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Stanley Tong
Writer-Director


























Movie Review
कुंग फ़ू योगा:अब तेरा क्या होगा जैकी!


प्रोफैस़र जैक (जैकी चैन) चीन के ज़ियान के टैराकोटा वारियर म्यूज़ियम में पुरातत्व विशेषज्ञ है जिसने रंगों को पुनःजीवित करने की तकनीक खोजी है और अपनी उम्र महत्वपूर्ण पुरात्तव अवशेषों को ढूंढ कर उन्हें पुनः स्थापित करने और उनके योग्य वारिसों को सौंपने में लगा दी है। मगध की राजकुमारी अस्मिता (दिशा पटानी) सदियों से खोए हुए अपने पुश्तैनी ख़ज़ाने को खोजने के लिए चालाकी से जैक को हिंदुस्तान बुलाती है। लेकिन ख़जाने को खोजना और हासिल करना इतना आसान नहीं है क्योंकि मगध साम्राज्य के दुश्मन का वंशज रंदाल (सोनू सूद) आज भी अपने पूर्वजों की इस ख़ज़ाने पर कब्ज़ा जमाने की इच्छा को पूरा करना चाहता है। यहीं से ख़ज़ाने को हासिल करने की चूहा-दौड़ शुरू होती है और प्रमुख किरदारों को चीन, तिब्बत, दुबई और हिंदुस्तान की विभिन्न लोकेशन्स पर दौड़ाती रहती है, जो ना तो कहानी का कोई सिरा पकड़ती है और ना ही इसे किसी अंजाम तक पहुंचाती है, बस करीब दो घंटे दौड़ा-दौड़ा के थका देती है। बीच-बीच में कहीं मनारेंजन करने की कोशिश भी करती है, सफ़ल कितनी होती है आईए देखते हैं।
 
कुंगफू योगा की इस दौड़ में ढेर सा कुंग फू है, योगा नाम मात्र ही है और कहानी पूरी तरह से नदारद है। स्टेनले टोंग ने बड़ी ही सीधी और मसालेदार पटकथा बुनने की कोशिश की है लेकिन घिसी-पिटी रूढ़ीवादी धारणाओं, हिंदुस्तान और चीन को गड्ड-मड्ड करने की कोशिश में वह अतिरेकता और दिशाहीनता का शिकार हो जाते हैं। वह दौड़ने की इतनी जल्दी में हैं कि किरदारों को पूरी तरह से गढ़ने का वक्त भी उनके पास नहीं है। जैकी चैन के अलावा वह किसी किरदार को पूरी तरह से स्थापित नहीं होने देते, शायद जैकी चैन की प्राॅडक्शन होने की वजह से यह उनकी मजबूरी भी रही होगी। इसी चक्र में फ़िल्म सिर्फ़ कुंग फू हो कर रह जाती है, योगा का ज़िक्र एक-आध बार बस यूं ही गुज़रते हुए आता है। हिंदुस्तान को पर्दे पर उतारने के मामले में उन्होंने बेहदी रूढ़ीवादी नज़रिए का सहारा लिया है। एक प्रमुख दृश्य के लिए एक बाज़ार का सैट लगाया गया है जहां पर सपेरा रस्सी के सांप का करतब दिखा रहा है, एक बाज़ीगर मुंह से आग निकाल रहा है, एक बाबा हवा में समाधि लगाए बैठे हैं और कुछ लोग रंगों से रंगोली बना रहे हैं। वहां पर होते एक्शन में सब अनचाहे ही शामिल हो जाते हैं।
 
