1
 


द लीजेंड ऑफ़ माइकल मिश्रा
खामियों का खजाना


मनीष झा
लेखक-निर्देशक


























Movie Review
द लीजेंड ऑफ़ माइकल मिश्रा:खामियों का खजाना


कलाकार: अरशद वारसी, बमन इरानी, अदिति राव हैदरी, कायोज इरानी, कुणाल शर्मा, यूरी सूरी

निर्देशक-पटकथा: मनीष झा

कहानी : मनीष झा, स्नेहा निहलानी, राधाकृष्णन

संवाद : अंशुमन चतुवेर्दी

माइकल मिश्रा ! पहली नजर में फिल्म का नाम बहुत पसंद आता है। पर यह जरूरी तो नहीं जो पहली नजर में पसंद आए वह अंत तक भी आता रहे... वैसे माइकल मिश्रा भी पूरी फिल्म में अलग-अलग ही नजर आते हैं। जी हां ये नजरों का धोखा नहीं है बल्कि दर्शकों के साथ धोखा है। पहले माइकल मिश्रा एक अपहरणकर्ता की तरह नजर आता है, थोड़ी देर बाद जोकर बन जाता है ... फिल्म खत्म होते-होते उसे इश्किया रोग लग जाता है और वह पागल प्रेमी बन जाते हैं। मिश्रा जी के अलग-अलग रूप देख कर फिल्म खत्म होने पर दर्शक भी बेवकूफ बन जाता है। माफ कीजिए मैं दर्शकों को बेवकूफ नहीं बोल रहा। मेरा इरादा ऐसा बिलकुल भी नहीं है पर निर्देशक फिल्म के लेखक-निर्देशक मनीष झा का इरादा तो मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा। भाई मेरा सवाल ये है कि आप दर्शकों को समझते क्या हैं...ये क्या मुंबई की लोकल है जो आपका हर बोझ बिना कुछ कहे बर्दाश्त कर लेगी... और कॉमडी फिल्म के नाम पर आप कुछ भी चला लेंगे... तर्क नाम की भी तो कोई चीज होती है इस दुनिया में। खैर छोड़िए चलिए अब कहानी सुनते हैं... 

 अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि कहानी माइकल मिश्रा यानि अरशद वारसी की है। पटना के रहने वाले मिश्रा जी बचपन की कुछ घटनाओं की वजह से शातिर अपराधी बन जाते हैं। निर्देशक की मेहरबानी से माइकल मिश्रा पूरी फिल्म में में भागते रहते हैं। बचपन से का भागते-भागते अचानक मिश्रा बड़ा हो जाता है। जाहिर है जब माइकल भागेगा तो पुलिस भी उसके पीछे भागेगी। इसी भाग-दौड़ में एक दिन माइकल एक लड़की से टकरा जाता है... अब प्यार तो होना ही है पर क्यों होता है यह जानना बड़ा दिलचस्प है। होता यूं है कि लड़की बड़े अलग अंदाज में हैलो बोलती है और माइकल का दिल डोल जाता है। कहानी आगे बढ़ती है और माइकल शातिर किडनैपर बन जाता है। अचानक एक दिन माइकल की नजर वर्षा शुक्ला (अदिति राव हैदरी) नामक युवती पर पड़ती है, जो उसका वही खोया हुआ प्यार है। दोनों एक-दूजे के करीब आ जाते हैं। लेकिन ये नजदीकियां वर्षा की चाची को बिल्कुल पसंद नहीं है। वर्षा, माइकल को सुधरने के लिए कहती है। माइकल खुद को पुलिस के हवाले कर देता है और अपने पिछले सारे कर्मों की सजा भुगतने के लिए तैयार हो जाता है। पर कहानी यही खत्म नहीं होती। इसके बाद भी दर्शकिन को जबरन काला पानी, जबर्दस्ती का इमोशन और बेवजह की बेवफाई का सामना करना पड़ता है।   

फिल्म की सबसे बड़ी कमी यह है कि निर्देशक ने एक साथ सबकुछ डाल कर फिल्म को हिट करने की कोशिश की है। इस वजह से फिल्म न तो रोमांटिक लगती न ही कॉमेडी....और रॉम-कॉम तो बिलकुल भी नहीं लगती। मोटे तौर पर कह सकते हैं कि निर्देशक और उनकी लेखन टीम ने माइकल मिश्रा जैसा मजाकिया किरदार और उसके अनूठी प्रेम कहानी को बिहारी टोन से भुनाने की कोशिश की है, लेकिन पूरी तरह से असफल रहे हैं। माइकल का किडनैपिंग धंधा और उनके चमचों का किरदार कई फिल्मों से मिलता जुलता है। यही नहीं कहानी इतनी उलझी हुई है कि समझ ही नहीं आता कि आखिर निर्देशक दिखाना क्या चाहता है। अगर माइकल को जेल से भागना ही था तो वह पुलिस के पास गया ही क्यों था। पश्चाताप और प्रायश्चित के फर्क को लंबे-चौड़े भाषण से समझाने की क्या जरूरत थी।

फिल्म के आखिरी सीन में मंदिर में घंटा बजाते-बजाते माइकल के हाथों से खून बहने लगता है और उसे वर्षा की खबर उस अखबार से पता चलती है, जिसमें उसका खाना लिपटा हुआ था। यह दृश्य बॉलीवुड में कम से कम 100 दफा फिल्माया जा चुका होगा। कहने का अर्थ यह है कि निर्देशक मनीष झा खुद बिहार के रहने वाले हैं फिर भी उनकी फिल्म में बिहार की रंगत नहीं है। एक देशी बिहारीपन को कहने और गढ़ने में वे पूरी तरह से असफल रहे हैं। स्क्रिप्ट इतनी कमजोर है कि अरशद वारसी की पूरी कोशिश के बावजूद बस कहीं-कहीं ही हंसी आती है लेकिन दर्शक फिल्म से अपने आप को जोड़ नहीं पाते। बता दें कि मनीष इससे पहले मातृभूमि और अनवर जैसी कुछ अच्छी फिल्में बना चुके हैं। पर इस बार उन्होंने क्या बनाया है वही जाने। फिल्म में कहानी का दबाव इतना ज्यादा है कि किरदारों के अभिनय पर ध्यान ही नहीं जाता। अगर ध्यान लगाने की कोशिश की जाती है तो बस खामियां ही खामियां नजर आती हैं। अरशद का अभिनय इन खामियां के पीछे ही छुप जाता है।

 



   रुद्रभानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं। .

Click here to Top