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बेटा (भोजपुरी)
बदलाव की कड़ी!


शशि रंजन द्विवेदी
लेखक


























Movie Review
बेटा (भोजपुरी) :भोजपुरी सिनेमा में बदलाव की कड़ी!


बेटा (भोजपुरी)
संभवतः भोजपुरी सिनेमा में बदलाव की कड़ी!

बैनर : पूर्वांचल टॉकीज

लेखक : शशिरंजन द्विवेदी

गीतकार : प्यारेलाल यादव कवि जी व श्याम देहाती

संगीतकार : ओम झा

निर्देशक : विशाल वर्मा

निर्माता : विकास कुमार

कलाकार : दिनेश लाल यादव निरहू, आम्रपाली दुबे, अंजना सिंह, अशोक समर्थ, अनूप अरोड़ा और किरण यादव.

फिल्म में अश्लीलता बिल्कुल नहीं है, न गीतों में, न पटकथा में. जी हाँ, आप भोजपुरी फिल्म की ही समीक्षा पढ़ रहे हैं. चौक गए ना?! तो क्या फिल्म चल पायेगी..? हिट और सुपरहिट हो पायेगी..? दर्शकों को फिल्म पसंद आयेगी.. ? भोजपुरी फिल्मों के दर्शक तो लोग्रेड लोग हैं, मजदूर क्लास ! नंगापन, हीरोइनों के कपडों से झाँकती देह, गानों और संवादों में डबल मीनिंग, अश्लील डांस - यही सब उनके मनोरंजन के अनिवार्य तत्व हैं. बिना इनके भोजपुरी फिल्में बनाई तो जा सकती हैं, लेकिन चलाई नहीं जा सकतीं ! लेकिन इस शुक्रवार रिलीज हुई फिल्म बेटा इस लीक को झुठलाती साबित हो रही है. और राहत देनेवाली बात यह है कि इसके बाद भी फिल्म दर्शकों को बाँधकर रखती है. दर्शक गीतों पर भद्दे कमेंट्स किए बिना भी मजा लेते हैं शालीनता से. हीरो के हीरोइज्म पर तालियाँ बजाते हैं. एंज्वाय करते हैं. पूर्वांचल टॉकीज को ऎसी फिल्म बनाने के लिए और भोजपुरी फिल्मों के नामचीन निर्माता आलोक कुमार को विशेष आग्रह कर ऎसी फिल्म देखने के लिए बधाई ! भोजपुरी फिल्मों के चारित्रिक बदलाव में यह फिल्म बड़ी भूमिका निभा सकती है !

कहानी एक ऎसे बेटे (दिनेश लाल यादव निरहू) की है, जिसके पिता को गाँव के बदमाश मुखिया (अशोक समर्थ) ने तभी मार दिया था, जब वह माँ (किरण यादव) के गर्भ में था. उसका पिता जो कि स्कूल टीचर था, गाँव में बदलाव लाना चाहता था और इसके लिए वह मुखिया का चुनाव लड़ने उतरा था, लेकिन बदमाश मुखिया को यह नागवार लगा और उसने गाँव वालों के सामने ही वह उस टीचर यानी सूरज के पिता की हत्या कर दी थी. बाद में सूरज की माँ मुखिया के लंपट भाई की हत्या कर देती है और उसे जेल हो जाती है. जेल में ही वह सूरज को जन्म देती है. दुश्मन सूरज की हत्या न कर दे, इस वजह से वह अपने भाई (अनूप अरोड़ा) को बच्चे की परवरिश की जिम्मेवारी सौंपती है, जिसे वह भली भाँति निभाता है. इसी कारण वह विवाह भी नहीं करता.

इन सारी जानकारियों से दूर सूरज मामा के घर बनारस में जवान होता है और बड़ा रसमिजाज निकलता है. एक लड़की (आम्रपाली दूबे) के प्यार में पड़ जाता है. फर्स्ट साइट लव, देखते ही प्यार ! लेकिन वह लड़की उसे भाव नहीं देती है. जबकि एक और लड़की गुड़िया (अंजना सिंह) सूरज को प्यार करती है. लेकिन सूरज उसके प्यार को नहीं जान पाता है. गुड़िया मामा के घर में ही रहती है. (क्या रिश्ता है आखिर तक पता नहीं चल पाता) बहरहाल सूरज आम्रपाली का प्यार पाने के मिशन पर लग जाता है. इस मिशन में उसका दोस्त पंडित साथ देता है. और आखिरकार सूरज को वह लड़की भी प्यार करने लगती है. गुड़िया को यह जानकर धक्का लगता है. लेकिन दूसरी तरफ दर्शक को भी झटका लगता है, जब पता चलता है कि सूरज जिस लड़की से प्यार करता है, वो कोई और नहीं बल्कि उस बदमाश मुखिया की ही बेटी है, जिसने सूरज के पिता की हत्या की थी. उसके बाद माँ जेल से रिहा होती है और सूरज को सारी कहानी बताती है. उसके बाद फ़िल्म एक बदले की कहानी बन जाती है. सूरज मुखिया को उसी तरह उसी जगह मारकर अपने पिता की मौत का बदला लेता है.

