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Movie Review
मेहँदी लगाके रखना:अनगढ़ लेखन का शिकार


कथा: रजनीश मिश्रा पटकथा: रजनीश मिश्रा, अनंजय रघुराज एवं लालजी यादव संवाद: रजनीश मिश्रा

गीत: प्यारेलाल यादव. रजनीश मिश्रा और श्याम देहाती निर्देशक: रजनीश मिश्रा निर्माता: अनंजय रघुराज

 

मेहँदी लगा के रखना भोजपुरी की नई फिल्म है. फिल्म की कहानी रजनीश मिश्रा ने लिखी है. रजनीश मिश्रा भोजपुरी फिल्मों के मौजूदा दौर के चर्चित संगीतकार हैं. इस फिल्म में वह संगीत के साथ - साथ लेखन और निर्देशन की जिम्मेदारी भी संभाली है. फिल्म पर संगीतकार का प्रभाव ज्यादा है. नौ या दस गीत हैं.

हीरो राजा (खेसारी लाल यादव) की माँ की मृत्यु हो चुकी है, पिता (अवधेश मिश्रा)के साथ रहता है वह. पिता चाहते हैं कि अपने पैर पर खड़ा हो जाय,( गोविन्दा की फिल्म हीरो नं. वन का असर) लेकिन राजा की मुलाकात हीरोइन काजल से होती है और पहली ही मुलाकात में वह उसका दीवाना हो जाता है.

राजा काजल के प्यार के सपने देखता है, जबकि काजल इस बात से अंजान स्कूल में म्यूजिक टीचर का जॉब करती संस्कारी लड़की है. (हालाँकि एक गीत के चक्कर में पटकथा लेखक उसके संस्कार का सत्यानाश कर देता है जब वह बिना किसी लॉजिक के भूलवश दारू पीती है और हीरो के साथ स्वीमिंग पुल पर गीत गाती है.) बहरहाल, राजा काजल की खातिर उस स्कूल में चपरासी की नौकरी पर लग जाता है, लेकिन काजल से प्यार जताने के चक्कर में उसे काजल का थप्पड़ मिलता है.

राजा का दिल टूट जाता है. वह रोता हुआ अपने पिता के पास आता है. पिता समझाते हैं और अपने दोस्त की बेटी की शादी में चलने के लिए कहते हैं. राजा वहाँ जाता है, तो पता चलता उसके पिता के दोस्त की बेटी कोई और नहीं काजल ही है.

राजा काजल के घरवालों-रिश्तेदारों के साथ उसकी शादी की तैयारी में लगता है. लेकिन इस दौरान काजल को अपनी भूल का अहसास होता है और राजा से अपना प्यार जताता है, लेकिन राजा परिवार की इज्जत के लिए उसे उसी लड़के के साथ शादी करने को कहता है. दोनों के मिलने का यह सीन विलेन के मार्फत काजल के पिता को पता चल जाता है. काजल के पिता भड़क जाते हैं कि दोस्त का बेटा ही उसकी बेटी की इज्जत से खेल रहा है. काजल के पिता राजा को तो थप्पड़ मारते ही हैं, अपने दोस्त यानी राजा के पिता पर भी थप्पड़ चला देते हैं. राजा के पिता को इस बात का गहरा सदमा लगता है.

राजा पिता के साथ अपने गाँव आ जाता है, लेकिन दूसरे दिन जब वह उठता है, तो पता चलता है कि उसके पिता मर चुके हैं.

दूसरी तरफ काजल की शादी हो रही होती है, लेकिन लड़के के पिता (दीपक सिन्हा) कार लिए बिना फेरे होने देने को तैयार नहीं हैं. तभी राजा आता है गाड़ी लेकर और अपने पिता का वादा पूरा करता है. दरअसल कार देने का वादा राजा के पिता ने अपने दोस्त से चुपके लड़के के पिता से किया था. वहीं सबको पता चलता है कि राजा के पिता की मृत्यु हो गई. और लड़की के पिता के सामने राजा का यह सच भी पता चलता है कि राजा ने किस तरह काजल को उसी लड़के से शादी करने को मनाया था.

इस तरह सारी सच्चाई सामने आती है तमाम भावनात्मक मसालों के बीच राजा से काजल की शादी होती है.

