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पार्च्ड
मर्द को इंसान बनने की सलाह


























Movie Review
पार्च्ड:मर्द को इंसान बनने की सलाह


 

निर्माता : अजय देवगन,   लीना यादव

 

लेखन-निर्देशक : लीना यादव

 

कलाकार : तनिष्ठा चटर्जी, राधिका आप्टे, सुरवीन चावला, सुमित व्यास, अदिल हुसैन, लहर खान

 

आज कल हिन्दी सिनेमा स्त्री विमर्श के दौर गुजर रहा है। पिछले हफ्ते रिलीज हुई फिल्म पिंक और अब पार्च्ड, दोनों ही फिल्मों के केंद्र में नायिकायें हैं और निशाने पर है मर्दवादी सोच। दोनों में फर्क सिर्फ पृष्टभूमि का है। दिल्ली के रंग में रंगी पिंक इंडिया की कहानी कहती तो पार्च्ड का कैमरा हमें उस भारत का दर्शन करता है, जो कभी बदला ही नहीं। मोबाइल, टीवी, सिनेमा और इन्टरनेट जैसे तमाम साधन यहां बदलाव की सुगबुगाहट तक पैदा नहीं कर सके। निर्देशक लीना यादव अपने फिल्म के माध्यम से स्त्री-पुरुष सम्बन्धों और औरत के अस्तित्व को लेकर कई बड़े सवाल किए हैं।

फिल्म के एक शुरुआती दृश्य में गाँव की पंचायत एक लड़की को जबरन उसके ससुराल जाने का फैसला सुनाती है। लड़की विरोध करती है कि वह किसी भी कीमत पर ससुराल नहीं जाएगी पर उसकी बात कोई नहीं सुनता.... तब वह अपनी माँ को अपना दुख सुनती है, ‘अम्मा मेरा पति किसी लायक नहीं है। वह मुझे छूता तक नहीं। मेरा देवर मेरे साथ ज़बरदस्ती करता है, यहां तक की मेरा ससुर भी .....क्या-क्या होता है तेरी छोरी के साथ सुनेगी’…. पर उस लड़की की बात कोई नहीं सुनता। माँ बेटी का दर्द सुन कर भी चुप्पी साध लेती है और सम्मान के खातिर लोग उसे ससुराल भेज देते हैं। यह दृश्य आता है और तेजी से आँखों के सामने से गुजर जाता है। आगे की कहानी इससे प्रभावित नहीं होती पर कुछ सेकेंड में यह दृश्य पूरी फिल्म का निचोड़ दर्शकों के सामने रख देते है। बेटी के दर्द पर माँ की भयानक चुप्पी और पिता का रवैया कचोटता है.... मन में सवाल आते हैं कि ऐसा क्यों है ? क्यों सपने, आजादी और ख्वाहिश जैसे शब्द औरतों के हिस्से में नहीं आ पाते। लीना यादव  अपने फिल्म के माध्यम से इन सवालों का जवाब ढूँढने की कोशिश करती हैं।

कहानी तीन औरतों से शुरू होती है। इसी समाज का अंग होने के बावजूद ये औरतें बाकियों से अलग हैं। ये  सिर्फ   अपने मन की सुनती हैं। रानी (तनिष्ठा चटर्जी), लाजो (राधिका आप्टे) और बिजली (सुरवीन चावला)। रानी विधवा है, लाजो को बच्चा नहीं हो रहा और बिजली एक नाचने वाली है। इन तीन किरदारों के सहारे लीना ने समाज, विवाह, मर्द-औरत और सेक्स जैसी समस्याओं को उठाया है। फिल्म हर मोड पर यह सवाल करती है कि जो चीज मर्द के लिए मर्दानगी साबित करने की निशानी है वही चीज औरत के शर्म का विषय क्यों है? रानी अपने 17 वर्षीय बेटे गुलाब की शादी जानकी से कराती है। पर जानकी गुलाब को पसंद नहीं आती। दोस्तों की संगत में वह भी उसी समाज और सोच का हिस्सा बन जाता है, जो उसकी माँ के उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार हैं। फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि फिल्म सिर्फ समस्याओं को उजागर भर नहीं करती, बल्कि समाधान की तरफ भी इशारा करती है। महिलाओं को खुद आगे बढ़ कर अपनी जिंदगी जीने और अपनी चाहत को अपनाने की सलाह देती है। फिल्म के क्लाइमेक्स में ये औरतें समस्याओं पर आंसू बहाने की बजाय खुद अपना रास्ता ढूंढती हैं।

लीना ने किशन (सुमित व्यास) के बहाने पुरुषवादी सोच का नया नजीरिया भी दिखाया है। अंतर जातिय विवाह करने वाला किशन गाँव की महिलाओं के साथ लघु उद्योग चलाता है। विचारों से प्रगतिशील किशन समाज की सामंती सोच का विरोध करता है और गाँव के मर्दों के निशाना पर रहता है। यानि यह जरूरी नहीं है कि मर्दवादी रवैया सिर्फ महिलाओं के लिए ही खतरनाक है। समानता की सोच रखने वाले पुरुषों के लिए भी यह विचारधारा दुश्मन सरिख है। फिल्म के अंत में रानी अपने बेटे से कहती है ‘मर्द बनने से पहले तू इंसान बनाना सीख’.... दरअसल यह वाक्य ही पूरे फिल्म का केंद्र बिन्दु है, जिसे लीना ने बहुत सहज अंदाज में कहा है। स्क्रिप्ट की बुनावट इतनी शानदार है कि बेहद गंभीर बात को भी यहां बहुत सहजता से कह दिया गया है। फिल्म के कई दृश्यों में न्यूड सीन हैं पर स्क्रिप्ट और सीनोमेटोग्राफी के कुशलता की वजह से कहीं भी अश्लीलता नजर नहीं आती। निश्चित तौर पर इसके लिए हॉलीवुड फिल्म 'टाइटैनिक' के लिए अकैडमी अवॉर्ड जीतने वाले सिनेमैटोग्राफर रसेल कारपेंटर बधाई के पात्र हैं। अभियान के मामले में भी फिल्म बहुत प्रभावित करती है। तनिष्ठा चटर्जी, राधिका आप्टे और सुरवीन चावला के साथ जानकी के रूप में लहर खान का अभिनय भी बहुत दमदार है। वहीं छोटे से रोल में आदिल हुसैन और सुमित व्यास भी बहुत ही प्रभावी ढंग से पर्दे पर अपनी उपस्थिती दर्ज कराते हैं।  



   रुद्रभानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं। .

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