो बन ही सकती थी। फिलहाल, मातृ सिर्फ मसाला टाइप की थ्रिलर फिल्म बनके रह गई है।  



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं..

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