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शिवाय
कहानी के सिवाय!


अजय देवगन
लेखक-निर्देशक


























Movie Review
शिवाय:कहानी के सिवाय!


निर्देशक- अजय देवगन

संगीत निर्देशक- मिथुन

कहानी - अजय देवगन

स्क्रिप्ट - संदीप श्रीवास्तव, रॉबिन भट्ट   

प्रमुख कलाकार- अजय देवगन, एरिका कार और साएशा सहगल

हिमालय की 16000 फ़ीट की उंचाई पर एक आदमी बिना कपड़ों के लेटा हुआ है...उसके शरीर पर भगवान शंकर के टैटू बने हैं...अचानक हिमालय की वादियों में एक आवाज गूँजती है.....शिवाय....शिवाय... और फिर फिल्म का नायक शिवाय गुरुत्वाकर्षण के सारे नियमों को धराशायी करते हुए हजारों फिट की ऊंचाई से छलांग लगा देता है। शिवाय नीचे उतरने में उतना ही समय लेता है जितना कि दर्शक को यह समझने में लगता है कि फिल्म शिवाय का कोई आध्यात्मिक और धार्मिक आधार नहीं है...हाँ पर एक बात बिलकुल साफ हो जाती है कि फिल्म में अजय देवगन ने निर्देशक होने का भरपूर फायदा उठाया है क्योंकि सिर्फ अभिनेता के रूप में काम करने पर उन्हें गुरुत्वाकर्षण के नियमों तोड़ने की इतनी छुट तो कभी रोहित सेट्टी ने भी नहीं दी होगी। जबकि खुद उनका गुरुत्वाकर्षण से छत्तीस का आंकड़ा है। बहरहाल कहने का मतलब यह है कि फिल्म का पहला दृश्य देखने के बाद ही दर्शकों को इस बात का अंदाजा हो जाता है कि प्रोमो और ट्रेलर में अजय देवगन ने उन्हें जिस हिमालय, कैलाश और शिव के दर्शन कराए थे वे फिल्म में कहीं है ही नहीं। लेखक ने नायक को शिव के मेटाफर के रूप में इस्तेमाल किया है। जिस तरह भगवान शिव सती के अग्नि में समा जाने के बाद शिव विनाशक बने थे वैसे ही नायक भी अपनी बेटी के अपहरण के बाद विनाशक बन जाता है।

फिल्म की कहानी का नायक एक पर्वतारोही है। अब जब वह गुरुत्वाकर्षण के नियमों को नहीं मानता तो जाहीर है वह कुछ खास होगा। कहानी में शिवाय सुपर नेचुरल पवार न होकर भी बहुत खास है। वह आर्मी की मदद करता है... उसे हिमालय से बेहद प्यार है। इतना प्यार की वह अपने प्यार को इसके लिए कुर्बान कर देता है। दिल्ली से एक पर्वतारोहियों का एक समूह हिमालय घूमने आता है। इस ग्रुप में बुल्गारिया की एक लड़की ओल्गा (एरिका कार) भी है। शिवाय ओल्गा को एक तूफान से बचाता है। इसके बाद दोनों में प्यार हो जाता है। ओल्गा भारत में नहीं रुकना चाहती क्योंकि उसके अपने सपने और जिम्मेदारियाँ हैं वहीं दूसरी तरफ शिवाय हिमायल को छोडकर बुल्गारिया नहीं जाना चाहता। इसी कशमकश में कहानी आगे बढ़ती है और दोनों को पता चलता है कि ओल्गा की प्रेग्नेंट है। ओल्गा एक बच्ची को जन्म देती है और उसे शिवाय के पास छोड़ कर बुल्गारिया चली जाती है। शिवाय की बेटी गोरा जब बड़ी होती है तो माँ से मिलने की जिद करती है। शिवाय उसे मिलाने के लिए बुल्गारिया ले जाता है पर यहाँ कहानी कुछ और ही मोड ले लेती है...गोरा किडनैप हो जाती है और फिर शुरू होता है शिवाय का तांडव। कई ट्विस्ट और टर्न्स से होने के बाद फिल्म अपने मंजिल तक पहुँचती है।

               फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी लंबाई है। इंटरवल के बाद दर्शकों को कहानी का अंदाजा लग जाता है पर फिल्म खत्म होने का नाम नहीं लेती। करीब 2 घंटे 50 मिनट में ज़्यादातर समय शिवाय अपनी बेटी को खोजने में लगाता है। इस दौरान जम कर एक्शन होता है। निश्चित रूप से शिवाय के एक्शन दृश्य बॉलीवुड के मील का पत्थर साबित हो सकते हैं पर सिर्फ एक्शन दर्शकों को बांध कर रखने में कामयाब नहीं हो पाया है। फिल्म की कहानी इतनी छोटी और सपाट है कि इंटरवल के पहले ही दर्शकों को पता चल जाता है कि आगे क्या होने वाला है और अंत तक पहुँचते-पहुँचते दर्शक कई बार घड़ी देख लेते हैं। 

कहानी में ह्यूमर डालने के लिए निर्देशक ने बुल्गारिया में भारत के राजदूत (सौरभ शुक्ला) को बिहारी  बनाया है। बिहारी टोन में बोल कर सौरभ दर्शकों को हंसाने की असफल कोशिश करते हैं। पर यह कोशिश स्क्रिनप्ले और रिसर्च की कमी की तरफ इशारा करती है। सौरभ शुक्ला का किरदार गढ़ते समय लेखक को भारतीय विदेश सेवा में तैनात अधिकारियों की विशेषताओं और योग्यता के बारे में अध्ययन करना चाहिए था। कम्यूनिकेशन स्कील और डिप्लोमेसी ही एक आईएफएस अधिकारी की पहचान होती है। पर यहाँ लेखक और निर्देशक ने इस बात को समझने की कोशिश नहीं की है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी कमाल की है। बर्फ और पहाड़ पर्दे पर जादू की तरह दिखाई देते हैं। लेखक निर्देशक ने कई किरदारों और घटनाओं को बस ऐसे ही गढ़ दिया है। ये किरदार आते हैं और चले जाते हैं... इंडियन  आर्मी के कुछ जवान, पहाड़ी लड़का, सौरभ शुक्ला और गिरीश कर्नाड जैसे किरदारों का और अधिक उपयोग किया जा सकता था।

अजय देवगन के हर फिल्म में संवाद पर विशेष ज़ोर रहता है। इस फिल्म में भी संवादों पर की गई मेहनत दिखती है। फिल्म के कई संवाद थिएटर से बाहर निकलने बाद भी दर्शकों के जेहन में मौजूद रहते हैं। फिल्म का संगीत बेहद शानदार है। फिल्म एक्शन के साथ ही इमोशन के ट्रैक पर भी दौड़ती है। पर कई बार यह इमोशन सिर्फ एकतरफा लगता है। दूसरे तरफ से किसी तरह की भावनात्मक प्रतिक्रिया नजर नहीं आती है। अजय देवगन का अभिनय काबिल-ए- तारीफ है। उन्होंने शिवाय के किरदार को जिया है। निर्देशक ने डिटेलिंग पर भी काफी ध्यान दिया है। पर अफसोस है कि शिवाय एक अच्छी फिल्म बनते-बनते रह गई है। अगर फिल्म के स्क्रिप्ट और कहानी पर मेहनत होती तो शायद शिवाय कुछ और ही होता।

शिवाय को इस बार सिर्फ फिल्म के तौर पर ही नहीं बल्कि एजेंडा सेटर के रूप में भी देखना होगा। रिलीज होने के पहले फिल्म के निर्माता इसके कंटेन्ट और पब्लिसिटी को लेकर जिस तरह का प्रोपोगेंडा किया था वह भी दर्शकों को आकर्षित करने में नाकाम रही। इससे एक बात तो पूरी तरह साफ हो गई कि फिल्म में हीरो सिर्फ और सिर्फ कहानी ही होती है। शिवाय का नायक शानदार एक्शन करता है...जबर्दस्त अभिनय करता है.... पर कमजोर कहानी इन सब चीजों को दरकिनार कर देती है।         



   रुद्रभानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं। .

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