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रुस्तम
खामियों पर भारी खूबियां


टीनू सुरेश देसाई
निर्देशक


























Movie Review
रुस्तम:खामियों पर भारी खूबियां


कलाकार: अक्षय कुमार, इलियाना डिक्रूज, ईशा गुप्ता, अर्जन बाजवा, पवन मल्होत्रा, कुमुद मिश्रा, परमीत सेठी, सचिन खेड़ेकर, ऊषा नडकर्णी,

निर्देशक: टीनू सुरेश देसाई

निर्माता: नीरज पांडे, अरुणा भाटिया, आकाश चावला, नितिन केनी

संगीत: अंकित तिवारी, जीत गांगुली, राघव सच्चर

लेखक : विपुल के. रावल

1959 के चर्चित नानावटी केस की कहानी और निर्देशक टीनू सुरेश देसाई की फ़िल्म ‘रुस्तम’ में साफ-साफ फर्क दिखता है.  नानावटी केस के बारे में अमूमन लोगों जितना पता है उसके आगे की कहानी निर्देशक टीनू सुरेश देसाई ने कहने की कोशिश की है. यह कहानी सिर्फ नानावटी केस के इर्द-गिर्द ही नहीं सिमटी है. इसमें एक ईमानदार-देशभक्त नेवी ऑफिसर है, एक अकेली और खूबसूरत पत्नी है, प्यार है, अवैध सम्बन्ध है, हत्या है, सस्पेंश है और इन सब से ज्यादा देशभक्ति का जबरदस्त जायका है साथ में मीडिया का तड़का भी है. कहानी सिर्फ नानावटी केस के मौलिक घटनाक्रम पर आगे नहीं बढ़ती बल्कि सिनेमेटिक लिबर्टी के नाम पर इसमें सेना में व्याप्त भ्रष्टाचार और मीडिया के लॉबिंग के खेल को भी दिखाया गया है.  

कहानी का कुछ अंश नानावटी से प्रभावित है. फ़िल्म में अक्षय कुमार ने नौसेना कमांडर रुस्तम पावरी की भूमिका निभाई है. जहाज पर एक लंबा वक्त बिताने के कुछ महीनों बाद जब रूस्तम घर आता है तो पाता चलता है कि उसकी पत्नी सिंथिया (इलीना डीक्रूज) घर पर नहीं है. वह दो दिनों से घर ही नहीं आई है. बाद में रुस्तम को पता चलता है कि सिंथिया का विक्रम नाम के एक व्यापारी के साथ अवैध सम्बन्ध है. विक्रम रूस्तम और उसकी पत्नी- दोनों का दोस्त है. इसके बाद रूस्तम अपने सर्विस रिवाल्वर से विक्रम की हत्या कर देता है. फिर थाने जाकर कह देता है कि उसने ऐसा किया. पर आगे चलकर वह अदालत में अपने को निर्दोष साबित करने की दलील देता है और अपना मुकदमा खुद लड़ता है, बिना किसी वकील के. नौसेना की वर्दी खूनी रुस्तम अपने को अदालत में निर्दोष साबित करने की लड़ाई लड़ता है और फ़िल्म अपने मुकाम पर पहुंचती है.

देशभक्ति और राष्ट्रवाद के जिस मुद्दे को लेकर आज देश में चर्चा का माहौल गर्म है उसका कुछ पुट रुस्तम में देखने को मिलता है. जब नानावती प्रकरण हुआ था तब ब्लिट्ज के तत्कालीन मालिक-संपादक रूसी करंजिया ने नानावती के पक्ष में अभियान चलाया था. उस प्रसंग की झलक फिल्म में भी है. यहां कुमुद मिश्रा ने ‘ट्रूथ’ नाम के जिस टेबलायड के मालिक-संपादक बिलमोरिया की भूमिका निभाई है वह करंजिया की भूमिका से मिलती जुलती है. अखबार रुस्तम को बचाने के लिए उसके पक्ष में ख़बरें प्रकाशित करता है और लोगों में रुस्तम के प्रति सहानभूति पैदा करने की कोशिश करता है. मौजूदा हालत में भी यह बात बेहद प्रासंगिक है. आज भी मीडिया को देशभक्ति और राष्ट्रवाद की परिभाषा तय करते हुए देखा जा सकता है.

फ़िल्म के स्क्रिप्ट के में कई खामियां नजर आती हैं, निर्देशक और लेखक ने इसे भले ही इसे सिनेमेटिक लिबर्टी मान लिया हो पर ये बातें अटपटी-सी लगाती हैं. जैस गिरफ्तारी के बाद रुस्तम पूरा समय पुलिस कस्टडी में ही क्यों बिताता है. नियम के अनुसार तो मुकदमा के दौरान उसे या तो जेल में होना चाहिए या जमानत पर बाहर. दूसरा रुस्तम को किसी भी प्रकार की तैयारी के लिए वक्त कब मिला. उसने आफिसर जेल में जाने से मना कर दिया, लेकिन वह हमेशा अपनी वर्दी में रहा. प्रीति का किरदार एक मौकापरस्त महिला का है, लेकिन न जाने क्यों वह हमेशा कुछ दिखाने को ‘उतारू’ सी रहती है. अदालत में उसका पहनावा ऐसा है, जैसे कि वह किसी पार्टी से आ रही हो. क्या प्रीति के पास इतना समय है कि वह अपने भाई की मौत की खबर सुनकर चटख रंग की लिपिस्टिक के साथ बाकायदा कपड़े बदल कर मौका-ए-वारदात पर पहुंचती है.   

करीब ढाई घंटे की इस फिल्म का लगभग 70 फीसदी हिस्सा कोर्टरूम में ही बितता है पर इन दृश्यों में कही भी बोरियत नजर नहीं आती. कहानी भागती जाती है और दर्शक उसके साथ जुड़ा रहता है. कोर्ट के दृश्यों को इतनी सहजता और सरलता से दिखाने के लिए लेखक निर्देशक की तारीफ की जानी चाहिए. निर्देशक ने बिना किसी लाग लपेट के फिल्म की गति पर अपना नियंत्रण बनाए रखा है, इसलिए ये फिल्म कहीं भी बोर नहीं करती, सोचने का मौका नहीं देता. लेकिन अक्षय कुमार का अभिनय इन सब से ऊपर है. उनका बेहद सधा हुआ अभिनय फ़िल्म के स्तर को नई ऊँचाई पर ले जाता है.    

निर्देशक ने फ़िल्म की डिटेलिंग पर विशेष ध्यान दिया है. 60 के दशक का माहौल दर्शाने के लिए आवश्यक साज-सज्जा और  कॉस्ट्यूम्स पर काफी मेहनत की गई है. फ़िल्म रुस्तम के बारे अंत में बस यही कहा जा सकता है कि स्क्रिप्ट की तमाम कमियों के बावजूद ‘रुस्तम’ एक मजेदार फिल्म है. लेखक-निर्देशक का नजरिया और अक्षय का साधा हुआ अभिनय फ़िल्म की तमाम कमियों को नजरंदाज करने के लिए प्रेरित करता है. 

 



   रूद्र भानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं।.

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