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मोह माया मनी
मायाजाल में उलझी पटकथा


मुनीश भारद्वाज
लेखक-निर्देशक


मानसी जैन
सह लेखक


























Movie Review
मोह माया मनी :मायाजाल में उलझी पटकथा


(आवश्यक सूचना:  कहानी और पटकथा को केंद्र में रख कर इस फिल्म की समीक्षा लिखी गई है। इसी वजह से फिल्म के कई दृश्यों और मोड़ों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है ताकि पटकथा के विभिन्न पहलुओं का गहराई से विश्लेषण किया जा सके। पाठकों से निवेदन है कि समीक्षा पढ़ते समय इस बात का ध्यान रखें कि यह फिल्म से कहीं ज्यादा पटकथा और कहानी की समीक्षा है।)

 

निर्देशक : मुनीश भारद्वाज

लेखक : मुनीश भारद्वाज, मानसी निर्मल जैन

कलाकार : नेहा धूपिया, रणवीर शौरी, विदुषी मेहरा, देवेंद्र चौहान

इसे महज संयोग कहा जाए या निर्माता की चालाकी... क्योंकि फिल्म मोह माया मनी ऐसे समय में रिलीज हुई है जब हर जगह सिर्फ और सिर्फ मनी की बात हो रही है। सरकार ब्लैक मनी खत्म करने की बात कर रही है...कुछ लोग ब्लैक मनी कनवर्ट करने की बात कर रहे हैं पर हमारे फिल्म का नायक अमन (रणवीर शौरी) ब्लैक मनी बनाने की बात कर रहा है। फिल्म की कहानी दिल्ली के मध्यमवर्गीय युवाओं की है। दिव्या (नेहा धूपिया) और अमन एक नौकरीपेशा मध्यमवर्गीय जिंदगी गुजार रहे हैं। दोनों जिंदगी की जद्दोजहद और रोजगार की रफ्तार में व्यस्त हैं पर उनका सपना कुछ और ही है। दोनों को यह लाइफ पसंद नहीं है.... रजौरी गार्डेन के छोटे-से फ्लैट में रहते हुए भी वे करोल बाग में कोठी का सपना देखते हैं। पर दोनों का नजरिया अलग-अलग है। निर्देशक मुनीश भारद्वाज ने दोनों के नजरिए से फिल्म की कहानी कही है। फिल्म की शुरुआत अमन के नजरिए से होती है फिर दिव्या के नजरिए से उसी घटना को दिखाया जाता है। निर्देशक का यह प्रयोग बहुत प्रभावित करता है।  

अमन एक रियल एस्टेट एजेंट है और दिव्या मीडिया प्रोफेशनल। ये दोनों ऊपर-ऊपर से देखने पर खुशहाल नजर आते हैं। पर अमन अपनी स्थितियों से खुश नहीं है उसे ढेर सारा पैसा चाहिए। पैसों का यह लालच उसे ऐसी स्थितियों में फंसा देता है जहां से उसका निकल पाना लगभग नामुमकिन है। वहीं दिव्या की अपनी महत्वाकांक्षाएँ हैं। वह अपने जिंदगी के रहस्यों से अमन को दूर रखती है। दोनों एक दूसरे के साथ होते हुए भी कोसों दूर हैं। अमन की अपनी मुश्किलों और दिव्या की अमन से छुटकारा पाने की कोशिशों के बीच फिल्म वह सब कुछ दिखाती है जो मोह-माया और लालच में उलझा इंसान चाहे-अनचाहे कर गुजरता है। फिल्म की कहानी दो हिस्सों में बांट कर लेखक-निर्देशक ने एक अनूठा प्रयोग किया है। इससे फिल्म में रफ्तार और रोमांच का स्तर बढ़ा है। पर स्क्रिप्ट की खामियों और बिना वजह के इमोशन घुसेड़ने के चक्कर में फिल्म इंटरवल के पहले ही दम तोड़ देती है। स्क्रिप्ट की कमियाँ खटकने लगती हैं।

 पहला सबसे बड़ा छेद पुलिस की जांच में नजर आता है। पैसा पाने के लिए अमन एक आदमी को अपनी कार में नींद की गोली खिला के बैठा देता है...फिर मुंह पर तकिया डाल कर उसकी हत्या कर देता। इसके बाद  उसे अपने कपड़े पहना कर गाड़ी के ऊपर पेट्रोल डालता है....गैलन को बगल में फेक देता है और गाड़ी में आग लगा देता है। अमन उसके कपड़े पहन कर वहाँ से भाग जाता है। अब चौंकाने वाली बात यह है कि जांच में पुलिस को जरा-सा भी शक नहीं होता। न तो पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में कुछ आता है न ही पुलिस घटना स्थल पर कुछ ढूंढती है? अमन ने जैसा सोचा है बिलकुल वैसे ही उसका काम हो जाता है। यह बात हजम नहीं होती।  

                   जब दिव्या अमन का फोन नहीं उठाती तो अमन वापस अपने घर आ जाता है और अपने फ्लैट में पूरे 2 दिन तक रहता है। वह दिन में बाहर निकलता है और ऑटो से वापस आता है....पर उसे कोई देख ही नहीं पाता...यह बात बहुत अजीब लगती है कि अपने ही सोसाइटी में एक मरा हुआ आदमी घूम रहा है पर उसे न कोई देखता है न पहचानता है। तीसरी सबसे बड़ी बात जिसके सहारे लेखक-निर्देशक ने फिल्म का क्लाइमेक्स गढ़ा है... वह बेहद कमजोर है। पुलिस स्टेशन में दिव्या की मुलाक़ात उस औरत से होती है जिसके पति को अमन ने अपनी कार एक्सीडेंट में मारा दिया है। दिव्या को यह बात पता चल जाती है और वह उस औरत से अपना संपर्क बढ़ाती है। फिल्म के अंतिम दृश्य में दिव्या अंजाने में उस औरत से उसके पति के प्रोफेशन का जिक्र कर देती है। जिससे उस औरत को पूरा मजरा समझ में आ जाता है कि यह औरत पहले से मेरे पति को जानती थी और इसी के पति अमन ने मेरे पति को मिलने के लिए बुलाया था। उसे यह भी याद आ जाता है कि उसका पति किसी फिल्म वाली मीटिंग में जा रहा है और ये वही लोग हैं जिनकी कार से एक बार उसका एक्सीडेंट हुआ था। अब यहाँ सबसे अहम सवाल यह है कि एक पति ने अपनी पत्नी को सब कुछ बता दिया मसलन वह किस काम से जा रहा है....जिससे मिलने जा रहा है वे कौन लोग हैं... पर उसने सिर्फ यही नहीं बताया कि जिससे मिलने जा रहा है उसका नाम क्या है। यह संभव है क्या... एक पति अपनी गर्भवती पत्नी को सब बता दे सिर्फ नाम ही नहीं बताए? जबकि यह आदमी के स्वभाव में ही है कि वह सबसे पहले नाम ही बताता है। अगर वह झूठ भी बोलता है तो भी नाम बताता है।

अभिनय फिल्म का सबसे मजबूर पक्ष है। रणवीर और नेहा दोनों ने बेहतरीन काम किया है। इनके अभिनय में मोह माया और मनी की तड़प साफ दिखाई देती है पर रोमांच और सस्पेंस के शानदार दृश्य से शुरू हुई फिल्म की पटकथा अचानक इमोशन के मायाजाल में फंस जाती है और फिल्म की रफ्तार पर ब्रेक लगाना शुरू हो जाता है।     



   रुद्रभानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं। .

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