पटकथा में भी कई आमूल-चूल खाईयां है, जैसे अस्मिता को अपना ख़ज़ाना ढूंढने के लिए पूरी दुनिया में से प्रोफ़ैसर जैक ही क्यों मिले? मान लो कि केवल उनकी काबलियत पर ही उसे भरोसा था तो वह उन्हें सीधे हिंदुस्तान लाने की बजाए टेढ़ा रास्ता क्यों अपनाती है? क्या प्रोफ़ैसर ने उसकी मदद करने के लिए कभी इंकार किया था? सोनू सूद पूरी फ़िल्म में थप्पड़ खाए सियार सी सूरत क्यों बनाए रखते हैं, जबकि वह धुआंधार विलेन बने हुए हैं? जब सब कुछ जैक ने ही करना था तो इतने सारे किरदारों की फ़ौज की आखि़र ज़रूरत क्या थी, जो केवल कुछ दृश्यों को खिंचने भर के सिवा और कोई ख़ास भूमिका नहीं निभाते।
 
कुंग फू योगा एक एक्शन काॅमेडी है। एक्शन और काॅमेडी दोनों के ही मामले में फ़िल्म काफ़ी ढीली है। यूं तो जैकी चैन ने अपनी उम्र के हिसाब से किरदार भी उसी कुंग फू खिलाड़ी का निभाया है जो कुंग फू छोड़ कर शोध में जुट गया है। फ़िल्म के पहले हाफ़ में जैक को अपने छूटे हुए अभ्यास को दोबारा शुरू करने की कोशिश करते हुए दिखाया गया है, लेकिन फ़िर भी अंत तक वह कुंग फू का वैसा जादू चलाते हुए नज़र नहीं आते, जैसा कि वह नब्बे के दशक में आते रहे हैं। इस तरह एक्शन के मामले में वह दम नहीं दिखाती जैसी की जैकी चैन की फ़िल्मों से उम्मीद की जाती है। कामेडी के मामले में फ़िल्म का हाल एक्शन से भी बुरा है। जैक जब एसयूवी चुरा कर भागता है और उसमें उसे पहले से बैठा हुआ एक बब्बर शेर मिलता है तो उससे पैदा हुई काॅमेडी आपको लोटपोट कर देती है, लेकिन उसे जिस तरह से खींचा गया है, वह कुछ देर बाद उबाने लगती है। एक्शन के मामले में लक्क्ड़बग्गों के बाड़े से निकल कर भागने वाला दृश्य एक बार तो आपको सीटे के किनारे पर खींच लाता है।
 
फ़िल्म कुंग फू और योगा के संगम से बनने वाली अभूतपूर्व ताकत पर केंद्रित होने का भ्रम देती है लेकिन योगा को काफ़ी हद तक नज़र अंदाज़ किया गया है, जिससे टोंग अपने शीर्षक से ही न्याय करते हुए नज़र नहीं आते। फ़िल्म का अंत इतना बेढब है कि आप यह सोचने के लिए भी दिमाग खपाने की कोशिश नहीं करते कि टोंग ने यह किया क्या है। आखि़र सोनू सूद के मन में ऐसा क्या चमत्कार होता है कि वह सोने का पूरा का पूरा महल छोड़ कर जैक के साथ बाॅलीवुड ठुमका लगाने लगता है। यह भी समझ में नहीं आया कि हिंदी संस्करण में आखि़र में बोल चीनी गीत के क्यों शामिल किए गए, जबकि प्रमोशन में हिंदी गीत का प्रयोग किया गया है। 
 
फ़िल्म में जो सबसे ज़्यादा बात अख़रती है वह है डबिंग। पहले तो हिंदी अनुवाद इतना बेढंगा किया गया है कि उसके वाक्य ही आधे-अधूरे हैं, कंगाली में आटा गीला करते हुए, संवादों का सिंक इतना अजीब किया गया है कि वह खीझ पैदा करते हैं। कुल मिलाकर हिंदी-चीनी आचार गुड़-गोबर हो गया है। कुंग फू योगा के ज़रिए हिंदी-चीनी बाज़ार को भुनाने के चक्कर में डाला गया अचार कहानी कहने के सदाचार से एकदम दूर है। इस सदाचार के आभाव में यह अचार दर्शकों के साथ अनाचार करता है। सो कुंग फू योगा को केवल एक स्टार से संतोष करना होगा।


   दीप जगदीप सिंह

Deep is a freelance journalist, screenwriter and a lyricist.. http://www.deepjagdeep.com/

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