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अभिनय देव
निर्देशक


परवेज शेख
लेखक


जसमीत रीन
लेखक


























Movie Review
फोर्स 2 :नजरिया नायाब पर नज़राना खराब


(आवश्यक सूचना:  कहानी और पटकथा को केंद्र में रख कर इस फिल्म की समीक्षा लिखी गई है। इसी वजह से फिल्म के कई दृश्यों और मोड़ों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है ताकि पटकथा के विभिन्न पहलुओं का गहराई से विश्लेषण किया जा सके। पाठकों से निवेदन है कि समीक्षा पढ़ते समय इस बात का ध्यान रखें कि यह फिल्म से कहीं ज्यादा पटकथा और कहानी की समीक्षा है।)

कलाकार - जॉन अब्राह्म, सोनाक्षी सिन्हा, ताहिर राज भसीन, आदिल हुसैन

लेखक - परवेज शेख, जसमीत रीन

निर्देशक - अभिनय देव

 

खुफिया एजेसियों में काम करने वाले एजेन्टों को लेकर हिंदी में कई फिल्में बन चुकी हैं। अभिनव देव के निर्देशन में बनी फोर्स-2 भी इसी पृष्ठभूमि पर आधारित है। लेखक ने फिल्म में अंडर कवर एजेंट्स और एजेंसियों के काम-काज के तरीकों को नए नजरिए से पेश करने की कोशिश की है। कैमरे के फोकस में वे एजेंट हैं जो मिशन पर मर जाते हैं पर शहीद का दर्जा मिलना तो दूर सरकार उन्हें पहचानने से भी इनकार कर देती है.... उनके परिवार वालों को ताउम्र एक सवाल के साथ जीना पड़ता है। अपने इसी नजरिए के कारण यह फिल्म पहले बनी फिल्मों से काफी अलग है। फिल्म सिस्टम और सरकार से न केवल सवाल करती है बल्कि इसके दुष्परिणाम को भी दिखाती है। निर्देशक ने अपनी बातों को कहने के लिए जबर्दस्त सस्पेंस और थ्रिल का इस्तेमाल किया है। फिल्म के शुरुआती 10 मिनट इतनी तेजी से गुजरते हैं कि दर्शक यह समझ ही नहीं पाते कि आखिर माजरा क्या है.... फिल्म की सबसे मजेदार बात यह है कि निर्देशक इस रोमांच को अंत तक बरकरार रखने में कामयाब हुए हैं।

फिल्म की कहानी चीन के शंघाई से शुरू होती है। चीनी एजेंसियों को यह पता चल जाता है कि कौन-कौन से लोग रॉ एजेंट्स के रूप में काम कर रहे हैं। इसके बाद अचानक वहां भारतीय रॉ एजेंट्स की हत्या होने लगती है। यह जानकारी भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ को सदमे में ला देती है।

फिल्म का दूसरा दृश्य मुंबई से शुरू होता है। फोर्स 1 का नायक और मुंबई पुलिस का इंस्पेक्टर यश फिर से ड्यूटी पर लौट आया है। अपनी पत्नी की मौत का गम भूल कर वह सामान्य रूप से नौकरी कर रहा है। इस दृश्य के बहाने लेखक ने दर्शकों को फोर्स 1 से जोड़ दिया है। यहीं से कहानी फोर्स 1 से फोर्स 2 में प्रवेश करती है। यश को एक पार्सल मिलता है, जिसे उसके दोस्त ने भेजा है। यह वहीं दोस्त है जिसकी शंघाई में हत्या हो गई है। पार्सल लेकर यश रॉ से संपर्क करता है। जिसके बाद रॉ उसे और लेडी एजेंट केके को मिशन की ज़िम्मेदारी सौंपती है और उन्हें बुडापेस्ट भेजती है। इसके बाद पूरी फिल्म हंगरी में ही बितती है... और ढेरों फाइट और चेज़ सीक्वेंस के बाद कहानी अपने अंजाम तक पहुँचती है।

फिल्म का सबसे मजबूत पहलू इसका रोमांच और सस्पेंस है। शुरू से लेकर अंत तक फिल्म दर्शकों को बांध कर रखती है। रोमांच का पारा घटता-बढ़ता रहता है पर कभी कमजोर नहीं पड़ता। कहानी में बिल्कुल भी भटकाव नहीं है। निर्देशक ने न तो बिना बात के रोमांस डाला है न ही रोमांटिक सॉन्ग.... पर कहानी नई होकर भी असाधारण नहीं है। फिल्म की कमजोरी कड़ी रिसर्च है। ऐसा लगता है रॉ की कार्य प्रणाली को लेकर लेखक-निर्देशक ने ज्यादा छान-बीन नहीं की है। अगर की होती तो यह कैसे मुमकिन था कि एक ऑफिसर जिसे गोली चलाने में दिक्कत होती है... उसे ही इतने बड़े मिशन पर विदेश भेज दिया जाय। बता दें कि फिल्म में रॉ ऑफिसर केके यानि सोनाक्षी सिन्हा एक ऑपरेशन के दौरान गोली नहीं चला पाती। तब से उसे गोली चलाने में दिक्कत होती है। क्या रॉ जैसी एजेंसी में इस तरह की बातों का ख्याल नहीं रखा जाता? लेखक ने इस कमजोरी के बहाने कहानी को आगे बढ़ाया है पर यह बात समझ से परे है।

एक और बात बहुत खटकती है कि एक स्वतंत्र देश में दो विदेशी एजेंसियां गैंगवार कर रही हैं पर उस देश की सुरक्षा एजेंसियों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। पूरी फिल्म में एक जगह भी लोकल पुलिस को नहीं दिखाया गया है, जबकि हर दूसरे सीन में एक मर्डर होता है। क्या ऐसा संभव है कि कोई यूरोपियन देश अपनी जमीन को खून-खारबे के लिए इस्तेमाल होने देगा? फिल्म में दूतावास और राजदूत की भूमिका को भी बहुत बढ़ा-चढ़ा के दिखाया गया है। जबकि यह बात बहुत साफ है कि विदेशों में किसी भी मामले में दूतावास या राजदूत सिर्फ और सिर्फ कूटनीतिक स्तर पर ही काम करते हैं। आंतरिक रूप से यदि वे अपने एजेंट या एजेंसियों की मदद भी करते हैं तो बहुत ही गोपनीय स्तर पर। पर यहां लेखक-निर्देशक ने इस सीमा को भी पार कर दिया है। 

एंग्री पुलिस ऑफिसर की भूमिका में जॉन के स्टाइल और बॉडी दोनों ने प्रभावित किया है। पर सोनाक्षी किसी भी एंगल से रॉ एजेंट नहीं लग रही हैं। विलेन की भूमिका में ताहिर राज भसीन का काम सराहनीय है। एक निर्दशक के रूप में अभिनव देव के काम की तारीफ करनी होगी। यह उनकी कोशिशों का ही नतीजा है कि स्क्रिप्ट की कमियों के बावजूद फिल्म में रोमांच जरा-सा भी कम नहीं होता। 

 



   रूद्र भानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं।.

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