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निशिकांत कामत
निर्देशक


रितेश शाह
पटकथा संवाद लेखक


शैलजा केजरीवाल
कथा लेखक


























Movie Review
मदारी:भावनाओं के ज्वार में आम आदमी का अपराध


भावनाओं के ज्वार में आम आदमी का अपराध है मदारी 

अपनों से बिछड़ने का दुख हमें कई बार इतना साहसी बना देता हैं कि हम वो करने के लिए आतुर हो उठते हैं जो हम अपने लिए सपने में भी नहीं सोच सकते हैं। पारिवारिक टूटन से पैदा हुई भावुकता से भरा आक्रोश आम आदमी को अपराध करने के लिए अग्रसर कर देता है। इस लिहाज से शुक्रवार को रिलीज हुई मदारी मन को मथ देती है। शैलजा केजरीवाल की कहानी और रीतेश शाह के संवाद और पटकथा से सजी फिल्म को निर्देशक निशिकांत कामत ने आम आदमी की मुसीबतों पे ध्यान देकर उसे खास बनाने की कोशिश की है।  हालांकि फिल्म के स्टोरी प्लॉट को देखते हुए दर्शकों के जेहन में ए बेडनस्डे, मैं आजाद हूं , बदलापुर जैसी फिल्मों की याद यकबयक आ जाती हैं। लेकिन कथा के संर्पूण प्रभाव को स्टोरी ट्रीटमेंट ने थोड़ा अलहदा बना दिया है । बतौर निर्देशक निशिकांत कामत इससे पहले भी ये है मुंबई मेरी जान, दृष्यम आदि मानव समाज की भावनाओं को गहराई से रखने वाली फिल्म बना चुके हैं। इसलिए इस बार वे और अनुभव और पूरे विश्वास के साथ अपनी बात रखते हैं।

प्रमुख कलाकार इरफान खान और बाल कलाकार विशेष बंसल के अभिनय से सजी मदारी की कहानी के मुताबिक, दिल्ली में सरकार के गृहमंत्री (तुषार दलवी) के मासूम बेटे रोहन (विशेष बंसल ) का अपहरण हो जाता हैं। सरकार चौकन्नी हो जाती है। सभी  एजेंसियां इस केस को हेंडिल करने के लिए व्याकुल है पर गृहमंत्री इस केस को पुलिस अफसर नचिकेत वर्मा (जिममी शेरगिल) को सौंपते हैं। इधर अपहरणकर्ता निर्मल (इरफान) बच्चे को बहुत चालाकी से देहरादून से लेकर राजस्थान पहुंच जाता है। पहले इस अपहरणकर्ता को हम बहुत हाइटेक अपराधी स्वरूप में देखते हैं लेकिन कहानी की परतें खुलते ही वह अपराधी से ज्यादा एक मजबूर पिता के रूप में दर्शकों के मानस पटल पर अंकित होता है। कहानी बढ़ने के साथ ही दर्शकों को पता चलता है कि अपहरणकर्ता निर्मल खुद एक मासूम बच्चे का बाप रह चुका है जिसे उसकी मां पैदा होते ही पिता की गोद में संभलाकर विदेश में जा बसी है।

थोड़े थ्रिल के साथ इमोशंस की पगडंडी पर फिल्म की कहानी आगे बढ़ते हुए अपने अंत की राह लेती है। फिल्मकार निशिकांत कामत ने फिल्म का क्लाइमेक्स अच्छा रखा है। यूं तो पूरी फिल्म में इरफान अपनी अभिनय अदायगी से दर्शकों को बांधे रखते हैं पर अस्पताल में बंधक बने राहुल के लिए चिंता में आंसू बहाना और अपने बेटे की मौत के बाद अस्पताल में स्कूल बैग को लेकर रोना दर्शकों की आंखें नम कर देता है। 

लेकिन फिल्म के राजस्थान शैड्यूल में फिल्म के दृष्य बजरंगी भाईजान के दृष्यों की याद दिलाते है। खासकर सड़क पर बच्चे के साथ इरफान का चलना, ट्रक के पिछले हिस्से में दोनों किरदारों का बैठना आदि फ्रेम दर फ्रेम बजरंगी भाईजान से प्रेरित लगता है। फिल्म में अन्य भूमिकाओं में जिम्मी शेरगिल, तुषार दलवी, विशेष बंसल प्रभाव छोड़ते हैं। पूरी पटकथा प्रस्तुतिकरण के लिहाज से फिल्म का टायटल बिल्कुल सटीक है। एक आम आदमी इस खेल में मदारी है जिसके सामने सरकार और प्रशासन बंदर की तरह नाचता है। अंत में ये मदारी अपने आपराधिक कृत्य रूपी डमरू से भ्रष्टाचार की तह तक पहुंच जाता है। निस्संदेह फिल्म पारिवारिक दर्शकों के देखने लायक बन पड़ी है। फिल्म में कोई वल्गर सीन नहीं है। इसके साथ ही आम आदमी को फिल्म में हीरो की तरह पेश करना निंश्चित ही बॉक्स आफिस पर दर्शकों की तादाद बढाएगा। अगर आपको इरफान का अभिनय पसंद है और देश, आम आदमी आपकी चिंता के विषय हैं तो बेशक आप ये फिल्म देखने जा सकते हैं। 

धर्मेंद्र उपाध्याय          

                          



   धर्मेन्द्र उपाध्य

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

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