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पगड़ी
राजस्थान के रंग


निशांत भारद्वाज
दिग्दर्शक - पटकथा


























Movie Review
पगड़ी (राजस्थानी):रंगीलो राजस्थान री रंगीन पगड़ी


राजस्थान की आन बान शान का बोध इतिहास ने हर भारतीय को करा रखा है । अब राजस्थानी सिनेमा में भी इस रंग को लेकर आई है, ताजातरीन राजस्थानी फिल्म पगड़ी। अपने शीर्षक के साथ ही स्थानीय दर्शकों का दिल छूने वाली इस फिल्म का प्रदर्शन राजस्थान में बड़े पैमाने पर हुआ और फिल्म अभी  सिनेमाघरों में डटी हुई है।

रुआर्यन फिल्मस के बैनर तले बनी फिल्म पगड़ी के निर्देशक निशांत भारद्वाज हैं। जिन्होंने कोहली के साथ मिलकर फिल्म की पटकथा को तैयार किया है। यूं तो आमतौर पर फिल्म की कहानी में वही बॉलीवुड पेंच हैं जिन्हें दर्शक दशकों से सिनेमा में देखते आ रहे हैं पर राजस्थानी सिनेमा के लिहाज से प्रस्तुततिकरण में थोड़ी नवीनता है जो दर्शकों को पसंद आ रही है।

फिल्म की कहानी के मुताबिक ये राजस्थान के एक युवा सागर (श्रवण सागर ) की कहानी हैं जो आवारा खयाल, अपनी धुन में रहता है । हर अंजान की मदद करना मानो उसका इंसानी पेशा है। इसके चलते वो राह चलती मुसीबतों को अपने सिर पर बैठा लेता है। इस कड़ी में वह राजस्थान के एक दबंग मंत्री भैरोंसिंह (युधिष्ठिर भाटी) के भाई को इतना मारता हैं कि उसकी मौत हो जाती है। अपने भाई की मौत का बदला लेने के लिए भैरोंसिंह उसके पीछे हैं। ऐसे में खुद को छिपाने के लिए वह एक संगीत कंपनी के कार्यकारी प्रबंधक राजेश (खयालीराम) और उसके साथियों के साथ मिल जाता हैं और परिस्थितिवश  वो खुद को लोकगायक के रूप में पहचान दिलवाने में सफल होता है।  इसी दौरान उसकी मुलाकात नायिका नेहा (रूही चतुर्वेदी) से होती है । भोला भाला सागर नेहा के मन को भा जाता है। और वो उसे प्यार करने लग जाती है। लेकिन इसी दौरान सागर के सामने उसकी जिंदगी से जुड़े कुछ ऐसे खुलासे होते हैं कि उसे अपने वर्तमान को छिटककर अपने अतीत में झाकना पड़ॄा है। वो अपने परिवार के आत्मसम्मान और को फिर से वापिस दिलाने के लिए राजस्थान की जमीं पर वापिस लौटता हैं जहां से उसे बचपन में पलायन करना पड़ा था।  

राजस्थानी माना मर्यादा और नायक के संवादों में राजस्थान के वीरों की वाणी का असर है। अभिनेता श्रवण सागर ने अपनी परफॉरमेंस से दर्शकों का दिल जीतने में कसर नहीं छोड़ी हैं।  इस लिहाज से फिल्म अच्छी है तो कई लिहाज से फिल्म कमजोर साबित होती है। मसलन फिल्म निर्देशक निशांत भारद्वाज ने कैमरे को सिर्फ राजस्थान में फिट रखा हैं जबकि फिल्म की कहानी मुंबई पहुंचती हैं। लेकिन दर्शकों को राजस्थान में मुंबई दिखाने से फिल्म अपनी विश्वसनीयता खोती है।

बिना लाग लपेट के साफ कहना चाहूंगा कि राजस्थानी सिनेमा में कलाकारों का मुंह देखके किरदार का विस्तार होता है। .. ..काश कहानी में किरदारों का रूख देखकर पटकथा में उनके विस्तार का फैसला होता तो फिल्म की कहानी कुछ और ही होती । फिल्म का फलैशबैक पार्ट राजस्थानी रंगों से असर छोड़ता है। दाता हुकुम को तो हम भरपूर देखते हैं पर उनकी पत्नी और नायक की मां बिना कोई संवाद बोले ही पर्दे पर बनी रहती हैं जबकि कहानी के मुताबिक उसका किरदार कई अच्छे संवादों का अधिकारी था, लेकिन इसकी बजाय निर्देशक ने खलनायकों को जमकर फुटेज दिया है, जो बोरियत पैदा करता है।

फिल्म का गीत रंगरेजा असरदार है और उसका फिल्मांकन भी काफी अच्छा बन पड़ा है।  निंश्चित रूप से इस फिल्म को अभिनेता सागर अपने स्टारडम से खींचते हैं, दर्शक उनके संवादों पर ताली बजाते हैं। लेकिन स्क्रिप्ट को कसने की जरूरत थी।

 अंत में कहना चाहूंगा कि राजस्थान में पगड़ी ने हिंदी फिल्मों के सामने राजस्थानी फिल्मों के लिए एक मार्ग बना दिया है जो आने वाली फिल्मों को जरूर सहारा देगा।  



   धर्मेंद्र उपाध्या

पिछले आठ साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

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