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विजय A L
लेखक - निर्देशक


आरोन पॉल
पटकथा


चिंतन गाँधी
संवाद


























Movie Review
तूतक तूतक तूतिया:प्रेम, पत्नी और प्रेतनी


प्रेम, पत्नी और प्रेतनी - तूतक तूतक तूतिया

काफी अर्से से देख रहा हूं कि दक्षिण के ज्यादातर फिल्मकारों का ध्यान समीक्षाओं में वाहवाही पाने से से ज्यादा दर्शकों के दिल में मनोरंजन की अलख जगाने का ज्यादा रहता है। मनोरंजन की कसक के साथ वे अपनी फिल्मों में इमोशन का एसा तड़का लगाते हैं कि दर्शक उनकी बनाई गई पगडंडी पर बिना शर्त दौड़े चले जाते हैं। दक्षिण के फिल्मकार विजय और लेखक पॉल आरोन (संवाद चिंतन गाँधी) की फिल्म तूतक तूतक तूतिया देखकर मन में कहीं ना कहीं ये सोच पैदा होने लगती है।  थोड़ा आश्चर्यचकित भी था कि बिना किसी बड़े प्रमोशन के रिलीज हुई तूतक तूतक तूतियां को देखने के लिए शनिवार को भी मुंबई के मल्टीप्लेक्सेज में भीड़ थी।

अभिनेता सोनू सूद की बतौर निर्माता पहली हिंदी फिल्म हैं, इसमें वे एक खास  किरदार में तो हैं पर फिल्म की कहानी का केंद्र प्रभुदेवा और तमन्ना भाटिया ही हैं। फिल्म के किरदार और परिस्थितियिों पर थोड़ी और मेहनत होती तो ये फिल्म और ज्यादा लोगों के दिलों को छूने वाली बन सकती थी। लेकिन बतौर दर्शक ये फिल्म आपको अंत तक बांधे रखती है। 

 फिल्म की कहानी पर गौर करें तो ये कहानी है दक्षिण के 34 वर्षीय कृष्णा (प्रभुदेवा) की जो मुबंई की मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता है। अभी तक कुंवारा हैं सिर्फ इसलिए क्योंकि उसकी तमन्ना है कि वो ऐसी लड़की से शादी करें जो बेहद मॉर्डन हो, जो अच्छी अंग्रेजी में बात कर सकती हो वगैरह वगैरह ।  लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। सो उसके अरमानों पर पानी फिर जाता हैं जब कृष्णा अचानक गांव आगमन पर उसके घरवाले उसके फेरे गांव में गाय चराने वाली देवी (तमन्ना भाटिया) के  साथ करा देते हैं।

वो मुंबई अपनी पत्नी के साथ वापिस लौटता हैं पर अपनी शादी की बात को छिपाता है। लेकनि मुंबई के जिस घर में दौनों पति पत्नी रहने के लिए जाते हैं वहां पर किसी ऐक्ट्रेस रूबी की रूह मौजूद होती हैं जो देवी के शरीर को ग्रहण कर लेती हैं। बस यहीं से शुरू होता है एक पति का अपनी पत्नी के लिए परेशान होना और परिस्थितियों में लेखक निर्देशक दर्शकों को अपने अंदाज में बांधते हैं। कहानी हास्यजन्यपरिस्थितियों के साथ एक भावुक अंत पर खत्म होती है। 

एक्ट्रेस रूबी के प्रेत और फिल्म को देखकर एकबारगी विजयदान देथा की कहानी पर बनी (मणि कॉल की ‘दुविधा’ तो नहीं) पर अमोल पालेकर की - शाहरूख अभिनीत फ़िल्म ‘पहेली’ की याद ताजा हो जाती है । खासकर इस फिल्म को प्रभुदेवा के अभिनय के लिए देखा जा सकता हैं। पहली बार इस फिल्म में प्रभुदेवा पूरी तरह बतौर एक्टर खुलकर उभरते हैं। इससे पहले ए बी सीडी में वे डांस इंस्ट्रक्टर के रूप में नजर आए पर वे यहां एक खालिस प्रेमी की भूमिका में ना केवल नजर आए हैं बल्कि उन्होंने इस किरदार को अपनी टूटी फूटी हिंदी में अच्छा मुकाम दिया है। इस फिल्म में उनके निभाए कृष्णा के किरदार की जमीं दक्षिण भारत होने की वजह से उनके संवाद दर्शकों को बिलकुल खलते नहीं हैं। तमन्ना भाटिया ने भी रूबी और देवी के स्वरूपों को अपने अभिनय से खूब संवारा है। और हां, इस फिल्म में अभिनेता मुरली शर्मा की भी तारीफ करनी पड़ेगी वो अपने संवादों से दर्शकों को खूब गुदगुदाते हैं।

फिल्म के लेखक चेतन गांधी ने गाहे बगाहे दक्षिण भारत के लोगों को हिंदी के तरफ आकृष्ट करने के मजेदार क्षण रचे हैं। ऐसा करके वे खुद को हिंदी सेवी के रूप में स्थापित करते हैं। फिल्म का क्लाइमेक्स दर्शकों को बांधता हैं लेकिन कुछ परिस्थितियां निरंतर फिल्म देखने वाले दर्शकों को परेशान कर सकती हैं। मसलन ऐक्ट्रेस रूबी के पास फोन नहीं होना और राज खन्ना का रूबी से बात करने के लिए उसके मैनेजर को फोन करना, देवी का घर आना और उसे पता ही नहीं चलना कि वो आखिर इतने समय तक कहां रहीं। फिल्म का संपादन और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म को सीन दर सीन निखारता है। फिल्म का शीर्षक थोड़ा अटपटा जरूर लगता है पर ये एक फिल्मी गाने का हिस्सा होने से हिंदी सिनेप्रेमियों की जुबान पर चढा हुआ है।  

कहना गलत नहीं होगा कि अगर थोड़ी देर के लिए तर्को से परे सोचें तो ये फिल्म फुल टाइम मनोरंजन करती है। अगर आप अपनी पत्नी के साथ फिल्म देखने जा रहे हैं तो जरूर देखके आइएगा आप बोर बिल्कुल नहीं होंगे।

 धर्मेंद्र उपाध्याय   



   धर्मेन्द्र उपाध्य

पिछले आठ साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

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