1
 


तुम बिन 2
नयी बीन पुरानी धुन


अनुभव सिन्हा
लेखक - निर्देशक


























Movie Review
तुम बिन 2:नयी बीन पुरानी धुन


 तुम बिन २
     प्रेम का प्राचीन मुहावरा

एक लड़की दो लड़कों के प्रेम भँवर में फंस जाती हैं। एक वो है जिसे वो अपना सब कुछ मान बैठी थी और दूसरा वो जिसने उसके लिए सब कुछ किया। अब लड़की परेशान है कि पहले का साथ दे जिससे कभी साथ निभाने की कसमें खाईं या दूसरे के अहसानों का कर्ज चुकाए जिसने उसका बुरे वक्त पर साथ दिया।

इस कथा बिंदु के आधार पर गढी गई लेखक---निर्देशक अनुभव सिंन्हा की तुम बिन-2 कुछ नया प्रस्तुत करने की बजाय प्रेम की पुरानी लकीर पर ही चलती दिखाई पड़ती हैं। फिल्म का गीत संगीत सुरीला है पर फिल्म को देखने गए दर्शक को तो कहानी भी चाहिए । गानों को तो आज की पीढी यूं ट्यूब पर पहले ही खूब देख देख कर सिनेमाघरों में पहुंचती है।

आज सुबह ठंडक भरे माहौल में जयपुर के सिनेमाघर में फिल्म देखते समय लगा कि निर्देशक अनुभव सिन्हा को कहदूं । .. .. अमा यार ये अब गुजारे जमाने की बात हो गई। कहानी कहने का ये ढर्रा बचपन से देखते आए हैं। अब कुछ और कहो ना, और कुछ कहने के लिए नहीं तो कम से कम कहानी को पेश करने का अंदाज तो अलहदा रखो।

बहरहाल फिल्म तुम बिन की कहानी कुछ इस तरह है कि तरन (नेहा शर्मा) और आकाश (आसिम गुलाटी) एक दूसरे को पसंद करते हैं और जल्द शादी करने वाले हैं पर अचानक एक दुर्घटना में घायल होकर आकाश लापता हो जाता है। तरन और आकाश के पिता उसे ढूंड़ने की बहुत कोशिश करते हैं पर आकाश के बारे में कोई सुराग नहींं मिलता हैं।

ऐसे में तरन के परिवारजन उसे अपने दुख को कम करने के लिए आकाश को भूलने की हिदायत देते हैं लेकिन तरन आकाश को भूल नहींं पा रही है। इसी दौरान तरन की जिंदगी में शेखर(आदित्य सहल) का आगमन होता है। शेखर चाहता है कि तरन आकाश को भुलाकर एक नई जिंदगी शुरू करे और अपनी जिंदादिली से तरन के दिल में जगह बना लेता हैं।

लेकिन इसी दौरान घायलावस्था में एक डॉक्टर को मिले आकाश को होश आ जाता है और वह शेखर और तरन की जिंदगी में भूचाल बनकर आ जाता है । इसके बाद कुछ सिचुएशनल उठा पटक के बाद कहानी अंत का रुख पकड़ती है।

आजकल देश में संचार क्रंाति चरम पर हैै इसलिए दुर्घटनाओं में बिछुड़ने की बात दर्शकों के दिल से आसानी से नहींं उतरती हैं। दुर्घटना में बिछुड़ने का विचार अब पुराना सा हो गया है। देश में थोड़ा भी पढा लिखा इंसान पर्स में अपना ड्रायविंग लाइसेंस, आधार कार्ड आदि फोटो आई डी लेकर चलता है इसलिए सिनेमा में ऐसी चीजों से अब क्रिएटिव लेखकों को बचना चाहिए।

हां, फिल्म में जिंदगी में सकारात्मकता को लेकर कई अच्छी बातें संवादों के जरिए जरूर कही गई हैं, लेकिन फिर भी ये बातें किरदारों को असरदार नहीं बना पाती हैं। .. .. ..शायद निर्देशक का अपने किरदारों की जीवनचर्या को पेश करने का अंदाज बड़ा सुखद है। इसलिए ये बातें दर्शकों को किताबी और हास्यास्पद लगती हैं।  

 फिल्म में नेहा शर्मा को खूब फुटेज मिला है। लेकिन उनकी भाव भङ्क्षगमाओं पर निर्देशक ने कोई खास मेहनत की हैं। सिर्फ नायिका के रोने से अभिनय बयां नहीं हो जाता है। इससे अच्छा अभिनय तो उन्होंने कुछ समय पहले आई शिरीष कुंदर की शॉर्ट फिल्म कृति में किया था। इसके अलावा दौनों नए नायक भी अभिनय के मामले में निराश करते हैं। अभिनेता कंवलजीत को काफी समय बाद पर्दे पर देखना अच्छा लगता है। फिल्म में बर्फीली वादियों का फिल्मांकन काफी अच्छा है।

कहना गलत नहीं होगा कि टी सीरिज द्वारा निर्मित अधिकतर फिल्मों में वे सिर्फ गीत संगीत पर ध्यान रखते हैं। उनका लक्ष्य सिनेमाघरों में आए दर्शकों को अच्छी कहानी देने के बजाय फिल्म की रिलाजी से पहले गीती संगीत को हिट करवाने का रहता है। गानों को रेडियो चैनल्स पर खूब बजवाया जाता है जिससे फिल्म की हवा बन जाए। लेकिन कहानी अच्छी नहीं होगी तो फिल्म को कौन देखने जाएगा।

अगर आप वीकेंड में फ्री हैं और अपनी पत्नी या प्रेमिका के साथ घूमने जाने का प्लान है  तो आप ये फिल्म देखने जा सकते हैं। लेकिन अगर आप फिल्म के हिट गीत संगीत के कारण, फिल्म में एक अच्छी कहानी को देखने के नजरिए से सिनेमाघर में गए तो आप ठगा हुआ महसूस करेंगे।   



   धर्मेन्द्र उपाध्य�

पिछले आठ साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

Click here to Top