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M S Dhoni
The Untold Story


नीरज पाण्डेय
लेखक - निर्देशक


दिलीप झा
पटकथा - संवाद


























Movie Review
M S Dhoni The Untold Story:सपनों के संघर्ष और धोनी की धुन


सपनों के संघर्ष और धोनी की धुन

कुछ लोगों की जिंदगी जब किवदंती बन जाती हैं तो फिर उसमें किस्सागोई ढूंढ़ना बड़ा मुश्किल काम होता है लेकिन एम एस धोनी- ए अनटोल्ड स्टोरी को देखते हुए,  कई नई बातों का पता चलना इस फिल्म की सार्थकता की गवाही देता है।  फिल्म देखते हुए ऐसा लगता है मानो हम किसी अंजान मध्यमवर्गीय लड़के की कहानी देख रहे हैं जो अपने पिता से अभी तक डर रहा है, अपने हुनर पर विश्वास होते हुए भी इस बात से गमगीन है कि उसका भविष्य क्या होगा। ये फिल्म हमें रोमांचित करती है सिर्फ इसलिए नहीं कि ये क्रिकेटर धोनी की कहानी है, इसलिए भी कि ये सच्चाई के साथ बनाई गई फिल्म हैं जिसमें निर्देशक नीरज पांडे समीक्षकों को कोई लूज पॉइंट निकालने के अवसर नहीं देते क्योंकि वो अपने किरदारों से बेहद गहराई से जुड़े हैं। लेखक-निर्देशक नीरज पांडे और सहलेखक दिलीप झा की फिल्म को दर्शकों का बेहद प्यार मिल रहा है, नीरज पांडे अपने मकसद में कामयाब हुए।

अगर फिल्म की स्टोरी पर चर्चा करें तो ये सीन दर सीन रोमांचित करने वाली फिल्म नहीं है फिर भी कब तीन घंटे सिनेमाघरों में बिना बोर हुए बैठ गए ये पता ही नहीं चलता है। नीरज पांडे ने धोनी की जिंदगी से कुछ किरदारों और घटनाक्रमों को निकाल उसे एक कथासूत्र में पिरोया है। और ये छह्वोटे छह्वोटे किरदार अंत तक चलते हैं। उन्होंये ये भी ध्यान रखा हैं कि सार सार छूटे ना और थोथी बातों से दूर रहा जाए।

ज़ाहिर है कि यह एक जीवनचलचित्र (बायोपिक) है जिसमे भारतीय क्रिकेट टीम एक सफलतम बल्लेबाज़ महेंद्र सिंह धोनी की ज़िन्दगी को बचपन से लेकर, उन्होंने अपने करियर में हासिल किये हुए ऊँचे मक़ाम तक screen पर उतरा है. इसमें धोनी के बचपन की शरारत, जवानी का पहला प्यार उसकी tragedy, धोनी का मुह्फत मिजाज़ हर पहलु हर मक़ाम को मनोरंजक तरीके से परोसा गया है जो काफ़ी हद तक दर्शकों द्वारा सराहा जा रहा है.   

क्रिकेट में विकेट कीपिंग का गौण दर्ज़ा, स्पर्धा की होड़ा-होड़, धोनी और उनके पिताके बीच का संघर्ष, जैसे conflict, कहानी को dramatize करने में बहुत मदद करते है.

युवराज और सहवाग के साथ की घटनाएँ धोनी के चरित्र की दूसरी बाजु पर भी प्रकाश डालती है, जो कि ऐसी फ़िल्मों के लिए बहुत अहम है. 
फिल्म की खास बात ये है कि इसमें धोनी को महान व्यक्तित्व बनाए जाने की बजाय संघर्षों से जूझते एक व्यक्तित्व के रूप में दिखाया गया है। कही कही ये संघर्ष बड़े हलके-फुल्के में भी दिखाया गया है जो फ़िल्म को बहुत गंभीर होने से बचता है. मसलन पाकिस्तान में धोनी के बल्ले ने धूम मचा दी है लेकिन उसके फोन का बैलेंस समाप्त हो गया है औेर वो अपनी प्रेमिका से बात करने के लिए बेचैन है।

इस तरह धोनी की जिंदगी में आए बहुत सारे रोमांचक क्षणों के साथ, खासकर विश्व कप की जीत के साथ ये फिल्म खत्म होती है।

फिल्म में शीर्षक भूमिका निभाने वाले सुशांत राजपूत के साथ अनुपम खेर, राजेश शर्मा और अन्य यार दोस्तों के किरदार फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रखते हैं।     

फिल्म का गीत ,संगीत कर्णप्रिय है। गीतकार मनोज मुंतशिर ने फिल्म के सब्जेक्ट को ध्यान में रखते हुए अच्छे शब्द शिल्प रचे हैं।

ये फिल्म युवा पीढी को एक सीख देती है कि या तो सपने देखो मत अगर सपने देखें हैं तो जब तक पूरे नहीं होते उन्हें ही अपना सब कुछ मानो। हो सकता है कि आप क्रिकेट प्रेमी नहीं हों तो भी ये फिल्म जरूर देखें क्योंकि इससे आपको कुछ ना कुछ सीखने को जरूर मिलेगा।  

 



   Dharmendra Upadhyay

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

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