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अमित जोशी
लेखक


हार्दिक मेहता
लेखक


























Movie Review
ट्रैप्ड:विपरीत परिस्थितियों में जीने का जज़्बा


परिस्थितिवश ऊंचाई पर जा फंसे एक आम आदमी की कहानी ट्रैप्ड को देखकर झटका लगता है। हमारी साधन संपन्नता ने हमें अलग-थलग जीवन शैली को अपनाने का नया मुहावरा दिया है। जीवन में परिस्थितियां विपरीत हो जाएं तो आपके सारे साधन धरे रह जाते हैं। परंतु ज़हन से जीने का जज़्बा ना मिटे तो आप परिस्थितियों से पार हो ही जाते हैं। इस शुक्रवार को रिलीज हुई निर्देशक विक्रमादित्य मोटवानी और लेखक अमित जोशी-हार्दिक पटेल की फिल्म ट्रैप्ड देखते हुए कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है।

कहानी के मुताबिक युवा शौर्य (राजकुमार राव) एक बड़ी कंपनी का युवा कर्मचारी है जो अपने साथ ही काम करने वाली लड़की नूरी (गीतांजलि थापा) से प्रेम करता है। छोटे-मोटे घटनाक्रम के बाद दोनों करीब आ जाते हैं लेकिन उन दोनों के एकाकार होने में सबसे बड़ी समस्या है कि शौर्य अपने तीन दोस्तों के साथ एक फ़्लैट में रहता है। जब नूरी शादी करने को राज़ी हो जाती है तो शौर्य उससे दो दिन में ही शादी करने की बात कहकर नूरी को बड़े घर का  सरप्राइज़ देना चाहता है। उसके पास डिपॉजिट के लिए पैसा नहीं  है।

ऐसे में वह एक ब्रोकर के आफिस के बाहर घात लगाए बैठे एक युवक की बातों में आ जाता है। वह युवक शौर्य को एक ऐसी निर्माणाधीन बिल्डिंग में ले जाता है, जो कई सालों से बन रही है। शौर्य रात को अपने दोस्तों से गाँव जाने का बहाना लेकर बिल्डिंग के ऊपरी माले पर बने फ़्लैट में जाकर सो जाता है। सुबह उठता है तो उसके फोन की बैटरी खत्म होने को है। वह अपनी प्रेमिका से मिलने की जल्दबाज़ी में निकलता है तो बाहर दरवाजे में चाबी लगी छोड़ फिर से फोन लेने आता है। और हवा से कमरे का दरवाजा बंद हो जाता है। इधर थोड़ी देर बाद फ़्लैट की लाइट भी गुल हो जाती है। फिर शुरू होता हैं भंयकर परिस्थितियों का सिलसिला और एक अकेले इंसान का उनसे निपटने का मुश्किल दौर ।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि ना केवल राजकुमार राव फिल्म दर फिल्म खुद को निखारते जा रहे हैं। वो जुबान से अटकने-भटकने वाली शैली में किए गए अभिनय से दर्शक के दिलोदिमाग़ पर अलहदा प्रभाव भी छोड़ते हैं। पूरी फिल्म उनके कंधों पर टिकी है और वे इस ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाते हैं। गीतांजलि थापा कुछ ही सींस में अपनी सौम्य छवि के साथ विश्वसनीय संवाद-अदायगी से लबरेज़ अभिनय करती नजर आती हैं।

हालाँकि अंत तक आते आते शौर्य के किरदार के फ़्लैट में फंसने के बीच आई परिस्थितियों में फिल्म का क्राफ़्ट थोड़ा कमजोर दिखता है। सबसे पहले तो इस तरह की कहानी में दर्शकों के मानसपटल पर समयाविधि का चलना ज़रूरी होता है ताकि दर्शक उससे जुड़ सकें। फिल्म कहीं भी इस बात को बयां नहीं करती कि नायक कितने दिन तक फ़्लैट से बाहर निकलने के लिए संघर्ष करता रहा। साथ ही अंत भी खटकता है क्योंकि भूखा-कमज़ोर और बेहाल आदमी वैसा साहस जुटा पाने में असमर्थ होता है जैसा कि दिखाया गया है। अगर नायक को अंत में साहसी ही होना था तो क्या ज़रूरत थी कि वह पहले भाग में एक चूहे से खौफ़ खाता? नायिका, नायक के बंद कमरे से आज़ाद होकर लौटने पर सजी हुई मांग के साथ उससे मिलने अस्पताल पहुंचती है। निर्देशक इस दुखांत के साथ फिर से नायक को पहले वाले ऑफिस से कमतर एक ऑफिस में नौकरी ज्वाइन करते हुए दिखाते हैं; जो कहीं ना कहीं भारतीय सिनेमा के पारम्परिक दर्शकों के समक्ष फिल्म को कमज़ोर करेगा। 

लेकिन यह पक्का है कि यह फिल्म मुंबई के अलावा भी महानगरीय जीवन को जी रहे युवक-युवतियों को खासा प्रभावित करेगी। फिल्म का एक दृश्य जहां पर नायक सोचता है कि मैं मरूंगा नहीं क्योंकि मुझे अभी मुंबई के लोकल ट्रेन के धक्के खाने हैं, बस में कंडक्टर से झगड़ना है। ये सीन दर दर्शक के मानस को मांजता कि साधारतया हम जीवन में बड़ी बड़ी खुशियां चाहतें है लेकिन सांसें साँसत में आ जाएं तो रोजमर्रा का संघर्ष भी हमारी चाहत बनकर साहस प्रदान करता है।

अपनी पहली फिल्म उड़ान से ही बतौर निर्देशक विक्रमादित्य ने खुद को सिद्ध किया है लेकिन बाद में लुटेरा के बॉक्स आफिस पर कमज़ोर जाने के बाद काफी समय से फिल्म भावेश जोशी में अटके रह हैं। इसलिए निश्चित ही कम समय में बड़े प्रचार से दूर, छोटी सी कहानी के साथ विक्रमादित्य की वापसी उनके सिनेमाई विश्वास को प्रकट करती है। मुंबई में रहने वाले हर दर्शक को ये फिल्म जरूर जंचेगी। आज भी सुबह के शो में दर्शकों का अच्छा प्रतिसाद मिला जो आमतौर पर फैंटम के अनुराग कश्यप की फिल्मों को नहीं मिलता है। अगर आप सिनेमा को धैर्य और ध्यान से देखने वाले दर्शक हैं तो इस वीकेंड में ये फिल्म बेहिचक देख सकते हैं।  



   धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं।.

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