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कबाली
सुपरस्टार का जादू


पा. रंजीथ
लेखक-निर्देशक


























Movie Review
कबाली:लार्जर देन लाइफ


 सितारे : रजनीकांत, राधिका आप्टे, धंसिका, दिनेश रवि, जाॠन विजय, किशोर, विन्सटन चाओ

निर्देशक : पा. रंजीथ

निर्माता : कलाइपुलि एस. थनु

संगीत : संतोष नारायण

फिल्म कबाली को एक समीक्षक की नजर लिखना आसान काम नहीं है। खास कर ऐसे वक्त में जब फिल्म ने रिलीज होने से पहले ही कमाई के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं....दर्शकों पर रजनी फीवर हावी है...बॉक्स ऑफिस के सभी नियम भरभरा के बिखर गए हैं और सुबह के 3 बजे से लेकर रात के अंतिम शो तक कहीं भी टिकट उपलब्ध नहीं है। हर शो डबल हाउसफूल है। दर्शकों के लिए यह महज एक फिल्म नहीं है पर कबाली को सिर्फ एक फिल्म की तरह देखें तो इस फिल्म में रजनीकान्त के अलावा भी बहुत कुछ है जैसे-कहानी, अलग-अलग किरदार, निर्देशन, सीनोमेटोग्राफी, एक्शन ...........। मतलब बहुत कुछ। लेकिन ये सबकुछ सुपर स्टार रजनीकांत के लिए हैं।          

फिल्म के पहले दृश्य में मलेशिया के हाइटेक जेल की एक साधारण-सी बैरक में कैदी को ‘My Father Balaiah’ पढ़ता देख मन में हलचल-सी होने लगती है। फिल्म के पहले दृश्य में जिस किताब को दिखाया गया है उसे तेलंगाना के प्रो. वाईबी सत्यनारायन ने लिखी है। यह किताब दलितों के साथ होने वाले अत्याचार और भेद-भाव के ऊपर है। एकबारगी तो ऐसा लगता है कहीं आँखों के सामने दूसरा सैराट तो नहीं आने वाला....पर महज 15 सेकेंड का यह दृश्य बिना कुछ कहे आंखों के सामने से गुजर जाता है और फिर शुरू होता है...सुपर स्टार रजनीकान्त का महापुराण। सीटियों और तालियों की गूंज के बीच कबाली सूट-बूट, गॉगल्स और दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले स्टाइल में जेल से बाहर निकलता है।

दरअसल इस फिल्म में रजनीकांत कबाली नामक एक गैंगस्टर बने हैं। लेकिन कई साल पहले यह कबाली कबालीस्वरम नाम का एक सीधा-साधा इंसान था। जो अपनी पत्नी (राधिका आप्टे) और बेटी के साथ खुशी-खुशी मलेशिया में रहता था। परिस्थितियाँ कबालीस्वरम को कबाली बना देती है। कबाली मलेशिया में अत्याचार सह रहे तमिल लोगों को बचाने के मिशन में लग जाता है और उसकी भूमिका गॉड फादर सरिख बन जाती है। इसी बीच विरोधी गैंग्स कबाली के गर्भवती पत्नी रूपा (राधिका आप्टे) को मार देते है और कबाली को 25 साल की जेल हो जाती है। कबाली 25 वर्ष बाद छूटता है और '43 गैंग्स' से अपना बदला लेता है।

      कहानी, स्क्रीनप्ले, निर्देशन और फिल्ममेकिंग के तमाम पहलुओं परे यह फिल्म रजनीकांत के सुपर स्टार वाले स्टाइल पर टिकी है। फिल्म में दक्षिण भारतीय फिल्मों का तड़का तो है पर कहानी कहने का अंदाज सहज नहीं है। कई जगह संवाद बिना वजह बोले जाते हैं और सटीक वजह नहीं होने के कारण दमदार संवादों का प्रभाव खो जाता है।    

फिल्म की कहानी को रंजीथ ने लिखा है और इसका निर्देशन भी किया है। अगर बात स्क्रीनप्ले की बात करें तो कई जगह इसमें बहुत बड़े-बड़े गड्डे नजर आते हैं। मसलन मलेशिया की सड़कों पर खून-खराबा होता रहता है और पुलिस फिल्म की शुरुआत और अंत में ही नजर आती है। इसके अलावा एक और बात चौंकाती है कि पूरी फिल्म में सिर्फ कबाली ही अपनी पत्नी और बेटी को खोजने की कोशिश क्यों करता है, उसकी पत्नी अपने पति से मिलने की कोशिश क्यों नहीं करती? फिल्म देखते समय ऐसे कई दृश्य आंखों के सामने गुजरते हैं जिन पर सवाल खड़ा करने का मन होता है पर दर्शकों की सीटियाँ और महानायक की महिमा आगे बढ़ने का इशारा करने लगती है।  

 एक्शन और स्टाइल के बीच में फिल्म में फैमिली ड्रामा को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया गया है या यूं कहें तो जबर्दस्ती घुसेड़ दिया गया है। निर्देशक जबरन दर्शकों को रुलाने में लगे हैं। जबकि यह बात खुली किताब की तरह है कि रजनी भक्त अपने भगवान से क्या अपेक्षा रखते हैं। कुल मिलकर एक लेखक और निर्देशक के रूप में रंजीथ बहुत सफल नहीं रहे हैं। कहानी को अच्छे ट्रीटमेंट के साथ और भी बेहतर तरीके से पर्दे पर उतारा जा सकता था। यहां निर्देशक ने ट्रीटमेंट के बजाय स्लो मोशन शॉट्स और बैकग्राउंड म्युजिक के जरिये रजनीकांत के किरदार को स्टाइलिश बनाने की कोशिश की है। इसी वजह से कई जगह पर फिल्म पर उनकी पकड़ ढीली पड़ती दिखाई देती है और अचानक फिल्म की गति जरूरत से ज्यादा स्लो हो जाती है। कई जगह यह रुकावट फिल्म का मज़ा किरकिरा भी कर देती है।

 अगर फिल्म में अभिनय की बात करें तो रजनीकान्त के अलावा बाकी किरदारों ने भी दमदार अभिनय किया है। पत्नी के रूप में राधिका आप्टे ने शानदार काम किया है। फिल्म के एक दृश्य में वर्षों बाद जब पति-पत्नी एक दूसरे से मिलते हैं तब राधिका का अभिनय आंखों में आँसू ला देता है।  कम समय के लिए पर्दे पर आने के बावजूद राधिका अपनी दमदार उपस्थिती दर्ज कराती हैं। टोनी ली के रूप में विंस्टन चाओ अपनी खलनायकी दिखाते हैं। धंसिका ने फिल्म में कबाली की बेटी का किरदार निभाया है। उनकी फिल्म में एंट्री जोरदार है। सिनेमाटोग्राफी बेहतरीन है पर सबसे बेहतरीन है रजनीकांत का लार्जर देन लाइफ सरीखा किरदार जिसकी वजह से कबाली हर हमले में बच जाता है।

 

  



   रुद्रभानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं। .

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