1
 


राज़ रिबूट
आ भी जाओ, राज से बाज


विक्रम भट्ट
पटकथा एवं निर्देशन


गिरीश धमीजा
संवाद


























Movie Review
राज़ रिबूट:आ भी जाओ, राज से बाज


अब आ भी जाओ, राज से बाज

 इसमें कोई दोराय नही है कि विशेष फिल्मस के फिल्मी ब्रांड राज ने इस बैनर को नई पीढी के बीच एक समय नई पहचान दी थी और भट्ट् कैंप ने भी इसे भुनाते हुए राज 2 , और राज 3 का निर्माण किया. फिल्मों का निर्देशन क्रमश: मोहित सूरी और विक्रम भट्ट् ने किया लेकिन इस बार एक नई जोड़ी गौरव ओरारा और कृति खरबंदा के साथ राज रीबूट का निर्माण ऐसा लगता है मानो इस बैनर ने ब्रांड को भुनाने के लिेहाज से एक और राज का निर्माण किया है। लेखक निर्देशक विक्रम भट्ट और संवाद लेखक गिरीश धामीजा की फिल्म राज रीबूट निराश करती हैं। ना तो फिल्म का संगीत ही कोई खास है और ना ही इस फिल्म में ऐसी कहानी है जो दर्शकों के बीच आकर्षण का केंद्र बने।

‘पति पत्नी और वो के रूप में एक भटकती आत्मा’ के इस फ़ॉर्मूले का राज़ भी आम फ़िल्मों की तरह उसकी लिखाई में ही छुपा है. राज 3 में विक्रम भट्ट् ने काला जादू के एसेंस को अपने अनुभवों के साथ मिलाया तो बॉक्स ऑफिस पर खुश्बू भी फैली थी । लेकिन यहां पर ‘राज़’ का फ़ॉर्मूला काम करता नहीं दिखाई देता।

फिल्म की कहानी के मुताबिक, रेहान(गौरव अरोरा) और साइना (कृति खरबंदा) पति पत्नी है जो मुंबई से रोमानिया में सैटल हुए हैं। रोमानिया में रेहान का अच्छा जॉब है लेकिन यहां पर घर में उसकी पत्नी के साथ अप्रत्याशित घटनाएं घटने लगती हैं।

पहली राज की तर्ज पर यहां भी पति पत्नी से कुछ छुपा रहा है। हर दूसरी फ़िल्म की तरह  रेहान अपनी पत्नी के साथ घटने वाली घटनाओं को लेकर किसी त्रिलोक शास्त्री से मिलते हैं ।  जो ‘as usual’ परालौकिक शक्तियों पर रिसर्च कर रहा है। वह उन्हें वही बताता हैं कि साइना पर किसी बुरी आत्मा का साया है। इसी बीच एक रहस्यमय किरदार आदित्य (इमरान हाशमी) का कहानी में आगमन होता है। घिसे पिटे घटनाक्रमों के बाद एक पति के अपनी पत्नी को प्रेत से बचाने के साथ ही कथा का पटाक्षेप होता है।

विक्रम भट्ट ने फिल्म के अंत को आध्यात्मिक रंग देकर उसे कसने की कोशिशि की है लेकिन किरदारों की परिस्थितियां उनकी ही फिल्म 1920 की याद दिलाती है। फिल्म में इमरान हाशमी के किरदार को गढा नहीं गया है खासकर फिल्म का स्क्रीनप्ले बेहद कमजोर है। कहानी की शुरुआत में ही नायक नायिका से झगड़ने लग जाता है।  अरे भाई अगर अंत में एक पति को अपनी पत्नी के लिए जान की बाजी लगाते हुए दिखाना है तो दो चार सीन तो उनकी केमिस्ट्री के रखो। ताकि दर्शकों को विश्वास हो जाए कि हां ये आदमी अपनी पत्नी के लिए हद से गुजर सकता है। विक्रम भट्ट की अधिकांश फिल्मों के संवाद लेखक रहे गिरीश धामीजा राज रीबूट में संवादों के जरिए कोई खास कमाल नहीं कर पाए हैं। कृति खकरबंदा स्क्रीन पर आकर्षक लगती हैं और अभिनय भी ठीक ठाक कर लेती हैं।

 सच कहूं तो विक्रम भट्ट को एक बार फिर से अपनी पिछली फिल्मों को देखने के साथ सोचना चाहिए कि क्या वो उस पीढी के लिए हॉरर फिल्म बना पा रहे हैं जो हॉलीवुड की फिल्मों को देखना पसंद करती है।

आज भी विद्यार्थी जीवन में देखी गई राज की यादें जेहन में बसी हैं। जब विक्रम भट्ट् पहली राज को ऊंटी में कंपलीट करके आए थे तो महेश भट्ट ने दैनिक भास्कर की सिने पत्रिका नवंरग में अपने कॉलम में फुटेज को देखकर लिखा था कि मुझे एक बहुत अच्छी फिल्म के आसार नजर आ रहे हैं। मैं विक्रम के काम से अभिभूत हूं...... । क्या महेश भट्ट् राज रीबूट को लेकर साफगोई के साथ ऐसा कह सकते हैं?

भट्ट् ग्रुप की फिल्मों में हॉट सीन की चाहत रख, सिनेमाघर की सीढिया चढने वाले दर्शकों को भी खासी निराशा होगी। कुल मिलाकर विशेष फिल्मस ने एक ब्रांड को रिपीट करने का असफल प्रयास किया है। जो उनकी साख में निश्चित बट्टा लगाएगा। 

 



   धर्मेन्द्र उपाध्य

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

Click here to Top