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श्रेया देव वर्मा
लेखिका


प्रशांत पांडे
लेखक


























Movie Review
पूर्णा:प्रेरणा, पीड़ा और पर्बत


 

शुक्रवार को रिलीज़ हुई नाम शबाना के साथ ही सिनेमाघर तक पहुँची है फ़िल्म पूर्णा, जो शायद प्रचार के अभाव में जनमानस तक नहीं पहुंच पाई है। पर इतना तय है कि सिनेमाघर में देखे जाने पर यह फ़िल्म आप पर निश्चित असर छोड़ेगी। ये कहानी है तेलंगाना की आदिवासी लड़की पूर्णा की जिसे सबसे कम उम्र की एवरेस्ट फतह करने वाली लड़की के रूप में जाना जाता है। 

अभिनेता-निर्देशक राहुल बोस और लेखक जोड़ी प्रशांत पांडे-श्रेया देव वर्मा ने दो छोटी बच्चियों के ज़रिए खेल-खेल में बड़ी बात कर दिखाने का हौसला दिखाया है। फ़िल्म की टैगलाइन है - ‘लड़कियां कुछ भी कर सकती हैं।’ अभिनेता राहुल बोस अपने अभिनय से बॉलीवुड में एक अलहदा स्थान तो रखते ही हैं लेकिन निर्देशन के लिए ऐसे विषय को चुनना, बतौर निर्देशक भी उन्हें भीड़ से थोड़ा अलग करता है।

मई 2014 में एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने वाली पूर्णा के साहस को तो समाचारों ने हम तक पहुंचा दिया, लेकिन इस साहस के पीछे छुपी प्रेरणा और पीड़ा से राहुल बोस बड़ी संवेदनशीलता के साथ सिनेप्रेमियों का परिचय कराते हैं। फ़िल्म की कहानी के केंद्र में हैं तेलंगाना के आदिवासी क्षेत्र की दो बहिनें जो साथ खेलती-पढ़ती हैं और खेल-खेल में ही मुश्किलें हल करती हैं। प्रिया (एस मारिया) और पूर्णा (अदिति इनामदार) दोनों कज़िन हैं। वे बेहद ग़रीब हैं। प्रिया बड़ी है और पूर्णा छोटी। स्कूल पढ़ने जाती हैं तो वहीं पर उनसे झाड़ू लगवाई जाती है क्योंकि उनकी फ़ीस जमा नहीं है। वो दोनों एक दिन घर से भागने की कोशिश करती हैं लेकिन पकड़ी जाती है। इस पर किशोरी प्रिया की शादी तय कर दी जाती है और वह ससुराल के लिए विदा हो जाती है। 

प्रिया ही पूर्णा की प्रेरणा है। वो ससुराल जाते हुए अपनी बहिन पूर्णा को कह जाती है कि वो समाज-कल्याण विभाग के स्कूल चली जाए। जहां पर सब कुछ फ़्री में मिल जाता हैं। पूर्णा उस स्कूल में पहुंचती हैं जहां पर सब कुछ फ़्री तो है पर खाना ऐसा कि इंसान खा ही नहीं सके। तब उसकी जिंदगी में एंट्री होती है विभाग के प्रशासनिक अधिकारी प्रवीण कुमार (राहुल बोस) की। 

ये कहानी पूर्णा के साथ प्रवीण कुमार के संघर्ष की भी है जो एक बार स्कूल से भाग निकली पूर्णा को वापस स्कूल में पहुचाता है। और वही पूर्णा में जज़्बा भरता है कि वो पर्बत चढ़े।

कुछ समय बाद स्कूल की छुट्टियां होने को हैं। पूर्णा के घर पहुंचने पर उसके घरवाले उसकी शादी कराना चाहते हैं। प्रिया के जरिए पूर्णा को हॉस्टल में ही ये बात पता चल जाती है, सो वो घर नहीं जाती है और मांउट क्लाइंबिंग के लिए स्कूल से जा रहे दल में शामिल हो जाती है; ताकि शादी से बच जाए। वो वहां जाकर अच्छा प्रदर्शन करती है। प्रिया की प्रेरणा हर पल उसके साथ है और इसी के चलते वो अपनी शादी से भी छुटकारा पा लेती है।

फिर एक दिन प्रिया की अकस्मात मौत से पूर्णा बेहद टूट जाती है। अब वो अपना हौंसला लगभग खो चुकी है। लेकिन अंत में बहिन प्रिया के सपने और अपने जज़्बे की उड़ान से वो ऐवरेस्ट फ़तह करके ही दम लेती है ।

बतौर अभिनेता, संवेदनात्मक संवाद अदायगी के साथ राहुल बोस ने तेलंगाना के ग्रामीण माहौल को बड़े ही विश्वसनीय ढंग से फ़िल्माया है। छोटे किरदारों के साथ प्रमुख किरदारों के हिंदी बोलने में भी स्थानीय अंदाज़ झलकता है। फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ाखासियत इसकी कास्टिंग है। राहुल बोस के अलावा अदिति इनामदार, एस मारिया, हीबा शाह, धृतिमान चैटर्जी आदि कलाकार भी  परिवेश के अनुकूल हैं। फ़िल्म का गीत-संगीत अच्छा है जो कि कथानक में रंग भरता है। इसके साथ ही, कोई बड़ा स्टार ना होने के बावजूद फ़िल्म कहीं भी अपनी भव्यता को नहीं खोती।

पूर्णा के कई सीन दिल को भीतर तक छू जाते हैं। मसलन, दोनों बहिनों का गिनती गिनते हुए प्रेरणास्पद बातें सीखना और समाज-कल्याण विभाग के छात्रावास में गरीब लड़कियों का अपने घर, ग़रीबी और हालात पर हंसते हुए बात करना।

अंतिम कुछ दृश्यों पर और मेहनत की जा सकती थी क्योंकि फ़िल्म अंत में जाकर थोड़ी ठहर सी जाती है। संवादों की कमी थोड़ी अखरती है। पर इन छुटपुट कमियों के बावजूद पूर्णा अपना असर छोड़ती है। एक छोटी-सी फ़िल्म विराट स्वरूप लेकर दर्शक के दिलो-दिमाग़ में बैठ हो जाती है। ये फ़िल्म हर लड़की को देखनी चाहिए और ख़ासकर सरकारी और गैर-सरकारी शिक्षण संस्थानों को ऐसी फ़िल्में जरूर दिखाई जानी चाहिए। अगर आप पारिवारिक दर्शक हैं तो आप अपने बच्चों के साथ पूर्णा  देखने जा सकते हैं। फ़िल्म आपको बिल्कुल निराश नहीं करेगी।   



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं.

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