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अविनाश दास
लेखक-निर्देशक


























Movie Review
अनारकली ऑफ़ आरा:विचार और मनोरंजन से भरपूर!


लेखक–निर्देशक: अविनाश दास गीतकार: रामकुमार सिंह, डॉ सागर, प्रशांत, रविन्दर रंधावा और अविनाश दास

अनारकली ऑफ़ आरा नाच पार्टी में नाचनेवाली एक लड़की की कहानी है. अनारकली नाम है उसका. अनारकली (स्वरा भास्कर) की माँ भी इसी पेशे में थी और एक नाच प्रोग्राम के दौरान ही हादसे में बंदूक का शिकार बन गई थी. अनारकली तब 10-12 साल की थी. उसकी आँखों के सामने ही माँ ने दम तोड़ा था.

अनार जब जवान होती है तो वह भी उसी पेशे से जुड़ती है. अपने नाच, गायकी और जवानी के दम पर लोकप्रिय भी हो जाती है. बीर कुबेर सिंह विश्वविद्यालय का वीसी उस पर लट्टु हो जाता है और उसे दूसरी बीवी बनाकर रखना चाहता है, लेकिन एक प्रोग्राम के दौरान दारू और अपने रसूख के नशे में (वह प्रदेश के मुख्यमंत्री का चहेता है) अनारकली की देह से सरेआम छेड़छाड़ करता है. अनारकली वीसी को वहीं थप्पड़ मार देती है. वीसी चूँकि उसको चाहता है, रखैल बनाकर रखना चाहता है, इसलिए अनारकली के गुस्से को बर्दाश्त करता है, लेकिन अनारकली उससे नफरत करती है, क्योंकि वीसी ने भरी महफिल में उसे बेइज्जत किया है इसलिए वह उसके आगे झुकने को तैयार नहीं होती और लड़ाई ठान लेती है, लेकिन इस लड़ाई में उसका साथी (पंकज त्रिपाठी) भी उसका साथ नहीं देता है. पुलिस और गुंडे की मदद से मदद से वीसी उसे झुकाने की हर संभव कोशिश करता है, लेकिन अनार हार नहीं मानती और एक लड़के के साथ, जो उसे चाहता भी है, भागकर दिल्ली आ जाती है. दिल्ली में म्यूजिक कम्पनी में मार्केटिंग का काम करनेवाले हीरामन का साथ मिलता है और उसे गाने का मौका मिलता है. अनार खुश होती है कि नई जिन्दगी शुरू हो गई, लेकिन उसके गाये सीडी के मार्फत वीसी के पिट्ठु दारोगा (विजय कुमार) को पता चल जाता है कि वह दिल्ली में रह रही है. पुलिस के सिपाही दिल्ली जाकर उसे उसी लड़के (जिसके साथ वह दिल्ली आयी थी) की किडनैपिंग के आरोप में गिरफ्तार कर आरा ले आती है. आरा में कोर्ट में पेशी के दौरान वीसी से अनार की मुलाकात होती है. वीसी फिर अपनी चाहत अनार के सामने रखता है. इस बार अनार मान जाती है. इसी बीच विश्वविद्यालय के रजत जयंती समारोह का समय आ जाता है, अनार उस समारोह में लोककलाकार के तौर पर विशेष परफॉर्मेंस देने के लिए बुलायी जाती है. लेकिन समारोह में अनार सरेआम वीसी की पोलपट्टी खोलकर रख देती है. वीसी ने जो बदतमीजी प्रोग्राम में अनार के साथ की थी, उसका वीडियो मंच पर लगे स्क्रीन पर दिखाती है. वीसी को सबके सामने बेपर्दा कर देती है. अपनी बेटी – बीवी और अन्य गणमान्य व्यक्तियों के साथ प्रोग्राम का मजा ले रहे वीसी की नंगई सबके सामने आ जाती है. इस तरह अनार वीसी से अपने अपमान का बदला लेती है.