बिल्कुल सही सोच रहे हैं आप, कहानी में नया क्या है? पटकथा भी बेहद अपरिपक्व और घिसी पिटी है. लेखक ने कहानी तो जैसी भी है, गढ़ ली है, लेकिन वह पटकथा के शिल्प को सही तरह से इस्तेमाल नहीं कर पाया. सही कैरेक्टराइजेशन और पर्दे पर उसे सही तरीके से रखना लेखन का जरूरी शिल्प है. इस फिल्म लेखन में वह शिल्प नहीं दिखता है. पटकथा लेखन सिर्फ दृश्य दर दृश्य आगे बढ़ना भर नहीं है. बल्कि कहानी, उसके परिवेश और चरित्रों को उसकी विशेषताओं के साथ प्रस्तुत करते जाना सबसे अहम है. किसी भी फिल्म का आधार है स्क्रिप्ट. अगर कहानी अच्छी हो, पटकथा अच्छी हो तो फिल्म अच्छी होनी ही होनी है.

फिल्म का सबसे सबल पक्ष है लीड अभिनेता दिनेश लाल यादव की अदाकारी. दिनेश ने अद्भुत काम किया है ! बिल्कुल ही मंझे अभिनेता की तरह अपने चरित्र के हर शेड को बखूबी निभाया है. हालाँकि रोमांटिक शेड में लेखक-निर्देशक ने शाहरुख खान की फिल्मों की छौंक देने की कोशिश की है, लेकिन निरहू ने अपने अभिनय में किसी की भी छाप आने नहीं दी है. यह सुखद पहलू है कि निरहू ने अभिनय का अपना अलग ढंग गढ़ा है. इंटरवल के बाद निरहू के चरित्र का एक्शन शेड सामने आता है. दिलचस्प पक्ष यह है कि एक्शन चरित्र में भी निरहू ने अपना जबरदस्त संतुलन बनाये रखा है और दिल को मुग्ध करनेवाला काम किया है. अलबम सिंगर से कुशल अभिनेता के तौर पर निरहू का खुद को स्थापित करना, उनकी लगन और मेहनत के साथ उनकी जन्मजात प्रतिभा को भी रेखांकित करता है. यह फिल्म निर्विवाद रूप से सिर्फ उनकी ही फिल्म है.

दोनों हीरोइनें का बहुत रोल नहीं है. चरित्र को गढ़ते और विस्तार देते वक्त लेखक ने दोनों के साथ अन्याय किया है. पुरुषवादी अन्याय. दोनों की भूमिका महज गीत गवनई तक सीमित है. हालाँकि इनमें भी अंजना ज्यादा प्रभावित करती है. वह निस्संदेह अच्छी अभिनेत्री है. लेकिन दोनों जरूरत से ज्यादा मोटी लगती हैं. भोजपुरी फिल्मों का यह फॉर्मूला अभी टूटना बाकी है कि भोजपुरी में मोटी हीरोइनें ही चलती हैं! हालाँकि भोजपुरी की शुरुआती हीरोइनें कुमकुम या पद्मा खन्ना या शीला डेविड और मीरा माधुरी मोटी नहीं थी, लेकिन कुणाल जी के साथ कई सुपरहिट फिल्में देनेवाली गौरी खुराना अंजना और आम्रपाली जैसी ही थी.

विलेन का चरित्र रचने में भी लेखक गड़बड़ा गया है. सनकी है, बीमार है, स्पष्ट नहीं हो पाता है. लेकिन अभिनेता अशोक समर्थ सामर्थ्यवान हैं.

संगीतकार ओम झा ने भोजपुरी लोकधुनों, स्टाइल और हिन्दी पैटर्न की अच्छी ब्लेंडिंग की है. सिनेमाघर में गीत अच्छे लगते हैं. रानी चटर्जी पर फिल्माया आइटम गीत भी अच्छा बन पड़ा है. उस गीत का एम्बियेंस भी अच्छा है.

निर्देशक विशाल वर्मा को और कल्पनाशील होना पड़ेगा. निर्देशन सिर्फ दृश्य फिल्माने भर नहीं है. लेकिन कुल मिलाकर एक इंटरटेनिंग फिल्म बनाने में कामयाब रहा, ये उसकी कामयाबी है.

निर्माता विकास कुमार में अच्छे निर्माता होने की भरपूर संभावना है. फिल्म अच्छी बन गई है. खूब चले ऎसी शुभकामना. भोजपुरी सिनेमा को ऎसे निर्माताओं की ही आवश्यकता है, जो अश्लीलता और फूहड़ता से भोजपुरी सिनेमा को उबार सके.

धनंजय कुमार               



   धनंजय कुमार

धनंजय कुमार भोजपुरी और हिंदी फ़िल्म और टीवी के लेखक हैं..

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