फिल्म की कहानी में ड्रामा तो था, लेकिन लेखक ड्रामा को समझने और विस्तार देने में चुक गया. कथा और पटकथा दोनों की गढ़न बचकानी है. भोजपुरी फिल्मों की एक बड़ी दिक्कत यह है कि कहानी को सही विस्तार देने और इमोशन को सीन दर सीन आगे ले जाने के बजाय उसे जैसे तैसे क्लाइमैक्स तक खींच दिया जाता है. भोजपुरी फिल्मकारों को अच्छी और यादगार फिल्म बनाने के लिए यह समझना होगा कि लेखन किसी तरह 65 सीन लिखकर कहानी को क्लाइमैक्स तक पहुँचा देना भर नहीं है. पहले सीन से लेकर आखिरी सीन तक का एक सुर में होना जरूरी है. जैसे संगीत में सरगम होता है, सुर और ताल होते हैं, वैसे ही फिल्म लेखन भी कल्पनाशीलता और तकनीक का सुन्दर समन्वय है. क्या सरगम और सुर ताल का ज्ञान नहीं रखनेवाला अच्छा संगीत बना सकता है ?!   

स्क्रिप्ट लिखते वक्त पहले यह तय कर लेना होता है कि कहानी किसकी है. और कहानी के मुख्य नायक/नायिका को हासिल क्या करना है. और उसे लक्ष्य तक पहुँचने में किन बाधाओं से गुजरना है और कौन कौन है जो लक्ष्य तक पहुँचने में उसकी मदद करेगा. इसके लिए कैरेक्टर्स को समझना और सही तरह से उसका कैरेक्टराइजेशन कर लेना बहुत जरूरी होता है. लेकिन अफसोस कि भोजपुरी फिल्मों को लिखते वक्त शायद ही इन बेसिक्स पर काम किया जाता है.

इस फिल्म में भी यह कमी गहरी टीस के साथ उपस्थित है. सही मायने में यह पिता पुत्र के रिलेशनशिप की कहानी है. जिसमें हीरोइन रोमांस का तड़का देने और उन दोनों की रिलेशनशिप को सम्पूर्णता देने के लिए आती है. मतलब हीरोइन का महत्वपूर्ण रोल है, लेकिन यहाँ हीरोइन कठपुतली की तरह है. लेखक को जब जैसी परिस्थिति चाहिए, वह उसी अनुरूप ढल जाती है. हीरोइन संगीत टीचर है, लेकिन कहीं संगीत की साधना करती नहीं दिखती. घर में कभी कोई हारमोनियम तक नहीं दिखा. स्कूल में भी संगीत का कोई माहौल नहीं दिखा. उसी तरह हीरो भी बड़ा बढिया गाता है, लेकिन कभी रियाज अभ्यास करता या कोई संगत करता नहीं दिखा. हीरो का पिता क्या करता है, पता नहीं है. एक सीन में ट्रैक्टर चलाता दिखता जरूर है. अफसोसजनक यह भी है कि फिल्म का शायद ही कोई सीन नया हो. ज्यादातर दृश्य किसी न किसी फिल्म से प्रभावित और उठाये हुए हैं. जबकि अगर पटकथाकार स्क्रिप्ट लेखन के बेसिक को भी समझता तो शायद यही कहानी बेहद प्रभावी बन जाती. जैसा कि आखिर के कुछ दृश्यों में होता भी है. जहाँ हीरो के पिता की मौत हो जाती है, वहाँ से कहानी उठ जाती है. चिता की राख के पास हीरो के सोए होने का दृश्य मर्म को गहरे छूता है और वह पिता पुत्र के रिश्ते की गहराई को भी बता देता है. लेकिन दुखद है कि पिता पुत्र के बीच की रिलेशनशिप को सही तरह से गढ़ा नहीं जा सका. उसके बाद हीरो हीरोइन की रिलेशनशिप महत्वपूर्ण थी, लेकिन उसे अनावश्यक रूप से हीरो के एकतरफा सपनों की भेंट चढ़ा दिया गया. अच्छे गाने भी अपना प्रभाव नहीं जमा पाते हैं. गाने भी जरूरत से ज्यादा हैं. 

बहरहाल फिल्म में मसाले जरूरत से ज्यादा हो गये. हाँ एक अच्छी बात यह है कि फिल्म के संवाद डबल मीनिंग वाले नहीं है. फिल्म में वल्गर आइटम साँग भी नहीं है, लेकिन उसकी कमी कॉमेडियन का गीत, कद्दु कटेगा, तो सबमें बँटेगा, पूरी कर देता है.



   धनंजय कुमार

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