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ढिशुम
सिर्फ फिल्म देखना,दिमाग मत लगाना


रोहित धवन
लेखक-निर्देशक


























Movie Review
ढिशुम:दिमाग की दही


निर्माताः साजिद नाडियाडवाला

निर्देशकः रोहित धवन

सितारेः जॉन अब्राहम, वरुण धवन, जैकलीन फर्नांडिस, साकिब सलीम, अक्षय खन्ना, राहुल देव

दिशूम का पंच पड़ते ही, हिंदी बॉलीवुडी फ़िल्मों के बारे में एक बहुत पुराने ख़याल की नानी याद आ जाती है कि फिल्म देखने से पहले दिमाग को घर पर ही छोड़ दें। थियेटर में दिशूम के १२४ मिनट के अंतराल में यह मनहूस ख़याल १२४ दफा से ज्यादा बार आया कि काश....!  
हालांकि जब फिल्म का पहला लुक जारी हुआ था तब जॉन के डोले-शोले और फिल्म का नाम देख कर यही लगा था कि फिल्म एक्शन और स्टंट से भरपूर होगी। पर फिल्म में एक्शन के साथ-साथ कॉमेडी का तड़का भी है और वो इतना ज्यादा है कि आखिर तड़का ही दिमाग पर छाया रह जाता है। निर्देशक रोहित धवन अपने फिल्म में एक ऐसी दुनिया का दर्शन कराते हैं जहां तर्क की बात करना बेमानी-सा लगता है।

फिल्म की कहानी बड़े ही रहस्यमयी तरीके से शुरू होती है। एक वीडियो टेप के जरिये एक आतंकी विदेश मंत्रालय को धमकी देता है कि उसने भारत के मुख्य बल्लेबाज विराज शर्मा का अपहरण कर लिया है। अगर भारत बिना विराज शर्मा के पाकिस्तान के साथ होने वाला फाइनल मुक़ाबला नहीं खेलता है तो वह विराज को मार देगा। मैच शुरू होने में लगभग 36 घंटे का समय है। फिल्म में 36 घंटे का एक मिशन दिखाया गया है, जिसके अंदर ही इन्हें विराज को बचाना है। मिशन को पूरा करने के लिए भारत से ऑफिसर कबीर (जॉन अब्राहम) को जिम्मेदारी सौंपी जाती है कि वह विराज को ढूंढ कर लाए। मिडिल ईस्ट में कबीर की इस मिशन में मदद करता है जुनैद (वरुण धवन)। कहानी को रोमांचक बनाने के लिए फिल्म में लगातार चलती एक घड़ी भी दिखाई गई है जिससे दर्शकों को भी रोमांच महसूस हो। पर दर्शकों को रोमांच से ज्यादा कॉमेडी में मज़ा आता है। फिल्म की कहानी में हालांकि दम नहीं है, लेकिन लोकेशन, कॉमेडी और फनी संवाद फिल्म को बांधे रखती है। क्रिकेट, सट्टा, आतंकवाद, पाकिस्तान और मिडिल ईस्ट पहली नजर में तो भाते हैं, लेकिन सीन दर सीन कई जगह रोचकता का अभाव भी झलकता है। दरअसल रोहित ने एक फूल कॉमेडी फिल्म में ज़बरदस्ती एक्शन,स्टंटबाजी और रोमांच घुसेड़ दिया है। फिल्म अपने कॉमिक किरदारों की बदौलत दर्शकों का मनोरंजन करने में सक्षम है।  

रोहित धवन और तुषार हीरानंदानी की कहानी और स्क्रीनप्ले बहुत बड़े-बड़े छेद हैं। इतने बड़े की हाथी और ट्रक एक साथ इसमें से निकाल जाए। सबसे बड़ी बात कबीर और जुनैद के पास पूरे मामले को सुलझाने के लिए सिर्फ 36 घंटे हैं पर इस 36 घंटे के जरूरी मिशन के बीच जॉन और वरुण को अंडरवियर में पोज देने और गाना गाने का भी वक्त मिल जाता है। दोनों अपने ही स्टाइल में मामले की जांच करते हैं। इनकी पड़ताल में जरा-सा भी पुलिसिया अंदाज या रोमांच नहीं दिखाता जो दर्शकों इस जांच से जोड़ सके। दरअसल, 'फन एलिमेंट' के चक्कर में निर्देशक-लेखक 'थ्रिल' वाली बात भूल गए। इसके अलावा यह बात भी नहीं पचती कि पूरी फिल्म में बेहद शातिरना अंदाजा में दोनों के हाथ से आसानी से बच निकलने वाला वाघा अचानक एक हास्यास्पद ढंग से कबीर-जुनैद के सामने क्यों आ जाता है?

 अपनी तमाम कमियों के बावजूद फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि फिल्म कहनी भी दर्शकों को बोर नहीं होने देती। कई जगह बातें उल-जुलूल और तर्क से परे हैं पर मनोरंजक हैं। फिल्म की गति तेज है जॉन और वरुण जोड़ी दर्शकों को पसंद आती है। पर इस दोनों की जोड़ी और कॉमिक टाइमिंग में कुछ नया नजर नहीं आता। दोनों को देख कर धूम फिल्म में अभिषेक बच्चन और उदय चोपड़ा की याद आती है। वरुण धवन की अभिनय बार-बार गोविंदा की याद दिलाता है। निर्देशक के रूप में रोहित धवन का ध्यान कॉमेडी की तरफ ज्यादा है। अपने पिता की तरह उन्होंने ने भी दर्शकों की मनोरंजन विशेष ध्यान दिया है।   

इस फिल्म में अभिनेत्रियों के लिए कोई खास गुंजाइश नहीं है। जकैलिन फर्नाडिस के पास एक आइटम सॉन्ग और हीरो को लुभाने के अलावा ज्यादा कुछ करने को नहीं है। विलेन वाघा के रूप में अक्षय खन्ना ने लंबे समय बाद वापसी की है। हालांकि उनके अभिनय में दम नजर आया है। इसके अलावा विदेश मंत्री के किरदार में मोना अंबेगांवकर ने भी पर्दे पर अपना प्रभाव छोड़ा है।   

 

 



   रुद्रभानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं। .

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