यूँ तो यह एक स्त्री के बदले की कहानी है, लेकिन इस कहानी और कहानी की नायिका अनार के माध्यम से न सिर्फ वीसी को बल्कि समाज को भी नंगा किया है अविनाश ने. अनारकली का किरदार बहुत ही अच्छा बन पड़ा है. स्वरा भास्कर ने अभिनय भी अद्भुत किया है. बिहारी भाषा में कहें तो जान प्रान लगा दिया है. फिल्म दर्शकों को झकझोरती है. मनोरंजन की वस्तु बनी अनारकली न सिर्फ वीसी को उसकी औकात दिखाती है, बल्कि इस चरित्र के माध्यम से लेखक अविनाश दास ने वस्तु बनी औरत के मन को भी बड़ी ही संवेदना के साथ परदे पर उकेरा है. और दर्शकों से कहने की सफल कोशिश की है कि औरत चाहे नाचनेवाली ही क्यों न हो, उसकी भी इज्जत है, उसका भी स्वाभिमान है, उसका भी मन है, जो प्रेम के साथ साथ सम्मान चाहता है. वह नाचने का पेशा करती है, लेकिन कठपुतली नहीं है.

लेकिन अविनाश अनारकली को गढ़ने में इतने तल्लीन हो गये दिखते हैं कि  पंकज त्रिपाठी के कैरेक्टर के साथ न्याय करने से चुक गये हैं. अनारकली के साथ पंकज का रिलेशन पूरक का है; नाच में भी और देह के स्तर पर भी, लेकिन अनार जब मुसीबत में फँसती है, तो पंकज गौण हो जाते हैं, बाद में उस चरित्र को जैसे तैसे लपेट दिया गया है. उनके कैरेक्टर को आगे लेकर चलता है अनवर, लेकिन वह भी दिल्ली ले जाने के अलावा कुछ नहीं कर पाता, यहाँ तक कि उसी की किडनैपिंग के केस में अनार को अरेस्ट करके दिल्ली से आरा लाया जाता है. उसी तरह हीरामन भी पंकज के ही कैरेक्टर का एक्स्टेंशन लगता है. हालाँकि उसके चरित्र में तीसरी कसम के हीरामन का असर है, लेकिन अविनाश उसे भी रिश्तों के प्रति ईमानदार नहीं होने देते हैं. वीसी के चरित्र गढ़न में भी अनार जैसी सहजता नहीं है. कुछ हद तक अतिरेकी और फिल्मी लगता है. वीसी विश्वविद्यालय के शीर्ष पद पर है. पढ़े लिखे और लंपट बाहुबली में अंतर होता है, जबकि वह वीसी के बजाय बाहुबली नेता ज्यादा दिखता है. उसके अंगरंक्षक और फंटर भी वैसे ही हैं. दारोगा के रूप में विजय कुमार ने अच्छा काम किया है. कैरेक्टर भी सही विस्तार लिए हुए है.

पटकथा स्तर की इन कमियों के बावजूद फिल्म का नरेशन प्रभावी है. क्योंकि अनारकली लाजवाब है. संवाद के स्तर पर भी अविनाश कमाल करते हैं, अपने पात्रों को नये शब्द और नये मुहावरे दिए हैं, इसलिए डबलमीनिंग और अश्लील भावभूमि के बावजूद फिल्म के संवाद अश्लील नहीं लगते, कानों को अच्छे लगते हैं. अविनाश को गीतकारों का उसी तरह साथ मिला है. संगीतकार ने भी कमाल किया है और सिनेमैटोग्राफर, कोरियोग्राफर और एडिटर का भी जबदस्त सहयोग दिखता है. खासकर क्लाइमैक्स में तो अद्भुत संगम हुआ है. संजय मिश्रा भी खूब कर गुजरे हैं, बिना कोई संवाद बोले.

बहरहाल, फिल्म कमाल है और विचार के साथ साथ मनोरंजन से भरपूर है. निर्देशक के तौर पर अविनाश नये हैं ऎसा नहीं लगता.

 



   धनंजय कुमार

धनंजय कुमार हिंदी और भोजपुरी फ़िल्म-टीवी लेखक के तौर पर जाने जाते हैं। आप वर्तमान में स्क्रीनराइटर्स असोसिएशन के कोषाध्यक्ष का पदभार भी सम्भाले हुए हैं।.

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