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रॉक ऑन
रॉक नहीं करती


पुबाली चौधुरी
लेखिका


शुजात सौदागर
निर्देशक


























Movie Review
रॉक ऑन-2:रॉक नहीं करती


थकी और भटकती
रॉक ऑन-2 

बॉलीवुड में ये विचार हॉलीवुड से आयातित है कि फिल्मों के सीक्वल बनाए जाएं, लेकिन बॉलीवुड में किसी भी फिल्म की अगली कड़ी में उन्ही किरदारों को लेकर कहानी को आगे बढाना निर्माताओं को रिस्की लगता हैं इसलिए आजकल बॉलीवुड निर्माता सिर्फ फिल्म के शीर्षक को साथ लेते हैं और अलग कहानी कहते हैं।  आनंद एल राय की तनु वेड्स मनु के बाद शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्म रॉक आन 2 भी फे्रंचाइजी नहीं बल्कि उन्ही किरदारों की आगे की कहानी को कहती है, लेकिन अफसोस ये है कि , इस कहानी में कोई वजनदारी नहीं है।

एक्सेल इंटरटेनमेंट के बैनर तले बनी सुजात सौदागर निर्देशित रॉक ऑन-2 में कई बातें अच्छी लगती हैं पर संपूर्ण प्रभाव में यह कमजोर फिल्म हैं। निर्देशक सुजात सौदागर दर्शकों के समक्ष सलीके से अपनी बात कहने में नाकाम रहे हैं। अगर कहानी पर चर्चा करें तो आठ साल बाद ये संगीत ग्रुप बिखर चुका हैं आदि (फरहान अखतर) मेघालय में अपनी एक अलग दुनियां बसा चुका है । इन दिनों ‘जो’ एक संगीत कंपनी हैंडिल करता है और रियलिटी शोज में वह जज बनके खुद की पहचान संगीत जगत में बनाए हुए है। केडी (पूरब कोहली) के आह्वान पर एक बार सभी दोस्त मिलते हैं और बैंड को फिर से जोड़ने की बात होती है। लेकिन यहां पर आदि के दिल में छुपी कड़वाहच प्रकट होती है और कहानी एक बार फिर flash back में जाती है। लेकिन आगे पटकथा में कुछ ऐसे मोड़ आते हैं कि आदि एक बार फिर संगीत की दुनियां में दाखिल होता है। पहले वाले किरदारों के साथ जिया (श्रद्धा कपूर) के रूप में निर्देशक ने फिल्म में जान डालने की कोशिश की है लेकिन वो शायद भूल जाते हैं कि कुछ इससे मिलता जुलता किरदार वो आशिकी-2 में कर चुकी हैं। जिया को आदि द्वारा मोटीवेट करने के सींस हमें बरबस आशिकी-2 की याद दिला देते हैं। फिल्म में गीत संगीत अच्छा हैं। लेकिन फरहान की आवाज अब खिंच चुकी हैं । क्योंकि उनकी आवाज के पेंदे में संगीत के शास्त्रीय स्वरूप का अभाव छलकता है। तकनीक के दम पर आप सिर्फ रस्मी गायन कर सकते हैं जो दो चार साल का मेहमान होता है।

ये बात सच है कि अभी भी दर्शक रॉक ऑन को भुला नहीं पाए हैं। रॉक ऑन एक बेहद सफल फिल्म रही क्योंकि उनके किरदार वजनदार थे उनमें सच्चाई थी।  उस कहानी के किरदार देशकाल वातावरण की कोख से निकले थे। एक दशक पहिले जब रॉक ऑन टीम ने ये कहानी कहने की मंशा की थी तब कई बैंड सद्स्यों के वर्चस्व को लेकर टूट रहे थे। इस कथ्य में दम था तभी शायद फरहान अखतर को बतौर अभिनेता दर्शकों ने हाथों हाथ लिया।

इस बात में भी कोई दोराय नहीं है कि पहली रॉक ऑन के विवाद के बाद फिल्म की कड़ियां कमजोर होती चली गईं। फिल्म देखते समय महसूसू होता है कि रॉक ऑन-2 को अभिनेता फरहान अखतर अपने कंधे पर लेकर चल निकले हैं और इस बार निर्देशक की कमांड कमजोर है। अभिनेता कितना भी अच्छा हो पर निर्देशक के नियंत्रण से बाहर हो जाये तो वो बेढंगा हो जाता है।

फरहान की इस आत्ममुगधता की वजह से फिल्म में अर्जुन रामपाल का किरदार सतही नजर आता है और फिल्म देखते समय ऐसा लगता है मानो अर्जुन रामपाल भी बस अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे हैं। फिल्म में मेघालय की मनोहारी लोकेशन पर कैमरावर्क अच्छा है पर मेघालय से जुड़े सामाजिक मुद्दे से फिल्म भटकती है।  फिल्म में उदय के रूप में शशांक अरोड़ा का प्राकट्य हुआ है जो सराहनीय है। उन्होंने अच्छा अभिनय किया है। सिनेमाघर से निकलने के बाद भी वो दर्शकों के जेहन में रहते हैं। जावेद अखतर के गीत ‘अधूरी कहानी’ को बार बार सुना जा सकता है।   

 एक्सेल इंटरटेनमेंट की अपनी साख भी है जो इस फिल्म से कमजोर होती नजर आ रही है। अगर आप फरहान अखतर के फैन हैं या श्रद्धा कपूर में श्रद्धा रखते हैं तो ये फिल्म देखने जा सकते हैं।   



   धर्मेन्द्र उपाध्य

पिछले आठ साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

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