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अन्ना
हकीकत से परहेज


शशांक उदापुरकर
लेखक-निर्देशक


























Movie Review
अन्ना:हकीकत से परहेज


 

लेखक-निर्देशक: शशांक उदापुरकर

 

कलाकार : शशांक उदापुरकर,तनिशा मुख़र्जी,गोविन्द नामदेव  

 

 2016 को हिन्दी सिनेमा का बायोपिक ईयर कहना काफी हद तक सही रहेगा। रेबेलियस फ्लावर, नीरजा, अज़हर, सरबजीत, बुधिया बोर्न टू रन, विरप्पन, एमएस धोनी : द अनटोल्ड स्टोरी’ जैसी बायोपिक फिल्मों के बाद रिलीज हुई अन्ना भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है। फिल्म देखने से पहले मन में सबसे बड़ा सवाल था कि लेखक-निर्देशक ने अन्ना हजारे को किस तरह पर्दे पर उतारा होगा? एक आदमी जिसके बारे में मीडिया सालों से दिखा रही है...जिसके जीवन का हर पहलू अखबारों में छप चुका हो....उसी कहानी को नयेपन के साथ फिल्म की शक्ल में पर्दे पर उतरना मुश्किल तो रहा ही होगा... पर फिल्म देखने के बाद यह भ्रम दूर हो गया। दरअसल फिल्म में लेखक-निर्देशक ने अन्ना के बारे में कुछ नया कहने की कोशिश ही नहीं की है।   

फिल्म की शुरुआत दिल्ली के रामलीला मैदान से होती है। अन्ना किसन बाबूराव हजारे जन लोकपाल बिल के लिए धरने पर बैठे हैं। इसके बाद कहानी फ्लैशबैक में चली जाती है और फिर शुरू होता है किसन बाबूराव हजारे का अन्ना बनने का सफर। शुरुआत गांव से होती है। बचपन से ही किसन बाबूराव हजारे के मन में देश के लिए कुछ करने की चाह है। नौकरी की तलाश में किसन बाबूराव मुंबई आ जाते हैं और फूल बेचने लगते हैं लेकिन देशभक्ति की राह उन्हें सेना में ले जाती है, मगर जैसी देशभक्ति वह करना चाहते हैं वैसा कर पाने में असमर्थ होने पर वह सेना से वीआरएस लेकर वापस अपने गांव आ जाते हैं और सेना की नौकरी से मिले पैसों से गांव में एक मंदिर बनवाते हैं। इसके बाद सूखे के हालात से निबटने के लिए गांव में पानी लाने की जद्दोजहद में लग जाते हैं और फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ देते हैं। इस तरह से कई दिलचस्प मोड़ लेते हुए कहानी आगे बढ़ती है।

फिल्म का लेखन और निर्देशन शशांक उदापुरकर ने किया है। अन्ना हज़ारे का किरदार भी उन्हीं ने निभाया है। फिल्म में उदापुरकर की कोशिश की झलक साफ दिखाई देती है। अन्ना हज़ारे की डिटेलिंग देखकर लगता है कि उनहोंने काफी करीब से अन्ना हजारे को जाना और समझा है। पर अन्ना के जीवन के हर पहलू को दिखाने के चक्कर में फिल्म कई जगह अपनी बात अधूरी छोड़कर ही आगे बढ़ जाती है।

जैसे एक जगह उन्हें फ़ौज छोड़ने के कारण भगोड़ा कहा गया है लेकिन फिल्म इसका कोई स्पष्ट कारण नहीं बताती है। अन्ना की देश सेवा के लिए व्याकुलता को भी बस वहीं छोड़कर फिल्म आगे बढ़ जाती है। इसके अलावा निर्देशक ने यह भी स्पष्ट करने की कोशिश नहीं कि है अन्ना का विरोध कर रहे गांव वाले अन्ना के समर्थन में कैसे आ जाते हैं? अन्ना आंदोलन करने के लिए क्यों प्रेरित होते हैं ? निर्देशक इन सवालों से बच कर आगे निकाल जाते हैं।

निर्देशक ने विवादों से बचाने के लिए टीम अन्ना के महत्वपूर्ण व्यक्ति अरविंद केजरीवाल को पूरी तरह से नजरंदाज कर दिया है। इस वजह से फिल्म कई जगहों पर प्रभाव छोड़ने में असफल हो जाती है। कहानी और अन्ना से जुड़ी बातों के अलावा कई छोटी-छोटी चीजें बड़ी टपटी-सी लगती हैं जैसे एबीपी माझा पर हिन्दी में दिखाई जाने वाली खबर। जबकि एबीपी माझा मराठी चैनल है। फिल्म में युद्ध के दृश्य नकली लगते हैं। अभिनेता शशांक उदापुरकर की शक्ल काफी कुछ अण्णा हजारे जैसी जरूर लगती है। उनके द्वारा बोले गए संवाद स्वाभाविक लगते है, लेकिन फिल्म के कई दूसरे संवाद उर्दू के शब्दों के कारण स्वाभाविक नहीं लगते।

अन्ना के रोल को निभाने के लिए अभिनेता शशांक उदापुरकर ने काफी मेहनत की है। इसमें वे काफी हद तक सफल भी हुए हैं। शशांक के अलावा फिल्म में तनिषा मुखर्जी रिपोर्टर की भूमिका में हैं पर अभिनय के नाम पर करने के लिए उनके पास कुछ खास नहीं है। गोविंद नामदेव और शरत सक्सेना ने अपनी छोटी-छोटी भूमिकाओं में भी अच्छा अभिनय किया है। कहानी और अभिनय के बाद जो तीसरी चीज फिल्म में बुरी तरह से निराश करती है, वह है सिनेमेटोग्राफी। क्लोजअप शॉट्स में स्क्रीन पर हिलते हुए कैमरे आँखों को असहज लगते हैं। कुछ मिलकर ये अन्ना पूरे फिल्मी लगते हैं। निर्देशक के लाख कोशिशों के बावजूद फिल्म न तो अन्ना को दर्शकों के दिलों तक नहीं ले जा पाई है।   

 

 

  



   रुद्रभानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं। .

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