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नितेश तिवारी
लेखक - निर्देशक


निखिल मेहरोत्रा
लेखक


श्रेयस जैन
लेखक


























Movie Review
दंगल :दंगल में मंगल


            आकांक्षाओं के अखाड़े में भावना का दंगल

 अपनी संतति के बारे में हर मध्यमवर्गीय इंसान कुछ ज्यादा ही सोचता है, कि उसके बच्चे कैसे होंगे और वे क्या बनेंगे? लेकिन जिसे अपने खून और कर्म पर विश्वास हो उसे ये जरूर पता होता है कि उसके बच्चे उसकी ही अधूरी आकांक्षाओं को पूरा करेंगे। लेखक-निर्देशक नितेश तिवारी और निर्माता अभिनेता आमिर खान की दंगल को देखते हुए मेरे जेहन में ऐसे कई सवाल गूंज रहे थे। सिनेमा भी समाज का दर्पण हैं जो समाज में घटित हो रहा है वो आमिर खान के सिनेमा में हमेशा रहता है।  निंश्चित ही आमिर खान की फिल्म दंगल समाज को मनोरंजन के साथ एक मैसेज देने वाली फिल्म है। 

महावीर फोगाट की जीवनी पर आधारित आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म दंगल की कहानी के बारे में वैसे तो अधिकतर सिनेप्रेमियों को पता है। लेकिन अपने लहजे में कहूं तो ये एक पिता की जिद है, जिसे वो अपने खून के जरिए पूरा करना चाहता है।  कहानी के मुताबिक,  पहलवान महावीर फोगाट (आमिर खान) एक वरिष्ठ रेसलर है, उसके मन में ये पछतावा है कि वो देश के लिए गोल्ड मैडल नहीं ला सका।  वो गोल्डमैडल पाने की अपनी लालसा के साथ पहलवानी से नाता तोड़ता है, सिर्फ इस वायदे के साथ कि अगर वह देश के लिए गोल्ड मैडल ना सका तो क्या, उसका बेटा ये करके दिखाएगा।

लेकिन महावीर फोगाट के घर में लड़कियों की किलकारी ही गूजंती हैं।  वो जानता है कि दंगल तो लड़कों का काम है लेकिन एक घटना के कारण वो अपनी दोनों लड़कियों को पहलवानी के लिए जोर आजमाइश करवाता है। पहले तो बेटिया इससे पीछे हटती हैं, लेकिन बाद में पिता की धुन से उनके हौंसले बुलंद होते हैं और देसी अखाड़ों में लड़कों को पछाड़ती हुई उसकी बड़ी बेटी गीता नेशनल के लिए सलेक्ट कर ली जाती हैं। लेकिन यहां से परिस्थितियों में मोड़ आता हैं और कई घटनाक्रमों के बाद कहानी अंत की ओर रुख करती है।

आमिर खान किसी भी फिल्म में उसके सब्जेक्ट को सुन, किरदार में रमने की कोशिश करते हैं और इस फिल्म के लिए जिस तरह से उन्होंने खुद को बहुत तैयार किया है। उनका पैशन वाकई काबिले तारीफ है। वे महावीर फोगाट के किरदार में जमे हैं। खासकर जब वे अपनी बेटी से ही कुश्ती लड़ते हैं।

युवा निर्देशक नितेश तिवारी का नाम चिल्लर पार्टी, भूतनाथ रिर्टनंस जैसी फिल्मों से बतौर निर्देशक जुड़ा रहा है। उनकी फिल्मों की जान उनके कंटेंट में होती है। इस लिहाज से दंगल एक बेहतरीन फिल्म हैं। फिल्म की दृष्य संरचना और संवाद कहानी के मुताबिक है।

एक दृष्य जहां महावीर फोगाट बने आमिर खान अपनी किशोरी बेटी को लड़कों से लड़ाने के लिए अखाड़े में लेकर आया है पर दंगल आयोजक उसे मना कर देते हैं कि लड़के की कुश्ती किसी लड़की से नहीं हो सकती हैं। बाद में लड़के से लड़की की कुश्ती को लोग नुमाइश के तौर पर देखते हैं। गीता फोगाट पर मनचलों की फब्तियां दृष्य को भावना प्रदान करती हैं। और दर्शक एक बाप की पीढा से रूबरू होते हैं। यहां पर भले ही एक लड़के से कुश्ती लड़ते समय गीता हारती है, फिर भी वो सबका दिल जीत ले जाती है। ये फिल्म का अच्छा सीन बन पड़ा है। इसके अलावा अंतिम दो कुश्तियों में भी कसाकसी का माहौल बनाने में बतौर निर्देशक नितेश तिवारी सफल रहे हैं।

लेकिन निर्देशक नितेश तिवारी महावीर फोगाट के किरदार को बुढापे में शराब पिलाकर दिखलाते हुए जरूर कुछ कमजोर करते हैं। महावीर फोगाट का अपनी बेटियों के प्रति ज्यादा कठोर होना फिल्म देखते समय नवयोवनाओं को परेशान कर सकता है। जो मां बाप अपने बच्चों की परवरिश चांद सितारों की तरह करते हैं या जिनका मानना है कि सिर्फ प्यार से ही दुनियां जीती जा सकती है। उनहें फिल्म के कुछ सीन अटपटे लगें। लेकिन ग्रामीण संस्कृति को समझने वाले अभिभावकों को फिल्म दिल के बेहद करीब लगेगी।

महावीर फोगाट के किरादर की सनक आपके मन में उसकी नकारात्मक छवि बना सकती है लेकिन ये भी सच है कि खुद के प्रति क्रूर हुए बिना कोई सच्ची सफलता अर्जित नहीं होती हैं। ये भावनाओं से भरा भारत देश हैं यहां खरगोश की थोड़ी सी झपकी उसे कछुए से हरा देती है। महावीर फोगाट के जरिए निर्देशक नितेश तिवारी बताते हैं कि हम अगर सपने देखतें हैं तो उन्हें जमाने की परवाह किए बिना पूरा करने के लिए जुट जाना चाहिए । तब असंभव भी संभव हो सकता है।

फिल्म का गीत संगीत फिल्म के मिजाज के अनुसार हैं। अमिताभ भट्टचार्य ने फिल्म के लिए शानदार ट्रेक दिए हैं।  बतौर दर्शक और समीक्षक मैं आपसे कहना चाहूंगा कि बेहिचक दंगल देखें । अकेले नहीं बल्कि अपने परिवार के साथ ।

 



   धर्मेन्द्र उपाध्य

पिछले आठ साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

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