1
 






शशांक खेतान
लेखक-निर्देशक


























Movie Review
बद्रीनाथ की दुल्हनिया:प्रेम भंवर में नारी सशक्तिकरण का संदेश


प्रेम की भावना हर इंसान में होती है पर प्रेम को परवान चढने में वक्त लगता हैं। निस्संदेह प्रेम वही है जो परीक्षाओं के सागर में हिलोरे खाता हुआ पार लगे। अगर शादी-ब्याह और युवा प्रेमिल जोड़े के बीच घुमड़ते प्रेम के लिहाज़ से देखा जाए तो लेखक-निर्देशक शशांक खेतान की फिल्म बद्रीनाथ की दुल्हनियां यही कहती हैं। लेकिन इससे इतर, फिल्म चाहे-अनचाहे कई समाजिक संदेश देती प्रकट होती है। जहां बीच में कुछ दृश्यों में दहेज-प्रथा के खिलाफ मुखर होती दिखती हैं वहीं अंत में नारी सशक्तिकरण के संदेश के साथ फिल्म का अंत होता है।

फिल्म की कहानी के मुताबिक झांसी का रहने वाला बद्रीनाथ बंसल (वरूण धवन) एक खिलंदड़ इंसान है। कम पढ़ा-लिखा बद्रीनाथ अपने दोस्त के साथ पिता अंबरनाथ बंसल के साहूकारी के रुपयों की उगाही का काम करता है। अपने दोस्त की शादी में वह राजस्थान के कोटा शहर में जाता हैं जहां पर उसकी मुलाकाता वैदेही त्रिवेदी (आलिया भट्ट्) से होती है। बद्रीनाथ को खूबसूरत और हाज़िरजवाब वैदेही एक ही बार में जंच जाती है। 

मैट्रिक पास बद्री अपनी सोच के लिहाज से प्रेम की परिणिति शादी मानता है। इसलिए वह सीधा ही वैदेही के घर में रिश्ता भिजवा देता है। चूंकि बद्री एक संभ्रात धनी परिवार से है इसलिए वैदेही के माता-पिता को इस रिश्ते को स्वीकारने में कोई गुरेज़ नहींं है। वैदेही को बद्री का उत्साही अंदाज तो पसंद है लेकिन वैदेही के अपने सपने हैं । वह चाहती है कि वह खुद कुछ करे और अपने पैरों पर खड़ी हो और अपने बाप की बेटी नहीं, बेटा बनकर दिखाए।

इधर वो अपने एक पुराने दोस्ते सागर के धोखे का शिकार भी हो चुकी है जो सैलून खोलने के बहाने उसके पिता के छह लाख रूपए लेकर चंपत हो गया है। उधर वैदेही की बड़ी बहिन भी है जिसकी शादी उसके पिता जल्द से जल्द करना चाहते हैं। इसलिए भावनात्मक दबाब में वैदेही बद्री से शादी करने के लिए राजी हो जाती है।

बद्री की कोशिशों से उसकी बड़ी बहिना का रिश्ता भी तय हो जाता है। एक ही मंडप में दो जोड़ों के फेरे होने वाले हैं कि पता लगता है कि बद्रीनाथ की होनेे वाली दुल्हनियां मंडप से गायब हो गयी है। बद्रीनाथ का दिल टूट जाता है उसके पिता अंबरनाथ उससे खासे नाराज़ होते हैं, और बद्रीनाथ को वैदेही का पता लगाकर घर वापस लाने के लिए रवाना करते हैं। मिली जानकारी के मुताबिक बद्री मुंबई पहुँचता है जहां उसे पता चलता है कि वैदेही एअर होस्टेस की ट्रेनिगं के लिए सिंगापुर रवाना हो गई है। इस पर बद्री अपने सखा के साथ सिंगापुर पहुंच जाता है। इस तरह रिश्तों के टूटने जुड़ने में पैदा हुए जज़्बात के चलते वैदेही को भी अहसास होता हैं कि बद्री जैसा लड़का उसे दूसरा नहींं मिल सकता है और फिल्म का सुखांत होता हैं।

शशांक खेतान ने चुटीले और किरदारों के स्वभाव के अनुकूल संवाद लिखे हैं जो युवाओं को पसंद आएंगे। लेकिन फिल्म की पटकथा में बहुत झोल है। फिल्म का फर्स्ट हाफ तो अच्छा है पर इंटरवल के बाद फिल्म से कहानी का लोप हो जाता हैं। इंटरवल के बाद के दृश्यांकन में लेखक-निर्देशक शशांक खेतान बुरी तरह चूकते हैं। सिंगापुर में पहुंचे वैदेही और बद्रीनाथ के साथ कुछ नए किरदार जुड़ते हैं और फिल्म का काफी हिस्सा लड़ने झगड़ने और घूमने फिरने मौज शौक जैसे दृश्यों में ही खर्च हो जाता है।

ये सब वरुण धवन और आलिया भट्ट  के फैंस को तो अच्छा लगेगा लेकिन वैचारिक दर्शकों को फिल्म देखते समय ये निश्चित ही अखरेगा। शशांक खेतान जब अंत में महिला सशक्तिकरण को प्रधानता देना चाहते थे तो ऐसे बहुत से दृश्य थे जिनसे अंत को बेहतरीन संबल मिलता लेकिन उन्होंने इंटरवल के बाद  उन्होंने कई दृश्य फिज़ूल रखे हैं। इसके साथ ही  बद्रीनाथ के पिता लालची पिता अंबरनाथ का बद्री के वैदेही से विवाह के लिए यूँ तैयार हो जाना और फिर भागी हुई दुल्हन को फिर से लाने का आह्वान कड़वी दवाई के मानिंद दर्शकों को पीना पड़ता है। फिल्म में रिक्रिएट किए गए 90 के दशक के गीत 'तम्मा तम्मा लोगे' का आगमन तब होता है जब तक फिल्म के घटनाक्रम में उलझे दर्शक ये भूल चुके होते हैं कि ये रिक्रेएशन भी फिल्म के लिए किया गया है। 

बहरहाल, पटकथा दृश्यांकन के झोल को नज़र अंदाज करें तो फिल्म आम युवा दर्शकों को पसंद आएगी। फिल्म में आलिया भट्ट और वरुण के साथ वरुण के सखा बने साहिल वैद्य ने भी खूब अभिनय किया है। निर्देशक ने उन्हें खूब फुटेज दिया है। युवाओं के साथ पारिवारिक दर्शकों को भी फ़िल्म पसंद आएगी क्योंकि  इसमें सामाजिक तानेबाने में नारी की क्या भूमिका होनी चाहिए इसे लेकर निर्देशक ने काफी कुछ कहने का प्रयास किया है। सिंगापुर के साथ कोटा और झांसी के मनोहारी लोकेशंस फिल्म में दिखते हैं। इसलिए कुल मिलाकर इस वीकेंड पर बद्रीनाथ की दुल्हनिया को देखना मनोरंजन के लिहाज से घाटे का सौदा नहीं है।      



   धर्मेंद्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं।.

Click here to Top