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फ्रीकी अली
BackSwing


सोहेल खान
Writer - Director


Raj Shandilya
Dialogue


























Movie Review
Freaky Ali:Stroke Play!


अमीरों के अखाड़े में गरीबी की घुसपैठ

असफलताएं सफलताओं की जननी होती हैं, वो हमारे जीवन में इसलिए आती हैं, ताकि हम अचानक से दिखी पगडंडियों से निकलने वाले राजमार्ग पर पहुंच सकें। फिल्म फ्रीकीअली अली की शुरूआत में ही ये विचार आपके दिल में कौंध सकता हैं। यूं मीडिया के जरिए जनता के बीच कॉमेडी कहानी के रूप में पेश की जा रही फिल्म दरअसल एक ऐसे इंसान की कहानी है जिसे उसकी नियति एक एसे मंच पर जा धकेलती है,  जिससे वो ज्यादा वाकिफ नहीं है पर खुद पर विश्वास और लगन से वो उस मंच से सबको वशीभूत कर लेता है।

सलमान खान फिल्मस द्वारा पह प्र्रस्तुत लेखक राज सांडिल्य और निर्देशक सोहेल खान की फिल्म फ्रीकीअली निम्न मध्यमवर्ग में पले एक अनाथ युवा अली की कहानी है,  जिसे सुलभा (सीमा विश्वास) ने पाल पोसकर बड़ा किया हैं। वो उसे अपनी आई (मां) कहता हैं और वो उसे सगे बेटे से भी ज्यादा प्यार करती है। अपना पेट पालने के लिए अली बाजार में चिल्ला चिल्लाकर अंडरगारमेंट्स बेचता है। पर उसका ये काम भी कुछ चल नहीं रहा है। एक गलती की वजह से उसे वहां से भी उसका सेठ रफा दफा कर देता है।

ऐसे में उसका एक गैंगस्टर दोस्त मकसूद(अरबाज खान) जो डेंजर भाई (निकेतन धीर) के लिए काम करता हैं, अली को भी अपने साथ हफता वसूली के धंधे से जोड़ लेता है। लेकिन यहां भी अली को काफी मार पड़ती है।

इसी दौरान एक दिन गोल्फ के मैदान में एक सेठ से हफता वसूलने के लिए गया अली अपने निशाने की डींग मार बैंठता हैं और दी गयी चुनौती पर एकदम खरा उतरता है। इसपर अली का पड़ौसी किशन चाचा (आरिफ बसरा) उसकी मां से कहकर अली को गोल्फ में अपना करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करता हैं।

यूं तो अली, गली कूंचें का एसा क्रिकेटर हैं जो चार गेंदों पर चार छक्के लगाने में समर्थ है पर वो इस गोल्फ की तकनीक से वाकिफ नहीं हैं। लेकिन वो किशन के साथ इस खेल में महारथ हासिल करने में जुट जाता है।  गोल्फ के कारण ही उसकी जिंदगी में नायिका का आगमन होता है जो उसके निशानों की परस्तार है। लेकिन अपनी प्रारंभिक सफलताओं के साथ वर्ग संघर्ष का शिकार होता है। चैंपियन गोल्फर राठौड़ (जस अरोरा) उसके मार्ग में रुकावट बनाता है। क्योंकि उसे अमीरों के अखाड़े में एक गरीब का सिक्का जमाना रास नहीं आता है। हल्के फुल्के नोंकझोंक के साथ फिल्म का सुखांत होता हैं।

कहानी लेखक तौर पर सौहेल खान भी एक वरिष्ठ फिल्म लेखक के बेटे होने का फर्ज अदा कर देते हैं, लेकिन वो कहानी का सटीक निर्देशन करने में बुरी तरह चूक जाते हैं।

दरअसल इस कहानी के लिए ऐेसे निर्देशक की जरूरत थी जो गंभीरता,  इमोशन के साथ दर्शकों के दिल में अली के लिए रोमांच पैदा कर सके।  खासकर गोल्फ के खेल से आम फिल्मी दर्शक वर्ग अंजान हैं। ऐसे में उनके पास ऐसे बहुत से दृष्यों की गुंजाइश थी जिससे कथ्य और निखकर सामने आता, लेकिन वो फिल्म प्रस्तुतिकरण के नाम पर उनकी फिल्म हैलो ब्रदर की याद दिला देते है। 

फिल्म के द्विअर्थी संवाद और अदायगी के कारण वे उनके अन्य किरदारों को भी पूरी तरह परिभाषित करने में चूक जाते है। फिल्म देखते समय लगता है कि सौहेल खान निर्देशक के रूप में शायद उन दर्शकों के लिए फिल्म बनाने की मंशा रखते हैं जिन्हें कोई द्विर्थी सैक्सी संवाद कान में पड़ते ही कहकहे लगाने का अवसर मिल जाता है। फिल्म के कई संवाद असरदार है पर निर्देशक की सोच के सामने संवाद लेखक राज सांडिल्य भी लाचार से नजर आते हैं।

अभिनय के नाम पर फिल्म नवाजुद्दीन सिद्दीकी के कंधों पर टिंकी है और उनके ही कारण ये फिल्म अंत तक देखने लायक बची रहती है। नवाज ने अपने अभिनय से हर सीन में दर्शकों को बांधे रखा है। बेशक ये फिल्म नवाज के प्रशंसकों के लिए एक तोहफा जरूर है,  जिसे उन्हें मिस नहीं करना चाहिए। 



   Dharmendra Upadhyay

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

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