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सृजित मुखर्जी
लेखक-निर्देशक


कौसर मुनीर
अतिरिक्त पटकथा, सं


























Movie Review
बेग़म जान:कथ्य को कह पाने में कमज़ोर


दूर खुले मैदान में एक छोटी सी पहाड़ी के बीच में स्थापित हवेलीनुमा बड़ा सा मकान जहां ठुमरी गाती हुई विद्या बालन, गाली देती हुई विद्या बालन और अंत में गोली चलाती हुई विद्या बालन। मैंने जब बेगम जान का ट्रेलर देखा और उससे जो फिल्म की कहानी का ढाँचा दिमाग में बैठा तो बड़ी खुशी हुई कि शायद एक अच्छी पीरियड फिल्म दर्शकों को देखने को मिलेगी। इसके साथ ही इस बात की भी खुशी थी कि 30 साल के सेलिब्रेशन पर भट्ट बंधु विशेष फिल्म्स के ज़रिए क्लासिक सी फिल्म दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।

लेकिन फिल्म को देख निराशा हुई। लगा कि कहानी कहने से ज़्यादा विद्या बालन के अभिनय कौशल को एक मंच देने की कोशिश हुई है। जिसमें विद्या बालन सधी हुई अभिनेत्री की पूर्वनिर्मित छवि में बाट लगाती हुई नजर आती हैं। हालांकि सृजित मुखर्जी चाहते तो फिल्म को कस सकते थे, जैसे फिल्म के अंत को उन्होंने कसा है।

फिल्म की कहानी यूं तो सर्वविदित है लेकिन रस्म-अदायगी कि चलते बता दें कि बेगम जान कहानी है 1947 के देशकाल वातावरण में जहां पंजाब के एक हिस्से में बेग़म जान (विद्या बालन) कोठा चलती हैं। वहां पर पूरे देश के विभिन्न प्रांतों से आईं लड़कियां हैं जो पुलिस, गोरों, स्थानीय नेताओं आदि को सैक्स सेवाएं देती हैं। बेग़म जान हादसों में पीड़ित लड़कियों को अपने यहां शरण देती हैं। और इन सभी में कहीं ना कहीं ना कहीं एक भावनात्मक रिश्ता भी पनपता है। वे साथ होली खेलती हैं, खाना खाती हैं, खूब मस्ती करती हैं। सब कुछ अच्छा चल रहा है लेकिन देश आज़ाद होने पर एक फ़रमान निकलता है जिसके मुताबिक बेग़म जान की स्याह हवेली के बीच से विभाजन रेखा खींची जाएगी।

पहले तो बैख़ौफ़ बेग़म इससे घबराती नहीं हैं क्योंकि उनके सिर पर राजा साहब (नसीरुद्दीन शाह) का हाथ है। लेकिन देश विभाजन के बाद खुद राजा साहब ही नई सरकार के आगे घुटने टेकने को मजबूर है। ये फैसला नहीं बदलेगा, बेग़म जान जब जान जाती हैं लेकिन वो सोच लेती है कि राजा साहब की तरह वो घुटने नहीं टेकेगी क्योंकि वो अपने घर को नहीं छोड़ना चाहती और इसके चलते वो एक दुस्साहसी फैसला लेती है।  

लेखक-निर्देशक सृजित मुखर्जी की बांग्ला फिल्म को हिंदी में भाषा में बदला गया है। फिल्म में स्थान और कलाकारों का परिवर्तन हुआ। स्टार विद्या आईं जिन पर सृजित मुखर्जी बतौर निर्देशक अंकुश रखना तो दूर की बात, वे ख़ुद विद्यामय हो गए। निर्माता सोचते रहे कि यार इसी कहानी पर इसी निर्देशक की जब बांग्ला फिल्म हिट रही हैं तो हिंदी फिल्म को तो बड़े चेहरों के साथ उससे अच्छा बना जाएंगे।

बेग़म जान के एंट्री सीन से ही निर्देशक सृजित मुखर्जी की फिल्म पर से लगाम छूटती नजर आती है। हालांकि फिल्म के अंत को कसने की कोशिश की गई है पर तक बहुत देर हो चुकी होती है।

बतौर निर्देशक सृजित मुखर्जी की फिल्म में पहली कमी यह रही कि उन्होंने किरदारों का मजमा तो खूब लगाया पर उनके विकास पर ध्यान नहीं दिया। मसलन, मास्टर साब (विवेक मुशरान) और जनेऊधारी पंडित (चंकी पांडे) के किरदार को गढ़ा ही नहीं गया कि उनका खलनायक तत्व उभरकर सामने आता। साफ़ नज़र आता है कि अन्य किरदार बेवजह संपादन का शिकार हुए हैं जिससे फिल्म की तामीर हिल गई है।

फिल्म की कहानी में एक भावनात्मक प्रभाव है। एक ऐसी महिला जिसे छोटी सी उम्र में बाल विधवा होने के कारण जब घर से बाहर निकाला गया वो भटकती हुई अपना शरीर रुंदवाती हुई इस मुक़ाम पर पहुँचती है जहाँ उसका अपना एक साम्राज्य है। अब वह किसी हाल में अपने साम्राज्य को नहीं छोड़ सकती चाहे वो फ़ना हो जाए। लेकिन ये चीज पटकथा से गायब रही।

सिर्फ एक छोटा सा शॉट हैं जहां सपने में एक सफ़ेद कपड़े पहने परछाईनुमा लड़की को घर से बाहर फेंका जा रहा है। अगर इसका विस्तार होता इस इमोशन से अंत को गहराई के साथ छुआ जा सकता था। इसके अलावा अम्मा जी (इला अरूण) छोटी बच्ची को कहानी सुनाती हैं जिसमें कभी लक्ष्मीबाई की कहानी होती तो कभी किसी और वीरांगना की जिसमें हम विद्या बालन को उनके गेटअप में देखते हैं। जबकि बच्ची और बेग़म जान के बीच में ऐसा कोई भावनात्मक दृश्य नहीं है कि वो उसे वीरांगना के रूप में देखे ।

अगर कलाकारों की बात करें तो मास्टर साहब के रूप में विवेक मुशरान और अम्मा जी के रोल में इला अरूण अपनी छाप छोड़ते हैं। कलाकारों की संवाद अदायगी के लिहाज से इला अरूण बाज़ी  मारती हैं। उन्होंने अपने संवादों में प्रभावी बुंदेलखंडी बोली है। फिल्म का संगीत समकालीन है पर सिनेमाघर से निकलने के बाद सिर्फ ठुमरीनुमा गीत प्रेम में तोहरे जबसे पड़ी याद रह जाता है।

अंत में, फिल्म के संपूर्ण प्रभाव को कहूं तो फिल्म की कहानी में वो चीज़ें मौजूद थीं जिन पर निर्देशक सृजीत मुखर्जी अच्छी फिल्म बना सकते थें। लेकिन पटकथा और प्रजैंटेशन में सिर्फ एक स्याह इमारत और उसमें चीखते चिल्लाते कलाकार रह गए हैं, जो दर्शकों को सिनेमाघर में कुछ ख़ास मनोरंजन नहीं दे पाएंगे।        



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं. .

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