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सात उचक्के
जस नाम तस काम


























Movie Review
सात उचक्के :वाहियात अंदाज में जीवनमंत्र देती सात उचक


                        

       वाहियात अंदाज में जीवनमंत्र देती सात उचक्के

निर्देशक : संजीव शर्मा

लेखक : संजीव शर्मा, संदीप साकेत

कलाकार : मनोज बाजपेयी, केके मेनन, विजय राज, अनु कपूर, अदिति शर्मा, अनुपम खेर

 अगर कोई फिल्म सेंसर में लटक कर बमुश्किल पास हो, दर्शक ट्रेलर देखें तो उसमें गालियों का अंबार लगा हो और उस पर फिल्म का नाम सात उचक्के हो तो कोई भी पारिवारिक दर्शक तो फिल्म देखने की जहमत उठा ही नहीं सकता। आज सुबह जब सिनेमाघर पहुंचा तो फिल्म सात उचक्के का सुबह वाला शो कैंसल होने वाला था क्योंकि फिल्म देखने पहुंचने वाला मैं पहला व्यक्ति था लेकिन शायद मेरी ईश्वर ने सुनी । पांच 10 मिनिट के इंतजार के बाद सात आठ लोग और आ गए और शो शुरू हुआ। लेकिन फिल्म देखके निकला तो एक जीवन मंत्र लेकर निकला, जिसकी मुझे कोई आस नहीं थी। 

लेखक निर्देशक संजीव शर्मा ने संदीप साकेत के साथ मिलकर किरदारों के परिवेश के मुताबिक वाकई एक अच्छी फिल्म लिखी है।  लेकिन अफसोस अपनी बात कहने का वाहियात अंदाज उन्हें दर्शकों से दूर रखेगा।

वैसे सात उचक्केसात किरदारों की कहानी हैं। लेकिन इसके कथा सूत्र पर नजर डालें तो फिल्म पप्पी (मनोज बाजपेई) से शुरू होती है, जो वैसे तो हनुमान चालीसा चिल्लाते हुए पढता हैं पर इश्क मोहब्बत के मामले में अजगर है।  घर के पास में रहने वाली सोना (अदिति शर्मा) पर जान छिड़कता है। पप्पी  एंटिक चीजें बेचने का का काम करता है। पर उसका धंधा काफी समय से मंदा चल रहा है। कर्जदारों का कर्ज हैं सो वह काफी परेशान रहता है।

वो अपने दो दोस्तों के साथ मिलकर छोटी मोटी सहूलियत पाने के लिए चोरी चकारी करता है तो वहां भी उसके लिए मुसीबत स्वरूप खड़ा हो जाता हैं दरोगा  तेजपाल सिंह (के केक मेनन) जो पप्पी की तरह ही सोना से ब्याह रचाना चाहता है। 

अपने बिगढे हालात और अपनी प्रेयसी से शादी रचाने की परेशाानियों में अटके पप्पी को एक दिन पता चलता है कि दीवान साहब की हवेली में मुगलकालीन खजाना गढा है। बस पप्पी अपने दो उचक्के दोस्त और अपनी प्रेयसी सोना के साथ मिलकर इस खजाने को पाने के सपने देखने लगा जाता है। लेकिन वह जानता है कि जब तक तेजपाल मौजूद है, तब तक वो कोई गैरकानूनी काम नहींं कर सकता है । अत: इसके लिए भी एक दूसरे क्राइम की प्लानिगं होती हैं। और इस वजह से छोटा मोटा जरायम पेशा वकील जगगी (विजयराज) भी अपने दो चेलों के साथ खजाने पाने की मुहिम में शरीक हो जाता है। इस प्रकार ये सात उचक्केविभिन्न परिस्थितियों में कहानी को अंजाम तक पहुंचाते हैं।

फिल्म में चाहे गालियों की भरमार हो पर वो किरदारों के परिवेश के मुताबिक है और बेफालतू नहींं लगती हैं । क्योंकि किरदार अपने मुंह से गाली निकालते समय ऐसे भाव आने ही नहींं देते हैं कि वो गाली दे रहे हैं। वो गालियों का प्रयोग अपनी पंक्ति में उपसर्ग और प्रत्यय की तरह करते हैं।

विजराज, के के और मनोज वाजपेई के अभिनय पर प्रश्न चिन्ह लगाया ही नहीं  जा सकता है लेकिन इस फिल्म में अभिनेता अनु कपूर पागल बाबा बिच्ची के किरदार में असरदार हैं। किरदारों के रंग के मुताबिक इस फिल्म का शीर्षक सात उचक्के रखा गया है लेकिन अगर इस फिल्म का शीर्षक दूसरा होता और गालियों का लोप हो जाता तो फिल्म के अंत में निर्देशक की सोच को देखते हुए फिल्म को ज्यादा लोग देख पाते।

फिल्म के कमजोर पहलू पर नजर डाली जाए जाए तो अंत में फिल्म थोड़ी लंबी हो जाती है। हालांकि निर्देशक ने ऐसा हर किरदार के साथ न्याय करने की दृष्टि से किया है लेकिन फिल्म में बीच के कुछ ऐसे दृष्य थे जिन पर कैंची चलाई जा सकती थी। फिल्म में गीत संगीत के लिए कोई खास गुंजाइश नहीं रखी है। अंत में आइटम सॉंग फिल्म की स्पीड में बाधा पैदा करता है।

बेशक ये कोई पारिवारिक फिल्म तो नहीं पर यार दोस्तों के साथ फिल्म देखने वाले दर्शकों को ये फिल्म जरूर गुदगुदाएगी। इसके साथ ही ईश्वर की करनी में विश्वास ना रख, अपने सपनों के लिए द्ंद-फंद रचने वालों को एक मैसेज जरूर देगी।    



   धर्मेंद्र उपाध्या

पिछले आठ साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

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