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बुधिया - बोर्न तो रन
बुधिया की बाधा दौड़


सौमेंद्र पाधी
लेखक - निर्देशक


बुधिया सिंह
रियल लाइफ


























Movie Review
बुधिया - बोर्न टू रन:120m Hurdle Race


 बुधिया - बोर्न टू रन                

          सियासती दांवपेच के साए में बुधिया का असीमित साहस

लगभग एक दशक पहिले उड़ीसा के बुधिया नामक बच्चे ने देश विदेश तक अपना साधारण सा नाम गुंजायमान दिया। हमने उसे एक मासूम धावक के रूप में जाना लेकिन देश के अधिकांश लोग उसके बचपन, पारिवारिक और देशकालीन परिस्थितियों से वाकिफ नहीं हुए। लेकिन एक दशक बाद लेखक निर्देशक सोमेंद्र पाढी फिल्म बुधिया सिंह- बॉर्न टू रन के जरिए दुनियां के सामने बुधिया की कथा रखते हैं। अगर सीधे तौर पर देखा जाए तो ये बुधिया की कथा है लेकिन निर्देशक ने साथ में बुधिया को धावक बनाने वाले उसके कोच विरंचीदास की कहानी को भी सामने रखा है। कई बार इतिहास उनकी उनकी चर्चा करता है जिन्होंने अकल्पनीय कार्य किया हो लेकिन उस कार्य को करवाने की पीछे छुपी प्रेरणा को हम नजरअंदाज कर देते हैं।  इस कड़ी में बुधिया- बॉर्न टू रन,  धावक बुधिया  के कारनामों के साथ उसके जुनूनी कोच विरंचीदास के संघर्ष को दर्शकों के समक्ष रखती है। 

कहानी के मुताबिक बुधिया(मयूर पटेल) एक गरीब बस्ती का बच्चा है। जिसे उसकी मां मजबूरी में आकर आठ सौ रुपए में बेच देती है।  ऐसे में झोंपड़पट्टी के करीब ही अपना जूड़ो स्कूल चलाने वाले कोच विंरचीदास (मनोज बाजपेयी) की नजर उस पर पड़ती है। जो पहले से ही करीब 22 बच्चों को अपने घर पर रखकर उन्हें पढ़ाता लिखाता है। वह मजबूरी में बेच दिए गए बच्चे बुधिया को ना केवल छुड़ाता है बल्कि उसकी मां से पूछकर उसे अपने घर पर शरण देता है।  लेकिन बच्चे के आक्रामक स्वभाव से वह परेशान है। इसलिए उसे एक दिन सजा के तौर पर वह ग्राउंड के चक्कर मारने की कहकर अपनी पत्नी के साथ चला जाता है। विंरचीदास काफी समय बादा घर लौटता है तो देखता है कि बुधिया अभी तक उसके आदेशानुसार मैदान में चक्कर  लगा रहा है। इतनी देर तक बुधिया के दौड़ने की बात सुन वह उसकी स्टेमिना से चकित हो जाता है। फिर शुरू होती हैं बुधिया की ट्रेनिंग।

इस ट्रेनिंग में हम देखते हैं कि विरंचीदास किन मुसीबतों में एक अबोध बच्चे में खुद के जज्बे को स्थापित कर देते है । विरंचीदास अपनी मेहनत और संघर्ष के दम पर अबोध धावक को जनता के सामने खड़ा कर देते है ।

 लेकिन बुधिया की शुरूआती सफलताओं से, मीडिया में उसके असीमित साहस के चर्चों के साथ ही सियासती दांवपेच शुरू हो जाता है। बुधिया दौड़ना चाहता है पर राज्य बाल विकास विभाग पांच साला के बुधिया के दौड़ने पर आपत्ति ज़ाहिर करता हैं। इस तरह कहानी बुधिया को एक धावक बनाने के ट्रैक में कोच विंरचीदासा को आने वाली बाधाओ की कहानी है बुधिया बोर्न टू रन।

बुधिया की भूमिका में बाल कलाकार मयूर को बहुत कुछ बोलने का अवसर नहीं मिला हैं पर उसकी कास्टिंग बहुत अच्छी है। पर्दे पर देखते ही दर्शकों को ये कलाकार बुधिया लगता है। अगर दूसरे लिहाज से देखा जाए तो ये मनोज वाजपेयी की फिल्म है। मनोज वाजपेयी अपने अभिनय की खास छाप छोड़ते हैं, खासकर उन दृष्यों में जब वो हैरान परेशान और सरकार के सताए हुए होते हैं। लेकिन पटकथा और प्रस्तुतिकरण से फिल्म अपने संपूर्ण प्रभाव में थोड़ा निराश करती है ।

किसी भी सच्ची घटना पर फिल्म को बनाते समय फीचर स्वरूप में ढालने पर स्टोरी में कई एलीमेंट्स जोडऩे होते हैं लेकिन इस लिहाज से फिल्म का प्रस्तुतकिरण डॉक्यूड्रामा जैसा दिखता है। फिल्म में कई गीत हैं जो दृष्यावली के बीच में आते हुए दर्शकों के सामने फिल्म के विषय को रखते हैं। लेखक-निर्देशक बुधिया के कम उम्र में असीमित साहस के लिए उसे अवतार की तरह दिखाना चाहते हैं , कि देव भूमि पुरी में पैदा हुए इस बालक में जगन्नाथ का अंश हैं लेकिन सटीक संकेतों के अभाव में वे इस उद्देश्य को प्रभावशाली नहीं बना पाते हैं। जिससे दर्शकों के दिल में में कहीं ना कहीं कोच विरंचीदास के प्रति भी एक महीन गुस्सा पैदा होता है। साथ ही वे अपने नायक विरंचीदास के सत्ता में आने की घोषणा से पैदा हुए नकारात्मक प्रभाव से बचा नहीं पाते । फिल्म थोड़ी बिखरती हुई पर दर्शकों को गमगीन कर जाती है। 

अगर परिवारिक दर्शक है तो वीकेंड में अपने बच्चों के साथ फिल्म देखने जा सकते हैं। शायद वे इस फिल्म में प्यार दुलार से बढ़ रहे अपने बचपन को ना देख पाएं। लेकिन वो एक ऐसे बचपन को जरुर देख पाएंगे जिसने अपनी अबोध सफलताओं की नींव, हौसलाफजाई के आगोश में नहीं बल्कि अभाव, फटकार और डर के साए रखी।

धर्मेंद्र उपाध्याय      



   Dharmendra Upadhyay

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

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