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शांति भूषण
(पटकथा-संवाद)


























Movie Review
मिर्ज़ा जूलियट:इश्क़ की अनसुलझी दास्तान


यूं तो इश्क़ मुहब्बत के अपने-अपने फलसफ़े हैं लेकिन ये सार्वभौमिक सा सच है कि जब इंसान प्रेम में पड़ जाता है तो वह अपने र्स्वाथपरता के लिए सोचे गए रास्तों में नहीं पड़ता है। इसकी बजाय उसे प्रेम की परीक्षाओं से भरे मुश्किल रास्ते में पड़ना ही सुगम लगता है। इस शुक्रवार को रिलीज़ हुई लेखक शांतिभूषण और निर्देशक राजेश रामसिंह की फिल्म मिर्ज़ा जूलियट इश्क़ और जुनून को लेकर बहुत कुछ कहना चाहती है पर संपूर्ण प्रभाव में अपने उद्देश्य और कथ्य को असरदार ढंग से प्रस्तुत करने में नाक़ाबिल साबित होती है।

कहानी उत्तर प्रदेश के परिवेश में दो प्रेमियों, मिर्ज़ा (दर्शन कुमार) और जूली शुक्ला उर्फ जूलियट (पिया बाजपेयी) की है। जूली उत्तर प्रदेश के दबंग नेता धर्मराज शुक्ला (प्रियांशु चटर्जी) की लाडली बहिन है। भाइयों की दबंगई के चलते वह बेख़ौफ़ है। यूँ वो क़द काठी से जवान है पर उसके अंदर की जवान लड़की को किसी ने अभी तक छुआ नहीं है। उसमें एक अजीब प्रेम कौतूहल भरा पड़ा है पर प्रेम-ज्ञान के मामले अल्हड़ है। 

तभी उसकी ज़िंदगी में एंट्री होती हैं मिर्ज़ा की। पहली मुलाक़ात में मिर्ज़ा उसके लिए अजनबी है। मिर्ज़ा का अपना कोई नहीं है, इसलिए वह जूली के गांव में आया है, जहां उसके मामा सिलाई का काम करते हैं। मामा जूली और मिर्ज़ा को मिलाते हैं, तब उन्हें पता चलता है कि वे तो बचपन में एक दूसरे के गहरे मित्र थें लेकिन परिस्थितियों ने उनकों एक दूसरे से अलग कर दिया। दोनों मिलते हैं तो मिर्ज़ा जूली को बताता है कि बचपन में उससे बिछड़के वह अपने गांव चला गया था जहां उसकी मां उसके पिताजी के हत्यारों को कोर्ट से सजा दिलवाने के लिए प्रयासरत थी। लेकिन हत्यारों ने एक दिन उसकी मां को भी गोली मार दी। ऐसे में, परिस्थितिवश, वो भी अपनी मां के हत्यारे को गोली मार कर बाल-सुधार गृह चला गया।

इधर जूली शुक्ला की शादी इलाहबाद के दबंग नेता पांडे जी (स्वानंद किरकिरे) के बेटे राजन पांडे (चंदन रॉय सान्याल) से शादी तय हो चुकी है। राजन पांडे एक कामांध युवा है, जो औरत को अपनी धरोहर समझता है। फ़ोन पर ही वो सेक्स, आलिंगन और बेढंगी बातें करता है। जूली उसे अपना होने वाला होने वाल पति जानकर उसकी बातें सुन तो लेती हैं पर उसे मर्यादामय रिश्ते में ये सब अटपटा लगता है। अपने बचपन के दोस्त मिर्ज़ा के ज़िंदगी में आगमन के बाद उसे महसूस होता है कि प्रेम सिर्फ अधिकार जमाने से ही नहीं होता है। किसी लड़की का दिल जीतने पर वह अपना सर्वस्व दांव पर लगा सकती है। इन्हीं परिस्थितियों में जूली एक रात मिर्ज़ा को अपना शरीर सौंप देती है। इश्क़ के मामले में एक यथार्थ ये भी है कि जब मानसिक प्रेम को शारीरिक संयोग मिल जाता है तो वो उन्वान को छू लेता है। अब मिर्ज़ा भी जूली शुक्ला को हमेशा के लिए अपना बना लेना चाहता है।  इसके बाद फिल्म की नायिका जूली दोराहे पर खड़ी है। एक तरफ उसके भाईयों का प्यार है, पांडे फैमिली का धन-ऐश्वर्य है तो दूसरी तरफ मिर्ज़ा का प्यार। इसके साथ आगे विभिन्न घटनाक्रम जुड़ते जाते हैं और कहानी अंत के ओर बढ़ती है।

फिल्म देखते हुए कई बार लगता है कि निर्देशक राजेश राम सिंह एक फिल्म में ही बहुत कुछ कहना चाहते हैं इसलिए अपने कथ्य को लेकर दर्शकों से उनका संप्रेषण गड़बड़ा जाता है। फिल्म की शुरूआत से ही बिना किसी रूपरेखा के घटनाएं दर्शक के समक्ष तेज़ी से प्रस्तुत होती हैं। हो सकता है कि निर्देशक की सोच के मुताबिक वह  किरादरों को डवलप करने के लिए ऐसा कर रहे हों, पर यह सब नाटकीय सा लगता है। मसलन हिंदू-मुसलमानों के सीन और मर्डर, जूली का एक लड़के को बुरी तरह से पीटना आदि।  

फिल्म में पिया वाजपेयी ने परिवेश को अच्छी तरह से पकड़ा है। लेखक-निर्देशक ने उनके किरदार पर थोड़ी मेहनत भी की है। दर्शन कुमार भी संवाद अदायगी में यूपी के टोन को पकड़ने का सफल प्रयास करते हैं। स्वानंद किरकिरे को अच्छा रोल मिला है, प्रियांशु चटर्जी पहली बार एक मैच्योर भूमिका में नजर आए हैं। फिल्म के लिहाज से गीत-संगीत ठीकठाक हैं।

फिल्म में सबसे ख़ास बात ये है कि ये कहीं ना कहीं दर्शक के ज़हन में ये सवाल ज़रूर उठाती है कि क्या शादीशुदा औरत अपने मर्द की धरोहर बन जाती हैं?  एक सीन बहुत अच्छा बन पड़ा है, जहां जूली घबराके मिर्ज़ा से पूछती है कि उसे ये सब बुरा क्यों लगता है तब मिर्जा का कहना कि जब औरत को प्रेम में सुक़ून और सुरक्षा मिलती है, तब उसे संयोग-संभोग की चर्चा स्वत: अच्छी लगेगी। फिल्म प्रेमी-दंपत्ति जोड़ों को बुरी नहीं लगेगी। एक्शन-रोमांच देखने वाले भी आनंद ले सकेंगे। हां, पारिवारिक ऑडियंस के लिए इसमें ज़्यादा कुछ नहीं।       



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं.

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